एनो आश्रय करतां एमांथी साधकदशा ने सिद्धदशा प्रगटे एवी अणमोल अनुपम चीज चैतन्यवस्तु आत्मा छे. अहाहा...! अहीं कहे छे-जेणे आ चैतन्यहीरलानो आश्रय लीधो ते साधकपणाने पामीने सिद्धपद पामशे. अहाहा...! अनंत-सुखधाम एवुं सिद्धपद कोने कहीए? ओहो! आचार्य अमृतचंद्रदेवे सुखनां वेणलां वहेवडाव्यां छे. कहे छे- स्वरूपना आश्रये जेने साधकदशा थई तेने अल्पकाळमां परम सुखधाम एवी सिद्धदशा प्रगट थशे. आवी वात!
आ भूमिकाने नहि पामीने ‘परिभ्रमन्ति’ संसारमां परिभ्रमण करे छे.
अहाहा...! जेओ मूढ छे, अर्थात् जेओ पोतानी चिदानंदघनस्वरूप चैतन्यवस्तुने ओळखता नथी, अने पवित्रतानो पिंड एवो पोते, अने अपवित्र एवो राग-शुभ के अशुभ-अहीं शुभनी प्रधानताथी वात छे-ए बन्नेने एकमेक जाणे छे, माने छे तेओ मूढ छे, मोही, अज्ञानी छे. रागथी मने लाभ थशे, ने व्यवहार करतां करतां निश्चय धर्म प्रगटशे -एम माने छे तेओ मूढ छे, मिथ्याद्रष्टि छे. अहा! आवा मिथ्याद्रष्टि जीवो, कहे छे, आ भूमिकाने अर्थात् सम्यक्दर्शन आदि भावने-साधकपणाने प्राप्त करता नथी. जेओ शुभना विकल्पमां रोकायेला छे तेओ साधकपणानी भूमिकाने प्राप्त करी शकता नथी.
प्रश्नः– तेओ व्रत, तप, भक्ति, पूजा, दया, दान इत्यादि भगवाने कहेलां साधन तो करे छे? उत्तरः– ए तो बधां उपचारथी साधन कह्यां छे, तेने तेओ परमार्थ साधन मानी बेठा छे ए ज भूल छे. व्रतादि कांई वास्तविक साधन नथी. तेथी रागमां ज रोकायेला तेओ बहारमां चाहे नग्न दिगंबर साधु थया होय, जंगलमां रहेता होय, पंचमहाव्रतादि पाळता होय तोय मूढ रह्या थका साधकपणाने पामता नथी. अहा! अगियार अंग अने नव पूर्वनी लब्धि प्रगटी होय तोय शुं? तोय तेओ अज्ञानी छे केमके रागनी एकतानी आडमां तेमने आत्मज्ञान थयुं नथी. अहा! जे रागना-पुण्यना प्रेममां फस्यो छे ते व्यभिचारी छे, मूढ छे, आवा मूढ जीवो राग विनानी साधकनी भूमिकाने पामता नथी. तेओ संसारमां ज परिभ्रमण कर्या करे छे. ओहो! मोटो संसार समुद्र पडयो छे. कदीक उंचे स्वर्गमां अवतरे, ने कदीक हेठे नर्कमां जाय; अररर..! पारावार दुःखने भोगवे छे. समजाणुं कांई...?
‘जे भव्य पुरुषो, गुरुना उपदेशथी अथवा स्वयमेव काळलब्धिने पामी मिथ्यात्वथी रहित थईने, ज्ञानमात्र एवा पोताना स्वरूपने पामे छे, तेनो आश्रय करे छे, तेओ साधक थया थका सिद्ध थाय छे; परंतु जेओ ज्ञानमात्र एवा पोताने पामता नथी, तेओ संसारमां रखडे छे.’
अहाहा...! कोईने गुरुए कह्युं-मारी सामुं मा जो, अंदर चिदानंदघन प्रभु तुं छो त्यां तारामां जो; त्यां जा, ने त्यां ज रमी जा, त्यां ज ठरी जा, अहा! तेणे एम कर्युं तो समकित सहित तेने साधकपणुं थयुं. तथा कोई स्वयं अंदर जाग्रत थई अंतःपुरुषार्थ करी साधक थयो. अहा! आम समकित युक्त साधकपणाने पामीने जीवो सिद्धदशाने पामे छे. आ ज मार्ग छे भाई! जेओ पोताना स्वभावनो आश्रय करे छे तेओ साधक थया थका सिद्ध थाय छे. परंतु जेओ शुभाशुभ क्रियामां ज लीन थई रोकाया छे तेओ आत्मवस्तुने पामता नथी, संसारमां रखडया करे छे. आवी वात!
आ भूमिकानो आश्रय करनार जीव केवो होय ते हवे कहे छेः
यो भावयत्यहरहः स्वमिहोपयुक्तः।