Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कळश-२६पः २३१

अहाहा...! शुं कहे छे? के सदाय अस्खलित-अचलित एवो-चैतन्यमूर्ति प्रभु आत्मा छे. तेने निष्कंप ग्रहण करवाथी अर्थात् निर्विकल्प ज्ञाननी परिणतिमां पकडवाथी-जाणवाथी मुमुक्षुओने-के जेमने अनादि संसारथी भूमिकानी एटले के सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थई न होय तेमने-तत्काल ज सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थाय छे. जुओ आ उपायनी प्राप्तिनी रीत! शुद्ध आत्माना ग्रहण द्वारा ज सम्यग्दर्शन आदि प्राप्त थाय छे.

हवे अत्यारे तो बस पुण्य करो... पुण्य करो-एम बधे हाल्युं छे, पण पुण्यथी तो स्वर्गादि मळे, ने बहु बहु तो वीतरागदेव अने तेमनी वाणीनो समागम मळे, पण एमां आत्मामां शुं आव्युं? आत्मानो अनुभव तो अंदर अखंड अचलित एक ज्ञायकस्वभावी पोतानी चीज छे तेने स्वाभिमुख ज्ञानमां पकडवाथी थाय छे. अहाहा...! निमित्तनुं ने व्यवहारनुं लक्ष छोडी एक ज्ञायकना लक्षे परिणमे तेने धर्मनुं पहेलुं पगथियुं एवुं सम्यग्दर्शन थाय छे. भाई, पहेलुं लक्षमां तो ले के धर्मनो दोर आ छे, आ सिवाय बहारनी क्रियाना लक्षे सम्यग्दर्शन थाय एवुं वस्तुस्वरूप नथी. समजाय छे कांई...?

पुरुषार्थसिद्धि-उपायमां आवे छे के-मोक्षनो उपाय जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ते बंधनुं कारण नथी. बंधनुं कारण तो योग अने कषाय छे. जेने तीर्थंकर प्रकृति बंधाय छे ते पण ए मोक्षमार्गथी बंधाय छे एम नथी, योग अने कषायथी ज बंधाय छे. निर्विकल्प दर्शन-ज्ञान-चारित्र-तेरूप मोक्षमार्ग ते योग अने कषायरूप नथी, छतां कहेवाय के समकितीने सम्यग्दर्शन देवना आयुना बंधनुं कारण छे. आ व्यवहारनयनुं-उपचारनुं कथन छे. नयना स्वरूपने सम्यक् प्रकारे जाणे छे तेने एमां कांई विरोध जेवुं देखातुं नथी.

जातिस्मरणथी सम्यग्दर्शन पामे, देव-गुरुथी पामे, जिनबिंबना दर्शनथी पामे, इत्यादि शास्त्रमां आवे ए तो कोना उपर लक्ष हतुं ने छोडयुं ते बतावनारां कथन छे. बाकी त्रिकाळी ध्रुवने ध्येय बनावीने ध्यान करवुं-बस ए ज जन्म-मरणना अंतनो उपाय छे. सातमी नरकनो नारकी स्वनो आश्रय लईने समकित पामे छे. आ सिवाय शुं स्वर्गमां के शुं नरकमां-ज्यां जाय त्यां बधे पोतानी शांतिने शेकनारा अंगारा ज छे. जिनबिंबना दर्शनथी निधत्त अने निकाचित कर्मनो क्षय करी समकित पाम्यो एम शास्त्रमां आवे, पण ए तो निमित्तनी मुख्यताथी कथन छे. जिनबिंबना दर्शन काळे तेनुं लक्ष छोडी पोते जे जिनस्वरूप छे तेनुं लक्ष करे तो समकित थाय छे. स्वद्रव्यना आश्रये ज समकित थाय छे आ एक ज रीत छे. भाई, तुं बीजी रीते-दया, दान, व्रत, तपथी थाय एम मान पण ए तो तारी हठ छे. अरेरे! शुं थाय? भवभ्रमणनो एने थाक लाग्यो नथी तेथी संसारथी छूटवुं गोठतुं नथी. घणा दिवसोना केदीनी जेम तेने भवभ्रमण कोठे पडी गयुं छे, एक भवमांथी बीजा भवमां जवा तैयार छे, पण तत्त्वनी वात समजवा ते तैयार नथी; तत्त्व एने गोठतुं नथी.

बाकी जुओ ने, आ शुं कहे छे? अहाहा...! अस्खलित-जेना चैतन्यनो प्रवाह ध्रुव... ध्रुव... ध्रुव एकरूप अचल छे एवा भगवान आत्माने निष्कंप-निर्विकल्प ज्ञाननी दशामां पकडवाथी तेने तत्क्षण ज अपूर्व एवी भूमिकानी अर्थात् सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थाय छे. ल्यो, हवे आ सिवाय बीजी कोई विधि-रीत नथी. गुरुनी कृपाथी समकित थयुं एम कहेवुं ए तो निमित्तनी प्रधानताथी कथन छे. निश्चयथी आत्मानो गुरु आत्मा-पोते ज छे. ज्यारे पोते अंतर्मुख थई समकित प्रगट करे त्यारे गुरु बहारमां निमित्तरूपे होय तो उपचारथी गुरुनी कृपा थई एम कहेवाय छे. समजाणुं कांई...? भाई, उपचारनां-व्यवहारनां कथन जेम छे तेम यथार्थ समजवां जोईए.

हवे कहे छे-‘पछी तेमां ज नित्य मस्ती करता ते मुमुक्षुओ-के जेओ पोताथी ज, क्रमरूप अने अक्रमरूप प्रवर्तता अनेक अंतनी (अनेक धर्मनी) मुर्तिओ छे तेओ-साधकभावथी उत्पन्न थती परम प्रकर्षनी कोटिरूप सिद्धिभावनुं भाजन थाय छे.’

‘पछी तेमां ज नित्य मस्ती करता’... जुओ सम्यग्दर्शन पाम्या पछी स्वरूपमां नित्य मस्ती-केलि करता एम कह्युं छे, व्रत पाळता ने तपस्या करता केवळज्ञान प्रगट करे छे एम कह्युं नथी. ज्ञानानंदस्वरूपी निज भगवान आत्मा अनुभवमां आव्या पछी एमां ज मस्ती-रमणता करता, एमां ज आनंदनी केलि करता मुमुक्षुओ सिद्धिभावनुं भाजन थाय छे.

अहाहा...! सम्यग्दर्शनरूपी धर्मनी धजा जेणे हस्तगत करी छे तेने हवे जगतमां लुंटनाराओ कोई नथी. अहाहा...! ते मुमुक्षुओ निजानंद-ज्ञानानंदस्वरूपमां मस्ती करता-मोज करता-लहेर मारता, पोताथी ज