Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११

ज्ञानक्रियानयपरस्परतीव्रमैत्री–
पात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः।। २६७।।
श्लोकार्थः– [यः] जे पुरुष [स्याद्वाद–कौशल–सुनिश्चल–संयमाभ्यां] स्याद्वादमां प्रवीणता तथा (रागादिक

अशुद्ध परिणतिना त्यागरूप) सुनिश्चळ संयम-ए बन्ने वडे [इह उपयुक्तः] पोतामां उपयुक्त रहेतो थको (अर्थात् पोताना ज्ञानस्वरूप आत्मामां उपयोगने जोडतो थको) [अहः अहः स्वम् भावयति] प्रतिदिन पोताने भावे छे (- निरंतर पोताना आत्मानी भावना करे छे), [सः एकः] ते ज एक (पुरुष), [ज्ञान–क्रिया–नय–परस्पर–तीव्र– मैत्री–पात्रीकृतः] ज्ञाननय अने क्रियानयनी परस्पर तीव्र मैत्रीना पात्ररूप थयेलो, [इमाम् भूमिम् श्रयति] (ज्ञानमात्र निजभावमय) भूमिकानो आश्रय करे छे.

भावार्थः– जे ज्ञाननयने ज ग्रहीने क्रियानयने छोडे छे, ते प्रमादी अने स्वच्छंदी पुरुषने आ भूमिकानी प्राप्ति थई नथी. जे क्रियानयने ज ग्रहीने ज्ञाननयने जाणतो नथी, ते (व्रत-समिति-गुप्तिरूप) शुभ कर्मथी संतुष्ट पुरुषने पण आ निष्कर्म भूमिकानी प्राप्ति थई नथी. जे पुरुष अनेकांतमय आत्माने जाणे छे (-अनुभवे छे) तथा सुनिश्चळ संयममां वर्ते छे (-रागादिक अशुद्ध परिणतिनो त्याग करे छे), ए रीते जेणे ज्ञाननय अने क्रियानयनी परस्पर तीव्र मैत्री साधी छे, ते ज पुरुष आ ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिकानो आश्रय करनार छे.

ज्ञाननय अने क्रियानयना ग्रहण-त्यागनुं स्वरूप अने फळ ‘पंचास्तिकाय-संग्रह’ शास्त्रना अंतमां कह्युं छे, त्यांथी जाणवुं. २६७.

* कळश २६७ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘यः’ जे पुरुष ‘स्याद्वाद–कौशल–सुनिश्चल–संयमाभ्याम्’ स्याद्वादमां प्रवीणता तथा (रागादिक अशुद्ध परिणतिना त्यागरूप) सुनिश्चळ संयम-ए बन्ने वडे ‘इह उपयुक्तः’ पोतामां उपयुक्त रहेतो थको (अर्थात् पोताना ज्ञानस्वरूप आत्मामां उपयोगने जोडतो थको) ‘अहः अहः स्वं भावयति’ प्रतिदिन पोताने भावे छे (-निरंतर पोताना आत्मानी भावना करे छे).

अहाहा...! अहीं स्याद्वादनी प्रवीणता अने सुनिश्चळ संयम-एम बे वात लीधी छे. त्यां स्याद्वादनी प्रवीणता एटले शुं? के द्रव्यस्वरूपमां, भगवान त्रिकाळी एक ज्ञायकमां निमित्त, राग के पर्याय नथी, ने निमित्त, राग के पर्यायमां भगवान ज्ञायक नथी, अहाहा...! आवुं स्वना आश्रये जे ज्ञान-श्रद्धानरूप परिणमन थाय ते स्याद्वादनी प्रवीणता छे. ‘शुद्ध’मां रागादि नहि, ने रागादिमां ‘शुद्ध’ नहि-एवुं ज्ञाननुं परिणमन ते स्याद्वादनी प्रवीणता छे. तथा जेमां अशुद्ध परिणतिनो त्याग वर्ते छे एवी स्वस्वरूपनी रमणता, स्थिरता, निश्चलता ते संयम छे. अहीं कहे छे-स्याद्वादनी प्रवीणता अने सुनिश्चळ संयम-ए बे वडे जे पुरुष पोतामां उपयुक्त रहेतो थको, उपयोगने पोतामां ज स्थिर करतो थको प्रतिदिन पोताने भावे छे ते आ भूमिकाने अर्थात् साधकपणाने पामे छे. ल्यो, आवी वात! समजाणुं कांई...?

अहा! जेने सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान प्रगट थयुं तेने स्व-आश्रये सुनिश्चळ संयम प्रगट थाय छे. ज्ञान-श्रद्धान थवामां स्वभाव सन्मुखतानो जे पुरुषार्थ छे तेनाथी सुनिश्चल संयम थवामां चारित्रनो अनेक गुणो पुरुषार्थ होय छे. अहाहा...! चारित्र एटले शुं? जे चैतन्यस्वरूप ज्ञानमां प्रतिभास्युं ने श्रद्धामां आव्युं तेमां विशेषपणे चरवुं, रमवुं, ठरवुं, जमवुं तेनुं नाम चारित्र छे. अहाहा...! जेमां प्रचुर आनंदनां भोजन थाय एवी स्वानुभवनी सुनिश्चल दशा तेने चारित्र कहे छे. अशुद्धतानो त्याग थई शुद्ध रत्नत्रय परिणतिनुं प्रगट थवुं एनुं नाम संयम अर्थात् चारित्र छे.

छ कायनी दया पाळवी तेने संयम कहे छे ने? हा, छ कायनी दया पाळवी तेने संयम कहेल छे, पण ए तो भेदरूप संयम छे. वास्तवमां ए शुभराग छे,