२२४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ छे. भाई, जे ते दशानी जे स्थिति छे तेने यथार्थ जाणवी जोईए.
उत्तरः– हा, कह्युं छे; पण कयुं ज्ञान? अने कयी क्रिया? एकलुं परावलंबी शास्त्रनुं ज्ञान, ने रागनी क्रिया-ते मोक्षनुं कारण छे वा तेना वडे मोक्ष थाय छे एम नथी. ए तो स्व-आश्रये प्रगटेलुं स्वरूपनुं ज्ञान, स्वसंवेदन ज्ञान ते ज्ञान छे, ने स्वरूपमां रमणता-लीनता ते क्रिया छे, अने आवां ज्ञान-क्रिया वडे मोक्ष थाय छे एम त्यां वात छे. समजाणुं कांई...?
पुरुषार्थसिद्धयुपायमां आचार्य अमृतचंद्रदेवे कह्युं छे के-आत्मानुं निर्विकल्प सम्यग्दर्शन, स्वसंवेदन ज्ञान, अने स्वमां लीनता-ते मोक्षनुं कारण छे; ज्यारे नवतत्त्वनी भेदरूप श्रद्धा-तेरूप व्यवहार सम्यग्दर्शन, शास्त्रनुं ज्ञान-तेरूप व्यवहारज्ञान, तथा पंच महाव्रतना विकल्प-तेरूप व्यवहारचारित्र-ए बधो अपराध छे. अरे! जे भावे तीर्थंकर गोत्र बंधाय ते शुभभाव पण अपराध छे. हवे जे भाव अपराध छे ते मोक्षने केम साधे-आराधे? न साधे. आ भाई, आ तो वीतरागनो मार्ग बापु! मारग तो वीतराग-भावरूप ज छे.
कहे छे-व्यवहाररत्नत्रयना पाकना प्रकर्षनी परंपरा वडे अनुक्रमे स्वरूपमां आरोहण करवामां आवतां आ आत्मा, अंतर्मग्न जे निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप भेदो ते-पणा वडे पोते साधकरूपे परिणमे छे. अहाहा...! व्यवहारना विकल्पने छोडीने पोते चिदानंदघन एवा स्वस्वरूपमां आरोहण करे छे, लीन थाय छे तो, जेम डुंगरमांथी झरणुं झरे तेम स्वस्वरूपनां श्रद्धा-ज्ञान-रमणतापूर्वक अंदर अनाकुळ आनंदनुं झरणुं झरे छे, अंदर शांतिनां वहेण वहे छे. ल्यो, आने भगवान मोक्षमार्ग कहे छे.
समयसार, गाथा १२मां कह्युं छे के-स्व-आश्रये स्वस्वरूपनुं ज्ञान, आत्मज्ञान थयुं छे, पण दशामां पूर्ण शुद्धता, पूर्ण ज्ञान-केवळज्ञान प्रगटयुं नथी ने नीचली दशा छे एवा जीवने अशुद्धतानो विकल्प होय छे, तेने ते जाणे ज छे. अहा! जे विकल्प होय छे तेने जाणवो ते व्यवहार नय छे, अने एनुं नाम व्यवहारनो उपदेश छे. पण अरे! शुं थाय? व्यवहारना-रागना पक्ष आडे एणे अनंतकाळमां आ वात लक्षमां लीधी ज नथी.
अहा! अंतरमां पोताना भगवानना भेटा थया छे, स्वरूपनां श्रद्धा-ज्ञान ने रमणता प्रगट थयां छे, प्रचुर अतीन्द्रिय आनंदना झूले झूले छे एवा, सिंहनी जेम एकाकी जंगलमां रहेता प्रचंड पुरुषार्थने धरनारा महा मुनिराजने, कहे छे, पूर्णदशा प्रगट थई नथी तो वच्चे सहचरपणे व्यवहार दर्शन-ज्ञान ने महाव्रतना विकल्प होय छे, एनुं ते ज्ञान करे छे, अने एने छोडी स्वरूपमां आरोहण करता थका निश्चय स्थिरताने प्राप्त थाय छे. अहाहा...! आनंदनो-निर्मळानंदनो नाथ प्रभु अंदर छे एमां ज्यारे आरोहण थयुं त्यारे एणे आत्मानी जात्रा करी. आ जात्रा ते जात्रा छे, बाकी शेत्रुंजो ने सम्मेदशिखरजी जाय ए तो बधो शुभभाव छे, ए साची जात्रा नहि, एने उपचार मात्र जात्रा कहेवाय छे. समजाणुं कांई...?
अहा! साधकने बहारमां व्यवहार होय छे, ए व्यवहारथी खसीने ज्यारे स्वरूपमां आरोहण करे छे त्यारे ते निश्चयने प्राप्त थाय छे. ते जेम जेम व्यवहारनो अभाव करतो जाय छे तेम तेम निश्चयमां (-स्वरूपमां) ठरतो जाय छे; परंतु एम नथी के व्यवहारथी निश्चय प्राप्त थाय छे. अहो! निज परमात्मस्वरूपमां लीन एवा ते मुनिवरोने धन्य छे. स्वरूपमां आरोहण करता थका तेओ साक्षात् मोक्षना साधको छे.
भाई, रागरूपे-शुभरागरूपे थवुं ए कांई साधकपणुं नथी, ने व्यवहारना विकल्पथी साधकपणुं प्रगटे छे एमेय नथी. भाई, रागथी खसी अंतरमां गया विना तारा परिभ्रमणना आरा नहि आवे. आ बधा शेठिया दान खूब करे ने! अहीं कहे छे-ए तारां लाखो-करोडोनां दान काम नहि आवे. मात्र व्यवहारनी क्रियाओथी कांई हाथ नहि आवे. विकारने विभावथी विमुख थई निजानंदस्वरूपनां ज्ञान-श्रद्धान ने लीनता करवी बस आ एक ज मोक्षमार्ग छे, ने आ ज साधकदशा छे.
अहाहा...! भगवान! तुं वस्तु छो के नहि? वस्तु छो तो तारामां अनंत शक्तिओ छे के नहि? अहाहा...! अनंत शक्तिओना पिंडरूप एवी तारी चैतन्यवस्तुनुं अवलंबन करतां, तेना आश्रयमां दृढ-स्थिर थतां जे निर्मळ दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणमन थाय ते मोक्षमार्ग छे; आ साधकदशा अने आ उपाय छे. पण अरेरे! पोतानी