अहा! स्वरूपनी द्रष्टि विना, अज्ञानी जीव एकला रागना रंगे रंगायो छे. दया, दान, व्रत, तप इत्यादि रागनी क्रियाओमां ते रच्यो रहे छे. ते रागने ज देखे छे, रागने ज सर्जे छे, ने रागने ज आचरे छे. तेने मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्रनुं ज आचरण छे. धर्मनी क्रियानुं तो तेने भानेय नथी. शुद्ध चैतन्यना आश्रये जे निर्विकल्प दशाओ थाय तेनी तो एने गंधेय नथी. तेने स्वभावनुं भवन ज नथी ने! ए तो एकांते रागनी क्रियाओमां धामा नाखीने त्यां ज रमी रह्यो छे. अहा! अनेक क्रियाकांड करवा छतां तेने संसार-परिभ्रमण ज ऊभुं रहे छे; ते संसारमां ज-८४ना अवतारोमां ज -रखडे छे.
अहा! कर्मनुं जोर छे माटे अज्ञानीने स्वरूपनुं अभवन छे एम नथी. एनी उंधी श्रद्धाने लईने एने स्वरूपनुं अभवन छे. पोतानी उंधी श्रद्धानुं जोर छे तेथी अज्ञानी रखडे छे. कर्म मार्ग आपे तो धर्म थाय एम कर्मनां उंधां लाकडां एनामां गरी गयां छे. एम कर्म-कर्मनुं जोर मानीने एणे निज आत्मस्वभावनो त्याग करी दीधो छे. अरे भाई, कर्म छे, पण ए तो जड-धूळ बापु! ए तने शुं करे? तारी द्रष्टि बदल तो सृष्टि बदलाई जशे.
एक वार एक लौकिकमां प्रसिद्ध संत पुरुष राजकोटमां अमारा व्याख्यानमां आवेला. त्यारे कहेलुं के-पर जीवोनी दया पाळवानो भाव ते रागभाव छे, शुभराग छे, बंधनुं कारण छे, ते धर्म नथी. वळी जे जीव माने छे के हुं परनी दया पाळी शकुं छुं ते मूढ छे. रागमां धर्म माने एय मूढ छे, ने परनी दया पाळवानुं माने तेय मूढ छे. तेमने आ वात जची नहि. पण शुं थाय? मिथ्याभाव तो अंतरना पुरुषार्थथी ज मटे ने! स्वरूपने भूली जवुं ते भूल छे, ने पोतानी भूलने लईने ज जीव संसारमां भमे छे. ‘अपने को आप भूल के हेरान हो गया.’ रागनी क्रियामां जे धर्म मानी बेठा छे ते मिथ्याद्रष्टि अज्ञानी जीवो छे, ने ते चार गतिमां परिभ्रमे छे. आवी वात!
हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
भूमिं
मूढास्त्वमूमनुपलभ्य
श्लोकार्थः– [ये] जे पुरुषो, [कथम् अपि अपनीत–मोहाः] कोई पण प्रकारे जेमनो मोह दूर थयो छे एवा थया थका, [ज्ञानमात्र–निज–भावमयीम् अकम्पां भूमिं] ज्ञानमात्र निजभावमय अकंप भूमिकानो (अर्थात् ज्ञानमात्र जे पोतानो भाव ते-मय निश्चळ भूमिकानो) [श्रयन्ति] आश्रय करे छे, [ते साधकत्वम् अधिगम्य सिध्दाः भवन्ति] तेओ साधकपणाने पामीने सिद्ध थाय छे; [तु] परंतु [मूढाः] जेओ मूढ (-मोही, अज्ञानी, मिथ्याद्रष्टि) छे, तेओ [अमूम् अनुपलभ्य] आ भूमिकाने नहि पामीने [परिभ्रमन्ति] संसारमां परिभ्रमण करे छे.
भावार्थः– जे भव्य पुरुषो, गुरुना उपदेशथी अथवा स्वयमेव काळलब्धिने पामी मिथ्यात्वथी रहित थईने, ज्ञानमात्र एवा पोताना स्वरूपने पामे छे, तेनो आश्रय करे छे, तेओ साधक थया थका सिद्ध थाय छे; परंतु जेओ ज्ञानमात्र एवा पोताने पामता नथी, तेओ संसारमां रखडे छे. २६६.
‘ये’ जे पुरुषो, ‘कथम् अपि अपनीत–मोहाः’ कोई पण प्रकारे जेमनो मोह दूर थयो छे एवा थया थका, ‘ज्ञानमात्र–निज–भावमयीम् अकम्पां भूमिम्’ ज्ञानमात्र निजभावमय अकंप भूमिकानो (अर्थात् ज्ञानमात्र जे पोतानो भाव