२१४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ आत्मानी शुद्ध परिणति ज्यां जागृत थई त्यां ‘हुं आनंदकंद एक ज्ञायक प्रभु छुं, ते मारुं स्व ने हुं तेनो स्वामी छुं’-एम तेने स्व-स्वामी संबंध प्रगट थाय छे. बेनना वचनामृतमां आवे छे ने के-‘जागतो जीव उभो छे, ते कयां जाय? जरूर प्राप्त थाय.’ जागतो जीव एटले ध्रुव एक ज्ञायकभाव-तेनी द्रष्टि कर्ये ते जरूर प्राप्त थाय. आत्मामां शक्ति जागी (-परिणमी) त्यां आखोय आत्मा जागी गयो. पहेलां रागनी एकतामां मूर्च्छित हतो ते हवे एक ज्ञायकभावनी एक्तामां जागृत थयो. तेना द्रव्य-गुण-पर्याय त्रणेमां स्व-स्वामीपणानो संबंध स्थापित थयो. हवे तेने रागादि साथे स्व-स्वामित्व संबंध नथी.
तो व्यवहार रत्नत्रयना परिणाम तो एने छे? हा, छे; पण व्यवहार रत्नत्रयना परिणाम साथे स्व-स्वामित्व संबंध नथी. तेनी साथे ज्ञेय-ज्ञायक संबंध व्यवहार-मात्रथी छे. ते रागना परिणामने परज्ञेयपणे मात्र जाणे छे. बस. समजाणुं कांई...?
नियमसारमां निर्मळ पर्यायने परद्रव्य, अने हेय कही छे. त्यां अपेक्षा जुदी छे. त्यां उपादेय तत्त्व जे सम्यग्दर्शननो विषय छे एवो एक ज्ञायकभाव सिद्ध करवो छे, ने पर्यायनुं लक्ष मटाडवुं छे; तो निर्मळ पर्यायने परद्रव्य अने हेय कही. अहीं संबंधशक्तिमां जीवनो वास्तविक संबंध कोनाथी छे ए सिद्ध करवुं छे, तो द्रव्य-गुण ने तेनी निर्मळ पर्याय ज पोतानुं स्व छे, ने पोते तेनो ज स्वामी छे, परनो ने रागनो नहि-एम सिद्ध कर्युं छे. हवे सत्य वात सांभळे नहि ने राग-द्वेषनी-एकली पापनी-मजुरीमां आवी जिंदगी वेडफी नाखे! अरे भाई, एमां तने भारे नुकशान छे. बहारनी क्रिया तो तुं करतो (करी शकतो) नथी, ने पुण्य-पापना विकल्पोनी मजुरी कर्या करे छे पण एथी तो तने अनंत संसार फळशे; कोण जाणे कयांय नर्क-निगोदमां चाल्यो जईश.
प्रश्नः– हा, पण आत्माने कर्म साथे तो निमित्त-नैमित्तिक संबंध छे ने? उत्तरः– ना; पोताना स्वभाव साथे ज स्व-स्वामित्व संबंध जेने प्रगट थयो, एक ज्ञायकभावना एकत्वपणे जे परिणम्यो एवा धर्मी पुरुषने कर्म साथेना निमित्त-नैमित्तिक संबंधनो विच्छेद थतो जाय छे. जेने स्वभावनी द्रष्टि थई नथी एवो मिथ्याद्रष्टि जीव ज कर्म साथेना निमित्त-नैमित्तिक संबंधे परिणमे छे. जेने निज स्वभाव-एक ज्ञायकभाव साथे एकपणुं थयुं. ज्ञायक साथे ज एकाकार थई जे परिणम्यो तेने हवे कर्मनुं निमित्तपणुं छुटतुं जाय छे. साधकने तो पोताना स्वभावमां जेम जेम एक्तानुं परिणमन दृढ थतुं जाय छे तेम तेम कर्मनो संबंध तूटतो जाय छे, ने क्रमशः पूर्ण भावने प्राप्त थई कर्मना संबंध रहित थई जाय छे, सिद्धपदने प्राप्त थाय छे.
अहा! समकितीने कर्मनुं ने रागनुं स्वामित्व नथी. ए तो स्व-स्वभावना स्वामी छे. पोताना द्रव्य-गुण ने द्रव्यना आश्रये प्रगटेली निर्मळ रत्नत्रयनी दशा-तेना ज ते स्वामी छे, ने ते ज एनुं स्व छे. कर्मना ने कर्मजनित रागनो स्वामी थाय ते तो मिथ्याद्रष्टि छे. ल्यो, हवे लोको कहे छे के-व्यवहारनी क्रिया करो, एम करतां करतां धर्म थशे, व्यवहार रत्नत्रयथी निश्चय रत्नत्रय थशे, सराग संयम पाळतां वीतरागी संयम थशे; पण भाई, आवी जे प्ररूपणा छे ए तो स्वरूपनो घात करनारी छे. आत्माने ज्यां रागनुं स्वामित्व ज नथी त्यां रागथी आत्मानो धर्म केम प्रगट थशे? भगवाननी वाणीमां तो आ आव्युं छे के वीतराग परिणतिथी ज धर्मदशा उत्पन्न थाय छे, अने ते वितराग परिणति स्वद्रव्यना आश्रये ज उत्पन्न थाय छे. कर्मना आश्रये के व्यवहार-रत्नत्रयना आश्रये वीतराग परिणति उपजे ए त्रणकाळमां सत्य नथी. अहा! धर्मी जीव पर साथे जराय संबंध मानता नथी.
समयसार गाथा २०७-२०८ नी टीकामां आव्युं छे के- “जे जेनो स्व भाव छे ते तेनुं स्व छे. अने ते तेनो (स्वभावनो) स्वामी छे-एम सूक्ष्म तीक्ष्ण तत्त्वद्रष्टिना आलंबनथी ज्ञानी (पोताना) आत्माने ज आत्मानो परिग्रह नियमथी जाणे छे, तेथी ‘आ मारुं स्व नथी, हुं आनो स्वामी नथी’ एम जाणतो थको परद्रव्यने परिग्रहतो नथी.”
वळी ज्ञानी कहे छे के-“जो अजीव परद्रव्यने हुं परिग्रहुं तो अवश्यमेव ते अजीव मारुं स्व थाय, हुं पण अवश्यमेव ते अजीवनो स्वामी थाउं; अने अजीवनो जे स्वामी ते खरेखर अजीव ज होय. ए रीते अवशे (लाचारीथी) पण मने अजीवपणुं आवी पडे. मारुं तो एक ज्ञायक भाव ज जे स्व छे, तेनो ज हुं स्वामी छुं; माटे मने अजीवपणुं न हो, हुं तो ज्ञाता ज रहीश, परद्रव्यने नहि परिग्रहुं.”