Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 264.

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कळश-२६४ः २१प

जुओ धर्मात्मानी आ सूक्ष्म तत्त्वद्रष्टि! जेम भेंसनो पति पाडो होय तेम, कहे छे, जडनो पति जड ज होय. पण हुं तो एक ज्ञायक भाव छुं, ने ज्ञायक ज रहीश अर्थात् ज्ञायकना स्वामीपणे ज रहीश. ल्यो, आवी वात! धर्मी जीव मात्र पोताना स्व-स्वभावमां ज स्व-स्वामित्व जाणे छे, शरीर, कर्म, के रागादि साथे स्व-स्वामित्व स्वीकारता नथी. धर्मीने वर्तमान दशामां किंचित् राग छे, पण तेना अभिप्रायमां ‘राग ते हुं’ एवी रागनी पकड नथी; ‘एक ज्ञायक भाव ज हुं-एवी स्वभावनी ज पकड छे.

सम्यग्द्रष्टिनो स्व-स्वामित्व संबंध पोताना स्वरूपमां ज समाय छे. तेथी निर्मळ त्रिकाळी द्रव्य-गुण अने तेनी निर्मळ, पवित्र परिणति-ए त्रणे जे पोतानो भाव छे ते तेनुं स्व छे, ने तेनो ज ते स्वामी छे. ज्ञानी धर्मात्मा पुरुषने ‘राग मारुं स्व ने रागनो हुं स्वामी’ एवो संबंध छे ज नहि. तेने व्यवहार रत्नत्रयनो विकल्प आवे छे, पण ते ज्ञेय-ज्ञायकरूप व्यवहारना संबंधमां जाय छे. राग ते परज्ञेय छे, पोताना द्रव्य-गुण-पर्याय ते स्वज्ञेय छे; शुद्ध आत्मद्रव्य स्वज्ञेय छे, ते उपादेय छे, ने राग परज्ञेय छे, तेनो धर्मी जीव ज्ञाता मात्र छे. राग परज्ञेय-बस एटलो व्यवहार संबंध छे, तेनी साथे हवे धर्मीने बीजो कोई संबंध नथी. अहाहा...! अंदर मीठो महेरामण अमृतनो नाथ प्रभु आत्मा झुले छे, तेमांथी अमृत झरे छे तेनो स्वाद कर; राग छे ए तो झेरनो स्वाद छे, ज्ञानी तेना स्वादना स्वामी थता नथी.

जुओ, रत्नत्रयना निर्मळ परिणाम ते मारुं स्व ने हुं तेनो स्वामी, एक ज्ञायक भाव ते मारुं स्व, ने हुं तेनो स्वामी-एम स्व-स्वामीरूप भेद-विकल्पनी आ वात नथी. वास्तवमां धर्मीने द्रव्य-पर्यायनी एकतारूप परिणमन थयुं छे एनी आ वात छे. पोते पोताना स्वभाव साथे ज संबंध राखीने तेनाथी ज एक्तारूपे परिणमे, तेमां ज लीनता करी परिणमे एवो आत्मानो स्वभाव छे, ने ते ज एनी शोभा छे, सुंदरता छे. परना संबंधथी आत्माने ओळखवो ए तो कलंक छे; लौकिकमां पण एने कलंक कहे छे, माटे हे भाई! परना संबंधथी विरित्त थईने तारा एक ज्ञायक भावमां ज एकत्व कर. एक ज्ञायक भावमां एकत्व पामतां अंदर निर्मळ रत्नत्रय पाकशे. ते तारो स्व-भाव छे, ने तुं तेनो स्वामी छो. आ सिवाय बीजा कोई साथे तारे स्व-स्वामीपणानो संबंध छे नहि. ल्यो, आवी वात!

आ प्रमाणे छेल्ली आ संबंधशक्तिनुं वर्णन पूरुं थयुं.

* * *
कळश – २६४

‘इत्यादिक अनेक शक्तिओथी युक्त आत्मा छे तोपण ते ज्ञानमात्रपणाने छोडतो नथी’ -एवा अर्थनुं कळशरूप काव्य हवे कहे छेः-

(वसन्ततिलका)
इत्याद्यनेकनिजशक्तिसुनिर्भरोऽपि
यो ज्ञानमात्रमयतां न जहाति भावः ।
एवं
क्रमाक्रमविवर्तिविवर्तचित्रं
तद्रव्यपर्ययमयं चिदिहास्ति वस्तु।। २६४।।

श्लोकार्थः– [इत्यादि–अनेक–निज–शक्ति–सुनिर्भरः अपि] इत्यादि (-पूर्वे कहेली ४७ शक्तिओ वगेरे वगेरे) अनेक निज शक्तिओथी सारी रीते भरेलो होवां छतां [यः भावः ज्ञानमात्रमयतां न जहाति] जे भाव ज्ञानमात्रमयपणाने छोडतो नथी, [तद्] एवुं ते, [एवं क्रम–अक्रम–विवर्ति–विवर्त–चित्रम्] पूर्वोक्त प्रकारे क्रमरूपे अने अक्रमरूपे वर्तता विवर्तथी (-रूपांतरथी, परिणमनथी) अनेक प्रकारनुं, [द्रव्य–पर्ययमयं] द्रव्यपर्यायमय [चिद्] चैतन्य (अर्थात् एवो ते चैतन्यभाव-आत्मा) [इह] आ लोकमां [वस्तु अस्ति] वस्तु छे.

भावार्थः– कोई एम समजशे के आत्माने ज्ञानमात्र कह्यो तेथी ते एकस्वरूप ज हशे. परंतु एम नथी. वस्तुनुं स्वरूप द्रव्यपर्यायमय छे. चैतन्य पण वस्तु छे, द्रव्यपर्यायमय छे. ते चैतन्य अर्थात् आत्मा अनंत