Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११

निश्चय अने व्यवहार (रत्नत्रय) छे एक बीजाथी विरोधी, पण सम्यग्दर्शन अने मिथ्यादर्शनने साथे रहेवामां जेम विरोध छे तेम, ज्ञान ज्यांसुधी पूर्णताने न पामे त्यांसुधी, ज्ञान अने रागने साथे रहेवामां विरोध नथी. शास्त्रमां तेमनी परस्पर मैत्री पण कही छे. पण मैत्रीनो अर्थ ए स्थानमां (भूमिकामां) बे साथे होय छे एटलुं ज बस. व्यवहार छे माटे निश्चय प्रगटे छे, वा व्यवहारथी निश्चय प्रगटे छे एम एनो अर्थ नथी. मैत्री एटले मदद करे छे एम एनो अर्थ नथी; केमके निश्चय स्व-आश्रये प्रगट थाय छे, ने व्यवहार पर-आश्रये प्रगटे छे, निश्चय (मोक्षमार्ग) अबंध मोक्षनुं कारण छे, ने व्यवहार (मोक्षमार्ग) बंधनुं कारण छे. बन्ने छे तो तद्न विरुद्ध, पण ए जातनो व्यवहारनो विकल्प ए स्थानमां श्रद्धा-ज्ञान ते स्थिरताने बाधा करतो नथी, पण तेने ओळंगीने ज विशेष-विशेष स्थिरतानां स्थानो प्राप्त थाय छे, भाई, वस्तुस्थिति जेम छे तेम राख. तेने फेरववाना विकल्पथी शुं साध्य छे? अंतरना आश्रयमां उपयोग रहे बस ए एक ज मार्ग छे. वचमां व्यवहार आवे, पण ए सत्यार्थ मार्ग नथी. अरे! तीर्थंकर अने केवळीना विरह पडया अने लोको विवादमां पडी गया!

भावपाहुडमां आवे छे के-भाई, अंदर चिदानंद चैतन्य परमेश्वर प्रभु तुं छो, तेना आश्रय विना तारा बधा क्रियाकांड फोगट गया, केमके रागनी ए बधी क्रिया आत्माने धर्मनुं साधन नथी. अहा! आवा क्रियाकांड तें अनंत वार कर्या, पण ते तने साधन न थया. भाई, एक स्वना आश्रये ज धर्म-वीतरागता प्रगटे छे. आ एक ज मार्ग छे. आवी वस्तुस्थिति छे. साधकपणानी शरुआत स्व-आश्रये स्वानुभवथी थाय छे, ने तेनी वृद्धि अने पूर्णता पण स्व-आश्रये स्वानुभवथी थाय छे. समयसार नाटकमां आवे छे ने के-

अनुभव चिंतामनि रतन, अनुभव है रसकूप;
अनुभव मारग मोखकौ, अनुभव मोख सरूप.

अहाहा...! स्वानुभवनी सिद्धि थतां, गुलाब जेम लाख पांखडीए खीली उठे तेम, चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा अनंत पर्याय-पांखडीए खीली उठे छे. अहा! मुनिदशानी तो शी वात! एने तो प्रचुर स्वसंवेदननी दशा छे. अहाहा...! प्रचुर एटले पुष्कळ, स्व एटले पोताथी, सम् नाम प्रत्यक्ष आनंदनुं वेदन-एवी अलौकिक मुनिदशा छे. एनो जे उपासक थाय तेय समकिती थई जाय छे; केमके जेणे गुरुने ओळख्या तेणे सात तत्त्व जाण्यां छे. ने तेणे पोताना आत्मानेय जाण्यो-ओळख्यो छे. अहाहा...! साधु-गुरु कोने कहीए? स्वरूपनी अति उग्र रमणता ते साधुदशा छे. प्रवचनसारमां साधुने मोक्ष तत्त्व कह्युं छे. मोक्षनी तळेटीमां विराजे छे ने! अहाहा...! ज्यांसुधी शुद्ध रत्नत्रयनी पूर्णता न थाय त्यांसुधी ज्ञाननुं साधकपणे परिणमन छे, ते अपूर्व एवुं अलौकिक परिणमन छे. समजाय छे कांई...?

हवे कहे छे-‘ज्यारे निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी पूर्णताथी समस्त कर्मनो नाश थाय अर्थात् साक्षात् मोक्ष थाय त्यारे ज्ञान सिद्ध रूपे परिणमे छे, कारण के तेनो अस्खलित निर्मळ स्वभावभाव प्रगट देदीप्यमान थयो छे.’

जुओ, निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी पूर्णताथी समस्त कर्मनो नाश थाय एम कह्युं ए व्यवहारनयनुं कथन छे. कर्म तो परद्रव्यनी दशा छे, एनो क्षय तो एना कारणे थाय छे. कर्मनो क्षय थवानो. ए ज काळ छे, बाकी केवळज्ञान आत्मामां प्रगट थयुं एनाथी कर्मनो क्षय थयो छे एम नथी, अने कर्मना क्षयना कारणे अहीं केवळज्ञान थयुं छे एमेय नथी. आ तो व्यवहारनयनी कथनपद्धति आवी छे बापु! बाकी शुं परद्रव्यनी पर्याय आत्मा करे? ना करे, कदीय ना करे. आत्मा सिद्धरूपे परिणमे ते आत्मानी दशा छे, ने कर्मनो क्षय ते तेनी-परमाणुनी दशा छे. बन्ने भिन्न भिन्न परिणमन पोतपोताथी छे. आवी वात!

स्व-आश्रये स्वानुभव थतां, तथा तेमां वृद्धि थतां ज्यां पूर्णदशाने पर्याय प्राप्त थई, पूर्ण केवळज्ञान प्रगट थयुं ते हवे अस्खलित-पाछुं फरे नहि एवो एनो निर्मळ स्वभावभाव छे. अहाहा...! जेवो पूर्ण केवळज्ञानस्वभाव द्रव्यरूपे छे तेवी पूर्ण केवळज्ञान ज्योति झळहळती पर्यायरूपे प्रगट थई गई ते हवे पडे नहि तेवो स्वभावभाव छे. आने अरिहंत अने सिद्धनी परमात्मदशा कहे छे. हवे अहीं तो व्यवहाररत्नत्रयनुं नाम-निशानेय ना रह्युं. समजाणुं कांई...?

भाई! आ तारा घरनी ने तारा हितनी वात छे. अरे, अनंत काळमां प्रभु! तें शुं शुं ना कर्युं? बधुं ज कर्युं, एक स्व-आश्रय ना कर्यो. जीव ज्यारे स्व-आश्रये स्वाभिमुख थई परिणमशे त्यारे एने धर्म थशे. अहाहा...! त्रणलोकनो नाथ चैतन्यमहाप्रभु अंदर विराजे छे तेना आश्रयमां-शरणमां ज्यां गयो त्यां ए मोटानी ओथे गयो; हवे एने शुं चिंता छे? केवळज्ञान थशे ज थशे. बीज उगे ते पूनम थाय, तेम साधकपणुं प्रगटयुं ते सिद्ध थशे ज थशे. साधकनी