२३४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ ते-मय निश्चळ भूमिकानो) ‘श्रयन्ति’ आश्रय करे छे, ‘ते साधकत्वम् अधिगम्य सिध्दाः भवन्ति’ तेओ साधकपणाने पामीने सिद्ध थाय छे;...
सम्मादिट्ठी हवदि जीवो’ जे भूतार्थनो आश्रय करे छे ते सम्यग्द्रष्टि थाय छे. ए ज आ वात छे. कहे छे-जे पुरुषो, कोई पण प्रकारे अर्थात् महान पुरुषार्थ करीने मोहनो नाश करे छे, मिथ्याभावनो नाश करे छे-एवा थईने... , जुओ, आमां अस्तिमां पुरुषार्थ ने नास्तिमां मोहनो नाश एम बे वात करी छे. अहाहा...! अंतःपुरुषार्थ वडे मोहनो नाश थयो छे एवा थईने जे पुरुषो, ज्ञानमात्र निजभावमय अकंप-निश्चल एक ज्ञायकभावनो आश्रय करे छे तेओ साधकपणाने पामीने तेनी उत्कृष्ट दशारूप सिद्ध थाय छे. भाई, दया पाळवी, व्रत करवां, भक्ति करवी के आहारदान देवुं ए कोई मार्ग नाम मोक्षमार्ग नथी, साधकपणुं नथी, तथा ते मार्गनुं-साधकपणानुं आलंबन पण नथी. ल्यो, आवी वात! बहु आकरी पण सत्य वात छे. अहा! अशुभथी बचवा धर्मीने एवो भाव आवे छे पण ए धर्म नथी.
अहाहा...! भगवान पूर्णानंदनो नाथ रागना विकल्पथी रहित पोताना स्वभावथी जाणे एवो प्रत्यक्ष ज्ञाता छे. प्रवचनसार, गाथा १७२मां अलिंगग्रहणना प्रथम छ बोलमां आ प्रमाणे लीधुं छे के-
१. जेने इन्द्रियो वडे ग्रहण-जाणवुं थाय एवो भगवान आत्मा नथी. २. जे इन्द्रियो वडे ग्राह्य-जणावायोग्य थाय एवो इन्द्रियप्रत्यक्षनो आत्मा विषय नथी. ३. इन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वक आत्मा अनुमाननो विषय नथी. ४. बीजाओ द्वारा मात्र अनुमानथी जणाय एवो आत्मा नथी. प. आत्मा एकला अनुमान वडे जाणे एवो अनुमाता नथी. ६. आत्मा पोताना स्वभावथी जाणे एवो प्रत्यक्ष ज्ञाता छे. अहाहा...! आम पोतानी जातथी भात पाडे एवो आत्मा छे; रागना विकल्पथी ते जणाय एवो नथी. आवी झीणी वात कदी सांभळी नथी. कोईक वार सांभळवामां आवी जाय तो निश्चय छे, निश्चय छे-एम कहीने काढी नाखे छे.
अहा! भगवान आत्मा परोक्ष रहे एवो एनो स्वभाव ज नथी. तेथी भगवान आत्मानुं अस्तिपणे जे अतीन्द्रिय पूर्ण स्वरूप छे एनो जे आश्रय करे छे ते साधकपणाने पामीने सिद्ध थाय छे.
तो व्यवहार साधन अने निश्चय साध्य एम शास्त्रमां आवे छे ने? हा, आवे छे; पण ए तो उपचारथी कथन छे बापु! बाकी व्यवहार कांई परमार्थरूप साधन छे नहि. आत्मामां साधन नामनो गुण छे ते वडे आत्मा ज पोते साधनरूप थईने पोतानी निर्मळ वीतरागी पर्यायने प्रगट करे छे. पोते ज पोतानुं साधन छे. विशेष स्पष्ट कहीए तो जे निर्मळ पर्याय प्रगट थई ते ज तेनुं साधन छे. अहाहा...! धर्म केम पमाय? तो कहे छे-त्रिकाळी एक ज्ञायकस्वरूप, कर्म-नोकर्मथी भिन्न एवुं स्वद्रव्य छे तेना आश्रये साधकपणाने पामीने सिद्ध थवाय छे. आ ज धर्म पामवानी रीत छे; राग के निमित्तना आश्रये धर्म प्रगटे एवी वस्तु नथी.
अरे! आत्माना भान विना जीवो एकांते दुःखी छे. भले बहारथी तरफडियां न मारता होय, पण अंदरथी दुःखी ज दुःखी छे. शरीरमां धोरीरग तूटे तो फट दईने खलास थई जाय, ने नानी रग तूटे तो तरफडी-तरफडीने खलास थई जाय. अरेरे! आवां वेदन एणे अनंत वार कर्यां छे; केमके एने देह ने रागथी एकत्व बुद्धि छे. राग तो स्वयं दुःखरूप छे, दावानळ छे. एणे रागथी एकत्व करीने चिरकाळथी पोतानी शांतिने जलावी दीधी छे.
अहा! आ झवेरीओ बधा करोडोनी किंमतना हीराने परखे, पण परखनारो अंदर चैतन्यहीरलो छे तेने ना परखे, अहाहा...! अंदर जुए तो ए चैतन्यहीरलो एकला ज्ञान ने आनंदनो दरियो छे. जेम दरियामांथी पाणीनी छोळो उछळे तेम आ चैतन्यहीरलानी द्रष्टि करतां अंदरथी ज्ञान ने आनंदनी छोळो उछळे छे. अहाहा...! करोडो अबजोनी किंमतना होय तोय ए जड हीरानी शी किंमत? ए तो धूळनी धूळ छे बापा! हीराय धूळ ने तेनी किंमतेय धूळ. ज्यारे आ चैतन्यहीरलो-एकला ज्ञायकस्वभावथी झळहळतो-तेनी शी किंमत? अहाहा...! अंतर्द्रष्टि वडे नीरखतां ने अंतर-एकाग्र थतां तेमांथी आनंदनी छोळे सहित सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगटे एवी ए अणमोल चीज छे. अहाहा...!