२१६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ शक्तिओथी भरेलो छे अने क्रमरूप तथा अक्रमरूप अनेक प्रकारना परिणामना विकारोना समूहरूप अनेकाकार थाय छे तोपण ज्ञानने-के जे असाधारण भाव छे तेने-छोडतो नथी, तेनी सर्व अवस्थाओ-परिणामो-पर्यायो ज्ञानमय ज छे. २६४.
शक्तिओथी सारी रीते भरेलो होवा छतां... ,
वासणमां दूधनी जेम आत्मा निजशक्तिओथी भरपुर भरेलो छे?
ना, दूधमां जेम धोळप भरेली छे, वा साकरमां जेम गळपण भरेलुं छे तेम भगवान आत्मा निज शक्तिओथी भरपुर भरेलो छे. अहाहा...! चैतन्यमूर्ति प्रभु आत्मा अनंतशक्तिमय ज छे. दूधने वासण ए तो बे पृथक् चीज छे, एवुं आमां नथी. आत्मा अने शक्तिओ अभेद एकरूप छे; आत्मा शक्तिमय ज छे. समजाय छे कांई...?
अहाहा...! कहे छे-आम अनंत शक्तिओ-गुणोथी सारी पेठे भरपुर भरेलो होवा छतां ‘यः भावः ज्ञानमात्रमयतां न जहाति’ जे भाव ज्ञानमात्रमयपणाने छोडतो नथी, ‘तद्’ एवुं ते, ‘एवं क्रम–अक्रम–विवर्ति– विवर्त–चित्रम्’ पूर्वोक्त प्रकारे क्रमरूपे अने अक्रमरूपे वर्तता विवर्तथी (-रूपांतरथी, परिणमनथी) अनेक प्रकारनुं, ‘द्रव्यपर्ययमयम्’ द्रव्यपर्यायमय ‘चिद् चैतन्य (अर्थात् एवो ते चैतन्यभाव-आत्मा) ‘इद’ आ लोकमां ‘वस्तु अस्ति’ वस्तु छे.
अहाहा...! जोयुं? अनंत गुणोथी भरेलो होवा छतां जे भाव ज्ञानमात्रपणाने छोडतो नथी अर्थात् जेना अक्रमे वर्तता गुणो ने क्रमे वर्तती पर्यायोमां ज्ञान व्यापक छे एवो चैतन्यभाव वस्तु आत्मा छे. जुओ, अहीं अक्रमे वर्तता गुणो अने क्रमे वर्तती पर्यायो ते आत्मा कहीने प्रमाणज्ञान कीधुं छे. अहा! प्रत्येक गुण-पर्यायमां ज्ञान व्यापक छे तेथी ज एने ज्ञानमात्र आत्मा कह्यो छे. अहीं अक्रमे वर्तता गुणो ने क्रमे वर्तती पर्यायो-एरूप ज्ञानमात्र वस्तु आत्मद्रव्य लीधुं छे केमके अनंत गुणमां-प्रत्येकमां प्रतिसमय रूपांतर-परिणमन थवुं ते एनो स्वभाव छे. आम अक्रमे वर्तता गुणो ने क्रमे वर्तती-रूपांतर थती पर्यायो-एम द्रव्यपर्यायमय चैतन्यभाव ते आत्मा छे; अने ते लोकमां वस्तु छे. बे-द्रव्य-पर्याय बे थईने एक वस्तु छे, बे भिन्न-भिन्न चीज नथी, बे थईने बे वस्तु नथी.
अहाहा...! भगवान! तुं कोण छो? तो कहे छे-अनंत शक्तिओथी भरपुर भरेल ज्ञानमात्र वस्तु आत्मा छो. अहाहा...! तारो आत्मा कांई विकार के कर्मोथी भरेलो नथी, एनाथी तो भिन्न शुद्ध चैतन्यवस्तु तुं आत्मा छो. अहाहा...! विकारथी ने परथी जुदो एवो आ चैतन्य भगवान, कहे छे, ज्ञानमात्रमयपणाने कदी छोडतो नथी. अहा! धुमाडाथी भिन्न एवी अग्नि जेम उष्णताने कदी छोडती नथी, तेम परथी ने विकारथी भिन्न शुद्ध चैतन्यवस्तु पोताना ज्ञानमयपणाने कदी छोडती नथी. माटे हे भाई, ज्ञानभाव वडे तारी आत्मवस्तुने लक्षमां लईने तेनो अनुभव कर. जुओ, आ धर्मनी रीत!
अहाहा...! अंतर्मुख थईने ज्ञानभाव वडे जेणे निज चैतन्य वस्तुनो अनुभव कर्यो ते ज्ञानी-धर्मी छे, ते ज्ञानभावमयपणे. ज सदाय वर्ते छे, ते ज्ञानभावने कदी छोडतो नथी. अहा! आवो साधक धर्मी पुरुष एम जाणे छे के-मारो आत्मा सहज ज क्रमपर्यायरूप ने अक्रमगुणरूप स्वभाववाळो छे. अनंत गुण एक साथे अक्रमपणे वस्तुमां तिरछा-तिर्यक्प्रचयरूप रहेला छे, ने पर्यायो नियत क्रमपणे क्रमवर्ती-उर्ध्वप्रचयरूप थाय छे. अहाहा...! मारा अक्रमवर्ती गुणोमां ने क्रमवर्ती पर्यायोमां हुं सदाय ज्ञानमात्रभावपणे ज वर्तुं छुं. आवा निर्णयमां ज्ञानीने ज्ञातास्वभावना आलंबननो पुरुषार्थ वर्ते छे; किंचित् राग छे तेने ते ज्ञानभावथी बहार परज्ञेयपणे ज जाणे छे बस. ल्यो, आम ज्ञानमात्रभावपणे ज परिणमतो परिणमतो साधक साध्य एवा सिद्धपद प्रति हाल्यो जाय छे. आवी वात! समजाणुं कांई...?
‘कोई एम समजशे के आत्माने ज्ञानमात्र कह्यो तेथी ते एकस्वरूप ज हशे परंतु एम नथी. वस्तुनुं स्वरूप द्रव्यपर्यायमय छे. चैतन्य पण वस्तु छे, द्रव्यपर्यायमय छे.’