सिद्धदशा थये ज छूटको. धवलमां आवे छे के-स्वना आश्रये प्रगटेल सम्यक् मति-श्रुतज्ञान केवळज्ञानने बोलावे छे; एनो अर्थ शुं? ए ज के तेने अल्पकाळमां हवे केवळज्ञान थशे; केवळज्ञान हवे हाथवेंतमां छे; जेम चंद्र सोळे कलाए खीले तेम अल्पकाळमां भगवान आत्मा सोळे कलाए खीली केवळज्ञानपणे झळहळ देदीप्यमान प्रगटशे. आवी अद्भुत वात!
हवे सरवाळो करे छे के-‘आ रीते साधक रूपे अने सिद्ध रूपे-बन्ने रूपे परिणमतुं एक ज ज्ञान आत्मवस्तुने उपाय-उपेयपणुं साधे छे.’ ल्यो, उपाय-उपेयपणुं, साधक-साध्यपणुं-बन्ने आत्मानी अवस्थाओ होवाथी आत्मवस्तुमां ज समाय छे. व्यवहार होय छे, ‘सुनिश्चळपणे ग्रहण करेलां’ एक कह्युं, पण एनो अर्थ व्यवहारने जाणेलो-जाणवामां आवेलो एम थाय छे. ग्रहणनो अर्थ जाणवुं थाय छे. व्यवहारने आदरवो एवो अर्थ अहीं छे ज नहि. ग्रहण एटले जाणवुं-एवो अर्थ मोक्षमार्गप्रकाशकमां कर्यो छे. समयसार गाथा १२नी टीकामां पण व्यवहार जाणेलो प्रयोजनवान कह्यो छे. भाई, आ तो तत्त्वने यथार्थ समजी अंतरमां उतरी जवानो मार्ग छे. आवो अवसर मळ्यो ने न समज्यो तो कयारे समजीश? आ मनुष्यपणुं एमने एम विंखाणुं (छूटी गयुं) तो पछी अवसर नहि आवे. हवे टीकामां विशेष कहे छे;-
‘आ रीते बन्नेमां (-उपायमां तेम ज उपेयमां-) ज्ञानमात्रनुं अनन्यपणुं छे अर्थात् अन्यपणुं नथी.’ जुओ, श्रीमद् आचार्य अमृतचंद्रदेव कहे छे-भाई, सांभळ. अंदर एक ज्ञानानंदस्वरूपी चैतन्यमूर्ति प्रभु तुं आत्मा छो. तेमां अंतर-एकाग्र थतां, ज्ञान, श्रद्धा, आनंद, शांति, स्थिरता, प्रभुता इत्यादि एक साथे पर्यायमां प्रगट थाय छे. अहा! आवी स्वरूपमां रमणतारूप निर्विकल्प परिणति ते उपाय नाम साधकपणुं छे. व्यवहार वचमां हो, पण ते साधकपणुं नथी. आ जे (बार प्रकारे) व्यवहार तप छे ते साधकपणुं नथी; केम? केमके तेमां आत्मा अनन्य नथी. समजाणुं कांई...?
अहाहा...! कहे छे-निर्मळानंदनो नाथ प्रभु आत्मा छे, एनुं साधकपणुं (उपाय) ते आनंदनी पर्याय छे, ने एनुं साध्यपणुं (उपेय) तेय पूर्ण आनंदनी पर्याय छे. अहाहा...! ए बन्ने रूप एकला ज्ञानमात्र-चैतन्यचमत्कार प्रभु आत्मानुं ज भवन-थवापणुं छे; उपाय अने उपेयमां-बन्नेमां एक आत्मवस्तु ज अनन्य छे, परद्रव्य के रागादि व्यवहारनो विकल्प तेमां अनन्य नथी. एटले शुं? के दया, दान, व्रत, तप इत्यादि जे बाह्य व्यवहार छे ते निश्चय रत्नत्रयनुं कारण नथी. अहाहा...? उपाय एटले मोक्षमार्ग, ने उपेय एटले एना फळरूपे प्रगट सिद्धदशा-ए बन्नेमां, कहे छे, आत्मा ज अनन्य छे.
वचली भूमिकामां देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धा, ने पंचमहाव्रतादि रागनी मंदतानो भाव होय छे एटलुं बताववा व्यवहारनी वात करी छे, पण ए निश्चयपणे साधकपणुं के मोक्षमार्ग छे एम छे ज नहि; केमके एमां आत्मा-ध्रुव चैतन्यनुं दळ अनन्य नथी. शुद्ध चैतन्य वस्तुमां थोडी लीनता-तेरूप जे मोक्षमार्ग, ने पूर्ण लीनता-तेरूप जे मोक्ष-ए बन्नेमां ज्ञानमात्र शुद्ध चैतन्यवस्तु ज अनन्य अर्थात् एकमेक छे. साथे राग छे ए तो बंधभाव छे, साधकपणाने विघ्नरूप छे, झेर छे. निर्मळ रत्नत्रय ते अमृत छे, ने राग तो झेर छे; एनाथी (-रागथी) अमृतमय एवो मोक्षमार्ग केम थाय? न थाय. आवी अपूर्व वात छे. व्यवहारना पक्षवाळाने आ आकरी लागे छे, पण शुं थाय? आ तो वस्तु ज आवी छे.
बहारमां तो व्रत करो, ने तपस्या करो, ने पूजा-भक्ति करो एटले थई गयो धर्म एवुं सांभळवा मळे छे, पण एवी प्ररूपणा सत्य नथी, केमके ए बधा विकल्पमां चैतन्य वस्तु अनन्य-तन्मय थती नथी. निश्चयनी स्थिरता होय छे त्यां साथे आवो व्यवहार होय छे तेने उपचारथी धर्म कहेवामां आवे छे, पण वास्तवमां ते धर्म नथी. धर्म नथी तेने उपचार करीने धर्म कहेवो ते व्यवहारनय छे, पण एमां धर्म मानवो ए तो मिथ्यात्व छे, महान भूल छे. व्यवहार सुधरे तो निश्चय सुधरशे एम केटलाक माने छे, पण ए बराबर नथी, अहीं एनी ना पाडे छे. शुं कोलसो काळो छे ते धोवाथी सफेद थाय? न थाय. ए तो कोलसाने बाळी दे तो उज्ज्वळ सफेद थाय; तेम व्यवहारने (स्वना आश्रये) बाळी मूके तो उज्ज्वळ पवित्र मोक्षमार्ग ने मोक्षनी दशा थाय.
भाव पाहुड, गाथा ८३मां आवे छे के-जिनशासनमां जिनेन्द्रदेवे आ प्रकारे कह्युं छे के-पूजा आदिकमां तथा व्रतसहित होवुं एमां ‘पुण्य’ छे, तथा मोह-क्षोभथी रहित जे आत्माना परिणाम ते ‘धर्म’ छे. त्यां एना भावार्थमां