स्वरूपनो अनुभव ज्यारथी करे त्यारथी ज्ञान साधक रूपे परिणमे छे, कारण के ज्ञानमां निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप भेदो अंतर्भूत छे. निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी शरुआतथी मांडीने, स्वरूप- अनुभवनी वृद्धि करतां करतां ज्यांसुधी निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी पूर्णता न थाय, त्यांसुधी ज्ञाननुं साधक रूपे परिणमन छे.’
जुओ, अहीं छठ्ठा गुणस्थाननी भूमिकानी वात छे. ते पहेलां एणे निज चैतन्यमूर्ति आत्माने वेदनमां तो लीधो छे, अर्थात् सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र छे. एथी तो कह्युं के-‘सुनिश्चळपणे ग्रहण करेला’-मतलब के निश्चयनी साथे भूमिकाने योग्य व्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र जे होय ते एने आव्यां छे. एनो बीजो अर्थ एम पण छे के अंदर जे निश्चय प्रगटयुं ते हवे जाय नहि, अर्थात् हवे ते हेठे उतरे नहि पण व्यवहार छोडीने अंदरमां जाय. आवो व्यवहार बीजे (बीजा कोई गुणस्थानके) नथी. निश्चय तो अंदर छे, ने व्यवहारने ओळंगीने सातमा अप्रमत्त गुणस्थानमां जशे-आमां एम कहेवुं छे. समजाणुं कांई...? साधु छे ने? स्वरूपथी च्युत हतो ते स्वरूपमां आव्यो- चढयो. पहेलां पांचमा गुणस्थानेथी ध्यानमां पहेलुं सातमुं गुणस्थान आवे छे, पण ए वात अहीं नथी; अहीं तो छठ्ठे गुणस्थाने शुभ विकल्प आवे छे तेने ओळंगी जईने स्वरूपमां जवानी-चढवानी वात छे. अहो! दिगंबर संतोए सूरजनी जेम मार्ग स्पष्ट प्रकाश्यो छे. द्रष्टि विना लोकोने हाथ न आवे तेथी शुं मार्ग बीजो थई जाय? न थाय.
ल्यो, हवे कोई कहे छे-तमे व्यवहारनो लोप करो छो. पण जे ते गुणस्थाने जे व्यवहार (व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प) होय छे तेनो कोण लोप करे? ते ते गुणस्थाने तो ते छे ज; अहीं तो तेने ओळंगीने आगळ जवानी-चढवानी वात छे. धर्मीने यथासंभव व्यवहारनो विकल्प होय छे, पण तेमां तेने उपादेयबुद्धि अने स्वामित्व होतां नथी; अने एना बळे ज ते उंचे-उंचे आरोहण करे छे. समजाणुं कांई...?
‘ते सुनिश्चळपणे ग्रहण करेलां व्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी वृद्धिनी परंपरा वडे’... ल्यो, हवे व्यवहार- सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र-व्यवहाररत्नत्रय ए तो शुभ विकल्प-राग छे; तेनी वृद्धिनी परंपरा वडे एटले शुं? एटले रागनी वृद्धिनी परंपरा वडे-एम अर्थ नथी, केमके व्यवहारनो-रागनो तो क्रमशः (आगळ आगळ) अभाव थतो जाय छे, अने अंदर शुद्धि वधती जाय छे. आ तो शुद्धि वधती जाय छे तेनो आरोप व्यवहार उपर करी ‘व्यवहारनी वृद्धि वडे’-एम कह्युं छे. ‘व्यवहाररत्नत्रयनी वृद्धिनी परंपरा वडे’ एम कह्युं ए तो व्यवहारनयनुं कथन छे. व्यवहार नयनां कथन आवां ज होय छे तेने जेम छे तेम समजवां जोईए. वास्तवमां राग तूटतो जाय छे, ने अंदर शुद्धि वधती जाय छे ते वडे अनुक्रमे स्वरूपनो अनुभव ज्यारथी करे त्यारथी ज्ञान नाम आत्मा साधक रूपे परिणमे छे. आवी वात!
‘अनुक्रमे स्वरूपनो अनुभव ज्यारथी करे त्यारथी ज्ञान साधकरूपे परिणमे छे’-आम कह्युं एमां आत्मा पोते साधकरूपे थाय छे, व्यवहार साधक रूपे थाय छे एम नहि. अहाहा...! भगवान पूर्णानंदनो नाथ अंदर छे एनां द्रष्टि-ज्ञान ने रमणतां थयां छे एनो उपयोग ज्यारे निर्विकल्प थयो, शुद्धोपयोगरूप परिणत थयो, अर्थात् उपयोग निर्विकल्प ज्ञाननी भूमिकामां आव्यो त्यारथी ते आत्मा साधकपणे परिणम्यो. एमां सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र एवा भेदो अंतर्भूत छे. भेदो छे खरा, पण मोक्षमार्गनी परिणतिमां त्रणे अभेद एकरूप छे. हवे मोक्षमार्गनी परिणतिमां त्रण भेदोनुं पण लक्ष नथी त्यां व्यवहारनी-रागनी शुं कथा? रागनो तो एमां अभाव ज छे. समजाणुं कांई...?
जुओ, साधकदशा चोथेथी बारमा गुणस्थान सुधीनी छे. स्वरूपनो अनुभव ज्यारथी करे त्यारथी आत्मा शुद्ध दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी एक्तारूपे पोते परिणमे छे. ते साधकपणे परिणमे एमां एने बहारमां व्यवहारनां साधन छे तेथी परिणमे छे एम नथी. व्यवहार होय छे तेने जणाव्यो छे, परंतु एने लईने साधकपणे परिणमे छे एम नथी, एकलो ज्ञानस्वभावी आत्मा ज उपाय-उपेयभावे परिणमे छे. अहा! पर साधन विना ज, व्यवहारना साधन विना ज, चैतन्य जेनुं सर्वस्व छे एवी आत्मवस्तु पोते ज पोताथी साधकपणे अने साध्यपणे परिणमे छे. त्यारे कोई कहे छे-
शुं आ एकांत नथी? हा, एकांत छे, पण सम्यक् एकांत छे; केमके स्व तरफ ढळेली निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी दशा-ते ज एकांते निश्चय साधक छे; वच्चे व्यवहाररत्नत्रयना विकल्प आवे खरा, पण ते निश्चय साधक नथी, खरेखर तो ए बाधक छे; तेमने साधक व्यवहारनयथी कहेवामां आवे छे, पण ए तो उपचारमात्र छे.