Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ खुलासो कर्यो छे के-लौकिक जन तथा अन्यमती कोई कहे छे के-पुजादिक शुभ क्रियाओमां तथा व्रतक्रिया सहित छे ते जैन धर्म छे, परंतु एम नथी. जिनमतमां जिन भगवाने एम कह्युं छे के-पूजादिकमां तथा व्रतसहित होवुं ते तो ‘पुण्य’ छे. एमां पूजा तथा आदि शब्दथी भक्ति, वंदना, वैयावृत्य आदि समजवुं. एनुं फळ स्वर्गादिक भोगोनी प्राप्ति छे, ते जैनधर्म नथी. जुओ आ जैनशासननुं रहस्य!

आवी चोख्खी वात छे तो पण व्यवहारवादीओनुं शल्य मटतुं नथी ए तीव्र मोहनो ज महिमा छे. समयसार गाथा १पमां कह्युं छे के-जे आ अबद्धस्पृष्टादि पांच भावोस्वरूप निज आत्माने अंतरमां देखे छे ते सकल जैनशासनने देखे छे. जैन शासन ए तो वीतराग परिणति छे भाई! व्यवहार-राग ए जैनशासन नथी. व्यवहार हो भले, होय छे एटले एनुं कथन पण छे, पण ए जैनशासन नथी. मार्ग तो आवो छे भाई! चैतन्य रत्नाकर प्रभु पोते छे तेमां उंडा उतरी तेने ज ध्याननुं ध्येय बनावतां ते पोते ज श्रद्धा-ज्ञान-आनंदपणे परिणमे छे तेने ज अहीं उपाय कहेवामां आवे छे, अने तेटलुं जैनशासन छे. समजाणुं कांई...?

भाई, आवुं मांड मनुष्यपणुं मळ्‌युं ए तो वीजळीनो झबकारो छे. आ वीजळीना जबकारे सम्यग्ज्ञानरूपी दोरो परोवी ले तो परोवी ले, दोरो ना परोव्यो तो, दोरा विनानी सोय जेम कयांय खोवाई जाय तेम सम्यग्ज्ञानरूपी दोरा विना, आ देह छूटतां, भगवान! तुं कयांय संसारमां खोवाई जईश, पत्तोय नहि लागे. सम्यग्ज्ञानरूपी दोरो परोव्यो हशे तो पोते खोवाशे नहि, अल्पकाळमां मोक्षधाम पहोंची जशे.

अहा! पोते स्वनो आश्रय करे एनाथी ज धर्म अने एनाथी ज मुक्ति थाय छे. आ स्वनो आश्रय ते निश्चय छे, ने तेमां व्यवहारनयनी उपेक्षा छे. स्वना आश्रयमां व्यवहारनी उपेक्षा ते ज तेनी अपेक्षा-सापेक्षता छे. व्यवहारनो आश्रय ते सापेक्षता-एम नहि, पण निश्चयनो आश्रय लेवो तेमां व्यवहारनी उपेक्षा ते तेनी सापेक्षता छे. स्वना आश्रयमां व्यवहारनयनी (एना विषयनी) उपेक्षा ज होय छे. प्रमाणज्ञानमां बन्नेनुं (द्रव्य-पर्यायनुं) ज्ञान वर्ते छे, पण आश्रय तो एक स्वद्रव्यनो ज होय छे अने तेमां व्यवहारनी उपेक्षा ज होय छे, अने ते ज तेनी सापेक्षता छे. समजाणुं कांई...?

मोक्षमार्ग प्रकाशकमां (सातमा अधिकारमां) आवे छे के-‘जे जीवो जैन छे, तथा जिन आज्ञाने माने छे, तेमने पण मिथ्यात्व रहे छे, तेनुं अहीं वर्णन करीए छीए. कारण के ए मिथ्यात्व शत्रुनो अंश पण बूरो छे, तेथी ए सूक्ष्म मिथ्यात्व पण त्यागवा योग्य छे.’ तेमां ज वळी आगळ कह्युं छे के-‘जिनागममां निश्चय-व्यवहाररूप वर्णन छे, तेमां यथार्थनुं नाम निश्चय तथा उपचारनुं नाम व्यवहार छे. तेना स्वरूपने नहि जाणतां अन्यथा प्रवर्त छे, ते अहीं कहीए छीए.’ भाई, जरा धीरा थईने आ समजवुं जोईए. (नयविवक्षा यथार्थ जाणवी जोईए.) में आम मान्युं छे माटे आम ज साबित थाय एम न होय; जेवी वस्तु छे तेवी ज लक्षमां ने अभिप्रायमां आववी जोईए. आवो भव के दि’ मळे बापु! हमणां ज आना संस्कार नाखी ले.

अहीं कहे छे-मोक्षमार्गमां (उपायमां), ने मोक्षमां (उपेयमां) ज्ञानमात्रनुं एटले के आत्मानुं ज अनन्यपणुं छे. व्यवहार-राग तो एनाथी भिन्न ज रही जाय छे. हवे आम छे त्यां एनी (-रागनी) शी अपेक्षा? अहा! पोते शुद्ध चिदानंदघन प्रभु छे, ने एना आश्रये राग रहित वीतरागी निर्मळ रत्नत्रयनी आनंदमय दशा प्रगट थाय छे ते उपाय छे, अने ते उपायनी परिणति अति उग्र थई परम प्रकर्षताने पामी उपेयपणे थाय छे त्यारे आत्मा पोते ज सिद्धपणाने पामे छे. आम जीवनी ज आ बे-निर्मळ ने पूर्ण निर्मळ अवस्थाओ छे.

हा, पण एनुं कोई साधन तो हशे ने? साधन? साधन गुण वडे आत्मा पोते ज साधन थईने साधकपणे अने सिद्धपणे परिणमे छे. साधन वस्तुनी ज शक्ति छे त्यां एने बीजा साधननी शुं अपेक्षा छे? भाई, आवो अलौकिक मारग छे. आ समज्या विना भले अहीं लाखो-करोडोना बंगलामां पडयो होय, पण मरीने कयांय ढोरमां-कागडे-कूतरे-कंथवे चाल्या जशे. आवी स्थिति छे.

आ रीते उपाय तेमज उपेयमां आत्मानुं अनन्यपणुं छे, राग तेमां अनन्य नथी, माटे कहे छे-‘माटे सदाय अस्खलित एक वस्तुनुं (-ज्ञानमात्र आत्मवस्तुनुं-) निष्कंप ग्रहण करवाथी, मुमुक्षुओने के जेमने अनादि संसारथी भूमिकानी प्राप्ति न थई होय तेमने पण, तत्क्षण ज भूमिकानी प्राप्ति थाय छे.’