२१२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ परमात्मस्वरूप पूर्ण विज्ञानघन वस्तु हुं छुं एम जाणवामां आव्युं, साथे एनी प्रतीति थई. जो प्रतीति न थाय तो आ सिद्ध समान कारणपरमात्मा हुं भगवान स्वरूप छुं ए कयां रह्युं? एक वार एक प्रश्न थयेलोः
प्रश्नः– महाराज! आप त्रिकाळी ध्रुव वस्तुने कारणपरमात्मा कहो छो; जो तेवो कारणपरमात्मा होय तो तेनुं कार्य आववुं जोईए ने? कारणपरमात्मा तो मोजुद छे, पण तेनुं सम्यग्दर्शनरूपी कार्य तो छे नहि, माटे तेने कारणपरमात्मा केम कहेवाय? त्यारे अमे जवाब दीधेलो के-
उत्तरः– भाई, जेने कारणपरमात्मा प्रतीतिमां आव्यो तेने ते कारणपरमात्मा छे. जेने प्रतीतिमां आव्यो नथी तेने कारणपरमात्मा कयां छे? समजाय छे? कारणपरमात्मा त्रिकाळी अनंतगुणस्वरूप भगवान तो अनादिथी छे, पण तेनो पर्यायमां भास थया विना कारणपरमात्मा छे ए वात कयां रही? मिथ्या श्रद्धावाळाने कारणपरमात्मानी श्रद्धा नथी; तेने तो बहारमां राग अने पर्यायनी श्रद्धा छे. सम्यग्द्रष्टिने ज कारणपरमात्मानी श्रद्धा छे. आज शास्त्रनी १७-१८ गाथानी टीकामां एम कह्युं छे के-अज्ञानीनी ज्ञान-पर्यायमां पण पर्यायनो स्वभाव स्वपरप्रकाशक होवाथी, स्वज्ञेय जाणवामां आवे छे, पण तेनी द्रष्टि त्यां स्वद्रव्य पर नथी; माटे तेना ज्ञानमां जणातो होवा छतां तेनी पर्यायमां कारणपरमात्मा आव्यो नहि. द्रव्य ज्ञानमां जणावा छतां द्रव्य उपर द्रष्टि नहि होवाथी पर्यायमां द्रव्य आव्युं नहि.
भाई, राग अने पर्यायने जे पोतानुं स्व माने छे ते बहिरात्मा छे, केमके पर्याय ते बहिर्तत्व छे, ने वस्तु छे ते अंतःतत्त्व छे. एक समयनी पर्याय उपर जेनी द्रष्टि छे ते बहिद्रष्टि बहिरात्मा छे, ने भगवान ज्ञायकनो जेणे अंतरमां स्वीकार कर्यो ते अंतरात्मा थयो. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-आनंदरूप जे स्वना भवनरूप भाव छे ते ज मारुं स्व छे ने हुं तेनो स्वामी छुं, आ सिवाय बीजुं कांई मारुं स्व नथी, ने बीजा कोईनो हुं स्वामी नथी-एम तेने हवे निर्णय थयो छे. जुओ आ संबंधशक्ति! परथी संबंध होवानुं निषेधीने आ संबंधशक्ति स्वमां एकता स्थापित करे छे.
पण अरे! अज्ञानीनी द्रष्टि बहार पर अने पर्याय पर होय छे. नियमसारना शुद्धभाव अधिकारमां आवे छे के-जीवादि सात तत्त्व बहिर्तत्व छे. त्यां जीवादि एटले जीवनी पर्याय समजवी. जीवादि बहिर्तत्व हेय छे अने पोतानो आत्मा जे एक ज्ञायकभावमात्र छे ते उपादेय छे. निर्मळ पर्यायने पण त्यां बहिर्तत्व कहेवामां आवेल छे. संवर, निर्जरा आदि पर्याय छे तेने त्यां बहिर्तत्व कही छे, हेय कही छे. त्यां प्रयोजनवश नवे तत्त्वनी बधी पर्यायने हेय कही छे, ने एक अंतःतत्त्व स्वद्रव्यने ज आश्रय करवायोग्य उपादेय कह्युं छे. हवे आ सांभळवाय न मळे तेने के दि’ तेनुं ज्ञान थाय, ने कयारे ते अंतरमां उतरे? आ समज्या विना तारुं बधुं थोथां छे भाई. आ दया, दान, व्रत इत्यादिना विकल्प बधुं थोथां छे भगवान!
त्यां कहे छे-दया, दान इत्यादि जे विकल्प छे ते तो हेय छे, पण द्रव्यद्रष्टि करतां जे संवर निर्जरानी निर्मळ पर्याय प्रगट थई तेय हेय छे. संवर एटले चारित्र. भगवान आनंदस्वरूपमां रमणता करतां जे चारित्रनी पर्याय प्रगट थई ते चारित्र दशा हेय छे, केमके पर्यायना लक्षे राग उत्पन्न थाय छे. पर्यायनुं लक्ष छोडावी एक ज्ञायकनुं ज लक्ष कराववानुं प्रयोजन छे तेथी त्यां सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी दशाने हेय कही छे, परद्रव्य कही छे. श्रीमद् राजचंद्रजीने तत्त्वद्रष्टि हती. तेमणे एक वार कहेलुं-‘अरे, आ नाद कोण सांभळशे? कोण हा पाडशे? परमात्मानो आ नाद छे.
लोकोए बहारनुं बधुं मान्युं छे. व्रत करे, ने तपस्या करे पण ए संसारना नाशनो उपाय नथी. अंदर स्वभावमात्र कारणपरमात्मा छे, पण जे तेनी प्रतीति ने ज्ञान करे तेने ने? त्रिकाळी ज्ञायक स्वभाव ते पोतानुं स्व छे, पण जे तेनो आश्रय करीने जाणे तेने ते स्व छे. स्वनुं भान थाय, सम्यग्दर्शन-ज्ञान थाय त्यारे ते स्व-भाव छे एम कहेवाय.
अरे! आ लोकमां पोतानुं शुं छे ने कोनी साथे पोताने परमार्थ संबंध छे तेना भान विना, परने ज पोतानुं मानीने जीव संसारमां अनंत काळथी रखडी मरे छे. ते परने पोतानुं करवा निरंतर उद्यमशील रहे छे, पण परद्रव्य कदीय पोतानुं थई शकतुं नथी, तेथी मोहमुग्ध एवो ते दुःखी ज दुःखी थाय छे.
अहा! जो परने पररूपे जाणे ने स्वने स्व-रूपे जाणे तो अवश्य ते पोताना स्वरूपनी-स्वभावमात्र वस्तुनी-एकाग्रताथी सुखी ज थाय.
त्रिकाळी एक ज्ञायकस्वभाव प्रभु आत्मा ते स्व, अने तेना भावनुं भवन-जेमां आ स्व छे एम भान थयुं ते स्व-भाव छे. आ रीते चैतन्यद्रव्य, तेना गुण अने तेनी शुद्ध परिणति प्रगट थई ते पोतानुं स्व, अने तेनी साथे धर्मी