Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 4151 of 4199

 

२३२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ क्रमरूप-अक्रमरूप प्रवर्तता... , अहाहा...! भाषा तो जुओ, साधक चोथे, पांचमे, छट्ठे वगेरेमां पोताना ज ज्ञानानंदस्वरूपमां लीन प्रवर्ते छे, व्यवहारमां के निमित्तमां लीन थई प्रवर्तता नथी. वळी निष्कंपपणे आत्माने ग्रहण करतां निर्मळ रत्नत्रयनी -अनाकुळ आनंदनी धारा (प्रवाह) जे क्रमे क्रमे प्रगट थई रही छे ते पोताथी ज थई छे, ने अक्रमे गुणो रहेला छे तेय पोताथी ज रहेला छे-आ रीते मुमुक्षुओ पोताथी ज क्रमरूप-अक्रमरूप प्रवर्तता ते अनेक धर्मनी मूर्तिओ छे. अहाहा...! अक्रमे प्रवर्तता अनंत गुण अने क्रमे प्रवर्तती तेनी निर्मळ निर्मळ पर्यायो-ते रूप पोताथी ज थता ते मुमुक्षुओ, कहे छे, अनेक धर्मनी मूर्तिओ छे. गजब वात छे भाई! अहाहा...! तेओ साधकभावथी-निर्मळ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप भावथी उत्पन्न थती परम प्रकर्षनी कोटिरूप, एटले के उंचामां उंची-उत्कृष्ट दशारूप सिद्धिभावनुं भाजन थाय छे; एटले के तेओ सादि-अनंत एवा सिद्धपदने पात्र थाय छे; हवे तेमने फरीने संसार हशे नहि. आवी वात!

अहाहा...! जेने अंतरमां निष्कंप निराकुळ आनंदनी लहेर प्रगट थई ते जीव स्वरूपनी मोज करतो करतो स्वरूपमां ज लीनपणे स्थिति करीने अनंतकाळे नहि प्राप्त थयेल एवा सिद्धपदने प्राप्त करी ले छे. जेमां अनंत सुख, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य इत्यादि प्रगट छे एवा सिद्धपदने ते प्राप्त करी ले छे. जुओ आ स्व- आश्रयनी कमाल! स्व-आश्रये ज साधकपणुं ने स्व-आश्रये ज सिद्धपद प्राप्त थाय छे. आ सम्यक् एकांत छे. एनो निषेध ना कर भाई! भगवान आत्मा शुद्ध चिदानंदघन प्रभु-एनी अंतर-एकाग्रता ते मार्ग छे, एमां द्रव्यांतरनो स्पर्श नथी, व्यवहार एय अनेरुं (बीजुं, पर) द्रव्य छे, एनो एमां स्पर्श नथी. आवी वात!

आम उपाय-उपेयनी वात करी. हवे कहे छे-‘परंतु जेमां अनेक अंत अर्थात् धर्म गर्भित छे एवा एक ज्ञानमात्र भावरूप आ भूमिने जेओ प्राप्त करता नथी, तेओ सदा अज्ञानी वर्तता थका, ज्ञानमात्र भावनुं स्वरूपथी अभवन अने पररूपथी भवन देखता (-श्रद्धता) थका, जाणता थका अने आचरता थका, मिथ्याद्रष्टि, मिथ्याज्ञानी अने मिथ्याचारित्री वर्तता थका, उपाय-उपेयभावथी अत्यंत भ्रष्ट वर्तता थका संसारमां परिभ्रमण ज करे छे.’

अहाहा...! ज्ञान, दर्शन, आनंद इत्यादि अनंत धर्म जेना पेटमां पडया छे एवा त्रिकाळी ध्रुव निज ज्ञानानंदस्वरूपने जेओ प्राप्त करता नथी तेओ अज्ञानमां वर्तनारा छे. अहाहा...! रागना परिणाममां एकत्व करीने वर्तता ते मूढ जीवो सदा अज्ञानरूप वर्ते छे. अहा! जेनी द्रष्टिमां पोतानो ध्रुव चिदानंद भगवान आव्यो नथी, जेने अंतरमां अनाकुळ आनंदनो स्वाद आव्यो नथी एवा जीवो अज्ञानरूप प्रवर्ते छे. बहारमां भले हजारो राणीओ छोडीने नग्न दिगंबर थाय, पंच महाव्रतनुं पालन करे, तप करे, जंगलमां वसे, पण वास्तवमां रागमां वसनारा तेओ अज्ञानी ज छे. अहा! आवा जीवो क्लेश करो तो करो, पण निजानंद-सच्चिदानंद-स्वरूपना भान विना तेमनी मुक्ति थती नथी, तेओ संसारने ओळंगता नथी. एमनां सघळां व्रत ने तप बाळव्रत ने बाळतप ज छे, फोगट ज छे.

तेओ ज्ञानमात्र भावनुं स्वरूपथी अभवन अने पररूपथी भवन देखनारा-श्रद्धनारा छे. एटले शुं? के पोतानो ज्ञानानंद स्वभाव छे तेनुं पोताथी -स्व-आश्रयथी भवन-परिणमन थाय एम नहि, पण परथी-रागनी क्रियाथी एनुं भवन-प्रगटवुं थाय छे एम तेओ माने छे, एम तेओ जाणे छे, ने आचरण पण एम ज करे छे. अहा! आम वर्तता तेओ प्रथम भूमिका जे सम्यग्दर्शन तेने प्राप्त करता नथी; अहा! रागमां जेओ वर्ते छे तेमने स्वभावनुं भवन थतुं नथी; तेमने अज्ञाननुं ज भवन थाय छे. अहा! पोते रागरूपे परिणमे अने माने के मने धर्म थाय छे, वा व्यवहार करतां करतां निश्चय थशे, कांई एम ने एम अद्धरथी धर्म न थई जाय-अहा! आवी मान्यतावाळा मूढ जीवो रागनुं ज ज्ञान-श्रद्धान-आचरण करता थका मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्रपणे ज परिणमी रह्या छे; तेमने साधकभावना अंकुर प्रगटता नथी.

बापु! आ तो वीतरागनो मार्ग छे, आ कोई पक्ष के वाडो नथी. अहाहा...! स्वरूपथी ज भगवान! तुं जिनस्वरूप छो. आवी पोतानी चीज निर्विकल्प द्रष्टि ने ज्ञानमां प्राप्त थाय छे. पण तेने बदले तुं रागनी क्रियाथी प्राप्ति थवानुं मानी रागमां ज रच्यो रहे छे तो तने स्वभावनुं अभवन-अप्राप्ति ज छे, ने अज्ञाननुं भवन-प्राप्ति थाय छे. अमे मुनि छीए, जंगलमां रहीए छीए, अमारे कयां वेपार-धंधानां पाप छे? अमे तो बधुं छोडयुं छे. तेने कहीए-शुं छोडयुं छे? धूळेय छोडयुं नथी सांभळने. मिथ्यात्वनुं महापाप तो ऊभुं छे, पछी शुं छोडयुं?