पुरुषने स्वामित्वनो संबंध छे. बाकी पुण्य के व्यवहार रत्नत्रयनो विकल्प ते स्व अने धर्मी तेना स्वामी-एम त्रणकाळमां छे नहि. प्रभु! तारा स्वभावमां जे स्थिर होय ते तारुं स्व छे, ने तेनुं परिणमन थाय ते तारुं स्व-कार्य छे. आम द्रव्य-गुण ने पर्याय ए त्रणे तारुं स्व अने तेनी साथे तारे स्वामीपणानो संबंध छे. आ सिवाय पर के राग साथे तारे स्व-स्वामीपणानो संबंध नथी. समजाणुं कांई...?
अहाहा...! पोतानो एक ज्ञायकभाव अनंत शक्तिथी भरपुर भर्यो छे. एनो ज्यां अनुभव थयो तो तेना परिणमनमां पण स्व-भाव-स्वना भवनरूप स्व-भाव आव्यो, अने संबंध शक्ति द्रव्य-गुण-पर्याय त्रणेमां व्यापी; द्रव्य-गुणमां तो हती, ने भान थयुं त्यां पर्यायमां शक्तिनो अंश प्रगट थयो. तो धर्मी पोताना द्रव्य-गुण ने तेना आश्रये प्रगट शुद्ध परिणति-ए सिवाय पोताने स्व-स्वामी संबंध होवानुं कयांय स्वीकारतो नथी. अहा! दिगंबर संतो सिवाय वस्तुनुं आवुं स्वरूप कोण बतावे? दिगंबर संतोए अकारण करुणा करीने सार तत्त्व जगत समक्ष मूकयुं छे. तेओ भगवान केवळीनो वारसो मूकी गया छे. पण अरे! वारसो (वारसदार) रह्या नहि! कोईने थाय के अमारुं बधुं खोटुं? हा, खोटुं छे; राग ने पर साथेनो तारो सर्व संबंध खोटो छे.
अरे प्रभु! वस्तुनुं स्वरूप आवुं छे. पोतानां द्रव्य-गुण तो त्रिकाळ शुद्ध छे, ने शक्तिना धरनार द्रव्यनो ज्यां पर्यायमां अनुभव थयो त्यां स्व-स्वामित्वमय संबंधशक्तिनुं परिणमन पण थयुं. तो द्रव्य-गुण-पर्याय त्रणे स्व-भाव छे, ने ते स्व-भावनो स्वामी पोते आत्मा छे एम निश्चय थयो. जुओ आ निश्चय! अहा! धर्मीने आ निश्चय थयो छे के हुं मारा ज्ञान-आनंद वगेरे अनंत गुणोनो स्वामी छुं, ने ते ज मारा स्व-भावो छे. मारुं स्वरूप एवुं नथी के हुं परनो ने विकारनो स्वामी थाउं. परनो स्वामी परद्रव्य ने विकारनो स्वामी विकार होय; मारो शुद्धभाव विकारनो स्वामी केम होय? मारा एक ज्ञायकभाव साथे जेणे एकत्व कर्युं छे एवो जे शुद्ध रत्नत्रयनो भाव ते ज मारुं स्व छे, ने तेनो ज हुं स्वामी छुं. रागादि तो माराथी छूटा पडी जाय छे, माटे ते मारुं स्व नथी, हुं तेनो स्वामी नथी. हुं तो स्व-भावमात्रनो ज स्वामी छुं.
प्रश्नः– तो आ स्त्रीनो स्वामी, लक्ष्मीनो स्वामी, प्रजानो स्वामी वगेरे लोकमां कहे छे ते शुं जूठुं छे? उत्तरः– हा, स्त्रीनो स्वामी, लक्ष्मीनो स्वामी, प्रजानो स्वामी इत्यादि लोकमां जे कहेवाय छे ते परमार्थ नथी. खरेखर आत्मा स्त्री, लक्ष्मी के प्रजा वगेरेनो स्वामी नथी, केमके ए पृथक् वस्तुओ तेनुं स्व नथी. आ शरीरनो आत्मा स्वामी नथी, ने रागादिनोय स्वामी नथी; आत्मा तो ज्ञान-दर्शन-आनंदरूप स्व-भावोनो ज स्वामी छे, ने ते ज आत्माना ‘स्व’ छे. ‘स्व’ तो तेने कहीए जे सदाय साथे रहे, कदीय पोताथी जुदुं न पडे. शरीर जुदुं पडे छे, राग जुदो पडी जाय छे, पण ज्ञान-दर्शन-आनंद जुदा पडता नथी, माटे तेनी साथे ज आत्माने स्व-स्वामीपणुं छे, रागादि साथे नहि. समजाणुं कांई...?
जुओ, राम, लक्ष्मण, सीता वनमां गयां हतां. सीताने उपाडी जवाथी रावण साथे तेमने लंका पासे युद्ध थयुं. रावणे लक्ष्मणने शक्ति मारीने मूर्च्छित बनावी दीधा. शक्ति एटले बहारनी विद्या. त्यारे लक्ष्मणनी हालत जोईने राम कल्पांत करवा लाग्याः
ए माताजी खबरुं पूछशे, त्यारे शो शो उत्तर दईश;
लक्ष्मण जागने होजी, तुं बोल दे एकवारजी...
जुओ, समकिती रामने आवो विकल्प आव्यो छे, पण ते सीता, लक्ष्मणना के तत्संबंधी विकल्पनाय ते काळे स्वामी नथी. समजाय छे कांई...? समकितीनी परिणति ज आवी विचित्र अटपटी होय छे. भजनमां आवे छे ने के-
लक्ष्मण मूर्च्छित थई पडया छे, त्यारे कोईए कह्युं के एक विशल्या नामनी कुंवारी कन्या छे. ते भरतना राज्यमां रहे छे. तेने तत्काल अहीं बोलावो. तेना स्नाननुं जळ छांटवाथी लक्ष्मणनी मूर्च्छा उतरी जशे. ने बन्युं पण एम. ते प्रमाणे करतां लक्ष्मणजीना शरीरमांथी शक्ति चाली गई, ने लक्ष्मणजी जागृत थया. अहीं कहे छे-शल्य रहित विशल्या एवी