२२६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ आम दर्शन, ज्ञान, चारित्र, सुख, वीर्य इत्यादि अनंत रत्नो अंदर स्वभावरूपे आत्मामां पडयां छे ते अंतर- एकाग्रताना पुरुषार्थथी बहार पर्यायरूपे प्रगट थाय छे. आवो मारग छे.
साधकने किंचित् राग रही जाय ने आयुष्य पूरुं थई जाय तो ते स्वर्गमां जाय छे. त्यांथी मनुष्यपणे अवतरीने अंतरना साधनथी-निज स्वभावना साधनथी ते सिद्ध थाय छे. अहा! धर्मीनी द्रष्टिमां तो निरंतर पोतानो भगवान आत्मा ज तरवरतो होय छे, ते सिवाय व्यवहारनो भाव होय छे तेने ते हेय ज जाणे छे. अहाहा...! जे भावे तीर्थंकर गोत्र बंधाय ते भाव पण तेने हेय ज थई गयो होय छे. अहा! अलौकिक चैतन्यनिधान अंदर भाळ्यां एने पुण्यथी शुं काम छे? हवे एने पुण्यनुं लक्ष ज नथी. शुं थाय? अरेरे! एणे निजघरनी अनंत अलौकिक रिद्धिनी कोई दि’ वात सांभळी नथी.
प्रश्नः– तो लोको (धर्मी पुरुषो पण) जात्राए केम जता हशे? उत्तरः– जे क्षेत्रथी परमात्मा सिद्ध थया होय तेनी समश्रेणीए उपर सिद्धालयमां सिद्ध परमात्मा बिराजे छे तेनुं स्मरण थाय ते माटे जात्रा छे. पण ए शुभभाव छे; व्यवहारे जात्रा कहेवाय, निश्चय जात्रा तो एवा रागने छोडी अंदर स्वरूपमां ठरे त्यारे थाय छे. आवी वात छे. शुं थाय? वादविवादे जगतने मारी नाख्युं छे. (आम ने आम) सत्ने समजवाना दिवसो चाल्या जाय छे भाई! तुं माने के हुं मोटो थाउं छुं, पण वास्तवमां तुं मृत्युनी समीप जाय छे बापु! हमणां आ नहि समजे तो कयारे समजीश? (एम के पछी समजवानो दाव नहि होय).
अहा! जेणे स्व-आश्रये मोक्षमार्ग प्रगट कर्यो तेने ए निश्चत छे के अल्पकाळमां केवळज्ञान थईने सिद्धदशा थशे. आम आत्मा बहुरूपीओ छे, उपाय अने उपेय-एम बन्नेरूपे पोते ज परिणमे छे, साधक अने सिद्धपणे पोते ज थाय छे.
‘आ आत्मा अनादि काळथी मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रने लीधे संसारमां भमे छे.’ जुओ, जीव कर्मने लईने संसारमां रखडे छे एम नहि, पण अनादि काळथी एने जे स्वस्वरूपनां विपरीत श्रद्धान-ज्ञान ने आचरण छे तेने लीधे ते संसारमां रखडे छे. जीव कर्मना निमित्ते संसारमां रखडे छे एवुं कथन शास्त्रमां आवे खरुं, पण ए तो व्यवहारनयनी कथनी छे, वास्तवमां एम छे नहि.
शुद्ध चिदानंदघन प्रभु आत्मा पोते छे, तेनाथी विपरीत रागनी ने कर्मनी श्रद्धा ते मिथ्या श्रद्धा छे, पोते ज्ञानानंद-स्वरूप छे तेनुं ज्ञान न करतां रागनुं ने कर्मनुं ज्ञान करवुं ते मिथ्याज्ञान छे. आ मिथ्याश्रद्धान ने मिथ्याज्ञान ते संसार-परिभ्रमणनुं मूळ छे.
कळशटीकामां ‘नमः समयसाराय’ इत्यादि पहेला कळशमां आवे छे के-“शुद्ध जीवने सारपणुं घटे छे. सार अर्थात् हितकारी, असार अर्थात् अहितकारी. त्यां हितकारी सुख जाणवुं, अहितकारी दुःख जाणवुं, कारण के अजीव पदार्थने-पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काळने-अने संसारी जीवने सुख नथी, ज्ञान पण नथी, अने तेमनुं स्वरूप जाणतां जाणनहार जीवने पण सुख नथी, ज्ञान पण नथी, तेथी तेमने सारपणुं घटतुं नथी.” जुओ, शुं कीधुं आ? के १४८ प्रकृति अजीव छे, ने संसारी जीव रागी छे-तेने जाणतां जाणनहारने ज्ञानेय नथी ने सुखेय नथी. एक ज्ञायकना ज्ञान विना परवस्तुने जाणवाथी कोई ज्ञान अने सुख थतुं नथी. एवुं जाणपणुं मिथ्याज्ञान छे, संसारनुं कारण छे.
निगोदना जीवो पण मिथ्या श्रद्धान-ज्ञान-आचरणरूप प्रचुर भावकलंकने लईने ज त्यां ने त्यां निगोदमां सबडे छे. अहा! नित्य निगोदमां रहेलो जीव के जे कोई दिवस त्रस नहि थाय तेय पोताना सच्चिदानंद स्वरूपथी विपरीत एवा रागमां रमणता करवाने लीधे ज संसारमां रवडे छे. आ मूळ वात छे. हवे पोते परिभ्रमण केम करे छे एनी खबर न मळे अने मानी ले के कर्म रखडावे छे तो ते पोतानी भूल कयारे जाणे अने कयारे टाळे? भाई, आ भूल मटाडवानो अवसर चाल्यो जाय छे हों.
हवे कहे छे-‘ते सुनिश्चळपणे ग्रहण करेलां व्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी वृद्धिनी परंपरा वडे अनुक्रमे