Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 265.

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कळश-२६पः २१७

जुओ, आत्माने ज्ञानमात्र कह्यो तेथी ते एकस्वरूप ज छे एम नहि, पण द्रव्यपर्यायमय छे एम वस्तुने जेम छे तेम अनेकान्तमय जाणवी.

प्रश्नः– तो समयसारनी छठ्ठी गाथामां हुं-आत्मा अप्रमत्तेय नहि ने प्रमत्तेय नहि-एम कह्युं छे ने? उत्तरः– हा, त्यां बीजी वात छे. त्यां द्रष्टिनो विषय एक ज्ञायक भाव बताववानुं प्रयोजन छे. अहीं द्रष्टि अने द्रष्टिनो विषय-बन्ने मळी एक चैतन्यवस्तु आत्मा एम प्रमाणज्ञान कराव्युं छे. तेथी कहे छे के-चैतन्य पण वस्तु छे, अने ते द्रव्यपर्यायमय छे. आमां अहीं निर्मळ पर्यायनी वात छे हों, अशुद्धता ए तो शक्तिनुं परिणमन नथी. हवे कहे छे-

‘ते चैतन्य अर्थात् आत्मा अनंत शक्तिओथी भरेलो छे. अने क्रमरूप तथा अक्रमरूप अनेक प्रकारना परिणामना विकारोना समूहरूप अनेकाकार थाय छे तो पण ज्ञानने-के जे असाधारण भाव छे तेने-छोडतो नथी, तेनो सर्व अवस्थाओ-परिणामो-पर्यायो ज्ञानमय ज छे.

जोयुं? कहे छे-आत्मा अनंत शक्तिओथी भरपुर भरेलो छे. केटली? तो कहे छे-जेने गणतां अनंतकाळेय पार न आवे एटली अनंत शक्तिओथी भरपुर भरेलो भगवान आत्मा छे. अहा! अनंत शक्तिमय ज भगवान आत्मा छे. ज्ञानने अंतरमां वाळतां अनंत शक्तिमय भगवान आत्मा अनुभवमां आवे छे, ने साथे शक्तिओ निर्मळपणे ऊछळे छे-परिणमे छे. आम निर्मळ निर्मळ परिणमतां केवळज्ञान थाय त्यारे अनंत शक्तिओने तथा असंख्य प्रदेशोने भिन्न भिन्न करीने प्रत्यक्ष जाणे. माटे हे भाई, तारी अनंत चैतन्य संपदाने. साक्षात् देखवी होय तो तारा ज्ञानने रागथी छूटुं करीने अंदर स्वभावमां वाळ, स्वभावमां अंतर्लीन थईने जाणतां अनंत चैतन्य संपदा साक्षात् जणाई जाय छे.

जुओ, वेदांतवाळा अद्वैत ब्रह्म-एक ज आत्मा-ब्रह्म छे एम कहे छे, तेओ गुण-पर्यायोने स्वीकारता नथी. आत्मानो अनुभव ए वळी शुं? -एम द्रव्य-पर्यायरूप अनेकान्तमय वस्तुने मानता नथी. परंतु तेमनी एवी मान्यता मिथ्या छे, केमके वस्तुमां-आत्मामां अक्रमवर्ती गुणो ने क्रमवर्ती पर्यायो सदाय वर्ते छे. वास्तवमां अक्रमे वर्तता गुणो ने क्रमे वर्तती पर्यायो-ए बेना समुदायरूप ज चैतन्यवस्तु आत्मा छे. अहा! आवा आत्माना अनंत गुणमां ज्ञान एक असाधारण भाव छे जे स्वने अने परने सर्वने भेद पाडीने जाणे छे. आ ज्ञानभाव वडे आत्मानी बधी अवस्थाओ-पर्यायो ज्ञानमय ज छे. आवी वात! समजाणुं कांई...?

* * *

‘आ अनेकस्वरूप-अनेकांतमय-वस्तुने जेओ जाणे छे, श्रद्धे छे अने अनुभवे छे, तेओ ज्ञानस्वरूप थाय छे’-एवा आशयनुं, स्याद्वादनुं फळ बतावतुं काव्य हवे कहे छेः-

(वसन्ततिलका)
नैकान्तसङ्गतदशा स्वयमेव वस्तु–
तत्त्वव्यवस्थितिमिति प्रविलोकयन्तः।
स्याद्वादशुध्दिमधिकामधिगम्य सन्तो
ज्ञानीभवन्ति जिननीतिमलङ्गयन्तः।।
२६५।।

श्लोकार्थः– [इति वस्तु–तत्त्व–व्यवस्थितिम् नैकान्त–सङ्गत–दशा स्वयमेव प्रविलोकयन्तः] आवी (अनेकांतात्मक) वस्तुतत्त्वनी व्यवस्थितिने अनेकांत-संगत (-अनेकांत साथे सुसंगत, अनेकांत साथे मेळवाळी) द्रष्टि वडे स्वयमेव देखता थका, [स्याद्वाद–शुध्दिम् अधिकाम् अधिगम्य] स्याद्वादनी अत्यंत शुद्धिने जाणीने, [जिन–नीतिम् अलङ्गयन्तः] जिननीतिने (जिनेश्वरदेवना मार्गने) नहि उल्लंघता थका, [सन्तः ज्ञानीभवन्ति] सत्पुरुषो ज्ञानस्वरूप थाय छे.