Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कळश-२६पः २२प

चैतन्यवस्तुना भान विना, आत्मदर्शन ने आत्मज्ञान विना एकली क्रियाओ करी-करीने एणे आत्माने मरणतुल्य करी नाख्यो छे.

देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो राग, पंचमहाव्रतना पालननो राग तथा स्वाध्यायनो विकल्प इत्यादि बधो शुभराग छे; एने ओळंगी जईने, जेम दरियाना तळिये जतां मोती हाथ आवे तेम, अंतरमां डूबकी लगावतां चैतन्यप्रभु आत्मा हाथ आवे छे; आने निश्चय सम्यग्दर्शन कहे छे, तथा अंतर्मुख थतां जे स्वसंवेदन ज्ञान थाय ते सम्यग्ज्ञान छे, तथा अंतर-लीनता थाय ते सम्यक्चारित्र छे. अहाहा...! आ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप भेदो ते- पणा वडे आत्मा स्वयं साधकपणे थाय छे, अर्थात् मोक्षना उपायपणे स्वयं आत्मा थाय छे. ल्यो, आवी वात! पण अरेरे! रागनी आडशमां एने आवडो महान ‘अनंत सुखथी भरियो, अनंत गुणनो दरियो’ द्रष्टिमां आवतो नथी. अनेक व्रत, तप करवा छतां तेने साधकपणुं प्रगटतुं नथी. समजाय छे कांई...?

हवे कहे छे-‘तथा परम प्रकर्षनी हदने पामेला रत्नत्रयनी अतिशयताथी प्रवर्तेलो जे सकळ कर्मनो क्षय तेनाथी प्रज्वलित (देदीप्यमान) थयेलो जे अस्खलित विमळ स्वभावभाव ते-पणा वडे पोते सिद्ध रूपे परिणमतुं एवुं एक ज ज्ञानमात्र उपाय-उपेयभाव साधे छे.’

जुओ, अहीं एम कहे छे के-अंदर स्वरूपमां मग्न-लीन थतां जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगटया ते रत्नत्रय छे. तेनी परम प्रकर्षरूप उत्कृष्ट दशा थतां अर्थात् भगवान आत्मानो पूर्ण आश्रय थतां तेना फळरूपे मोक्षदशा प्रगट थाय छे. अहा! रत्नत्रयनी अतिशयताथी प्रवर्तेलो जे सकळ कर्मनो क्षय तेनाथी प्रज्वलित थयेलो जे अस्खलित विमळ स्वभावभाव ते पूर्ण मोक्षदशा छे.

प्रश्नः– उपवास करवाथी कर्मनो क्षय थई जाय छे ए बराबर छे? उत्तरः– ना, ए बराबर नथी. दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी परम प्रकर्षरूप अतिशयता विना कर्मनो क्षय थतो नथी. उपवासथी कर्मनो क्षय थाय छे एम कहेवुं ए उपचारमात्र कथन छे. अरे, स्वरूपना आश्रये प्रगटवा योग्य एवां सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र विना एणे उपवासादि बाह्य करणी अनंत वार करी; पण एथी शुं? एनो संसार मटयो नहि, भवना निवेडा आव्या नहि. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी विशेषताथी आस्रवोनो निरोध थाय छे, ने कर्मनो क्षय थाय छे. रत्नत्रयनी परम प्रकर्षरूप अतिशयताथी सकळ कर्मनो क्षय थाय छे, अने त्यारे अंदर प्रगट थयेलो अस्खलित उज्ज्वळ विमळ स्वभावभाव-केवळदर्शन-केवळज्ञान-अनंतसुख इत्यादिरूप स्वभावभाव-ते रूपे परिणमवुं ते मोक्षदशा छे. अहाहा...! आवी मोक्षदशा अस्खलित छे; जेने थई ते थई, फरी ते संसारमां आवे नहि.

तो जगतमां पाप वधी पडे त्यारे भक्तोनी रक्षा करवा भगवान अवतार ले छे ए शुं वात छे? ए तो लौकिक मान्यता छे, ए वातमां कांई तथ्य नथी. अस्खलित एटले फरे नहि, पडी जाय नहि एवा पूर्ण विमळ स्वभावभावे उपज्यो ते सिद्धरूपे परिणम्यो, हवे ते संसारमां अवतरे नहि, केमके संसारमां अवतरे एवुं कोई कारण ज रह्युं नथी.

अहाहा...! ज्ञानस्वभाव त्रिकाळ एकरूप होवा छतां, पर्यायमां साधकपणे अने सिद्धपणे-एम बे-पणे पोते थाय छे. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र एम साधकरूपे अने तेनी उत्कृष्ट दशा थतां सिद्धरूपे-एम बे रूपे पोते ज प्रगट थाय छे. ए बन्ने भगवान आत्मानी अवस्थाओ छे ने ते-रूपे ते पोते ज परिणमे छे, अने कोई बाह्य व्यवहारनी गरज-अपेक्षा नथी. यद्यपि बाह्य व्यवहार होय छे, पण धर्मात्माने ए कांई नथी, एने ओळंगीने ते क्रमे सिद्धरूपे पोते परिणमी जाय छे.

प्रश्नः– जो व्यवहार-शुभभाव जराय मददगार नथी तो एने शास्त्रमां साधक केम कह्यो छे? उत्तरः– धर्मी पुरुषने तेनी वर्तमान प्रगट निर्मळ दशाने ते (-व्यवहार) विक्षेप करतो नथी तेथी सहचर देखीने उपचारथी साधक कह्यो छे. भाई, तारे जो मोक्ष ज जोईए छे तो स्व-आश्रये सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूपे परिणमवुं पडशे; आ एक ज मोक्षमार्ग छे, अने ते-रूपे उत्कृष्ट परिणमतां केवळज्ञान प्राप्त थाय छे. बापु! आ तो प्राप्तनी प्राप्तिनो स्व-आश्रयनो मार्ग छे. जेम लींडी पीपरमां चोसठ पहोरी तीखाश छे तो तेने घूंटता बहार अवस्थामां प्रगट थाय छे, तेम भगवान आत्मा स्वभावथी मोक्षस्वरूप छे तेमां एकाग्र-पूर्ण एकाग्र थतां बहार अवस्थामां मोक्षदशा प्रगटे छे.