Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 4156 of 4199

 

कळश-२६७ः २३७

अने धर्मी पुरुषनी धर्म परिणतिनो सहचर जाणी तेने उपचारथी संयम कहेल छे. समजाणुं कांई...?

अहाहा...! महान वैभवशील एवा रावणने एक स्फटिकनो महेल हतो. एना स्फटिक एवा झळहळता प्रकाशित हता के कोई दुश्मन त्यां जाय तो पग कयां धरवो ते खबर न पडे एटले तरत पकडाई जाय. तेम आ आत्मा चैतन्यनो महेल एवा चैतन्यना प्रकाशथी भरपुर झळहळतो उज्ज्वळ छे के त्यां मोह आदि दुश्मनो तरत ज पकडाइ जाय छे. अहाहा...! चैतन्यहीरलो चैतन्य प्रकाशनो पुंज एवो छे के एमां चरण धरतां, चरतां-विचरतां मोहांधकारनो नाश थई जाय छे, ने प्रबळ पवित्र उज्ज्वळ चारित्रनो प्रकाश प्रगट थाय छे. ल्यो, आनुं नाम संयम छे. शुद्ध चिदानंदघन प्रभु आत्मा अनुभवमां आव्यो, पछी एवा ज अनुभवमां स्थिर थईने रहेवुं ते संयम छे.

त्यारे कोई वळी कहे छे-आचार्य कुंदकुंददेव पण अहिंसादि महाव्रत पाळता हता, अमे केम न पाळीए? अरे भाई! तने आचार्यदेवना अंतरना स्वरूपनी खबर नथी. मुख्यपणे तेओ शुद्धोपयोगमां ज स्थित- लीन हता; निरंतर शुद्धोपयोगनी ज तेमने भावना हती, व्रतादिनी नहि. तेमनो ज आ संदेश छे के- पंचमहाव्रतादिनो विकल्प राग छे, ज्यारे अंतरमां स्वरूप-स्थिरता करवी ते संयम नाम चारित्र छे. पंचमहाव्रतादिनो विकल्प होय छे खरो, पण ते कांई संयम नथी, खरेखर तो (निश्चयथी) ते हेय एवो असंयम, अचारित्र ज छे. हवे आवी वात आकरी लागे पण आ सत्य वात छे.

अहा! धर्मात्मा, संयमी-मुनि निरंतर पोताना शुद्ध स्वरूपने भावे छे. आत्मावलोकनमां आवे छे के-मुनिओ वारंवार वीतरागतानो उपदेश आपे छे, शुद्ध स्वरूपमां रमणता कर-एवो ज उपदेश तेओ आपे छे. राग करवानी तो वात ज नथी भाई! (व्रतादिनो) राग होय छे ए जुदी वात छे, ने रागने करवो-ए जुदी वात छे. अरे, जे भावे तीर्थंकर नामकर्म बंधाय ते भावनी पण मुनिवरोने भावना होती नथी. शुं आस्रवने धर्मी भावे? कदीय न भावे.

अहाहा...! कहे छे-निरंतर जे पुरुष उपयोगने स्वस्वरूपमां उपयुक्त करी निज शुद्धात्माने भावे छे. ‘सः एकः’ ते ज एक (पुरुष), ‘ज्ञान–क्रिया–नय–परस्पर–तीव्र–मैत्री–पात्रीकृतः’ ज्ञाननय अने क्रियानयनी परस्पर तीव्र मैत्रीना पात्ररूप थयेलो, ‘इमाम् भूमिम् श्रयति’ आ (ज्ञानमात्र निजभावमय) भूमिकानो आश्रय करे छे.

अहाहा...! ल्यो, ज्ञान अने क्रिया नाम चारित्र-बन्नेनी मैत्रीना पात्ररूप थयेलो ते एक ज ज्ञानमात्र भूमिकाने आदरे छे; ते एक ज साधकपणाने पामे छे, बीजा रागमां रोकायेला छे तेओ साधकपणाने प्राप्त थता नथी.

अहाहा...! शुं कळशो छे! कोईने मोढामां अमी न आवतुं होय, ने तेने सो-बसो आंबलीना कातराना ढग वच्चे बेसाडीए तो मोंमां पाणी वळी जाय, ने अमी आवे, तेम आचार्य अमृतचंद्रदेवे अहीं अमृतमय कळशोनो ढग खडो कर्यो छे. अहा! जे एनी मध्यमां जाय अर्थात् तेनुं अवगाहन करे तेने अंदर अमृतरूपी अमी उछळी जाय छे. अहाहा...! अंदर अमीनो सागर उछाळे एवा आ कळशो छे. अहाहा...! कहे छे-जे पुरुष स्याद्वादमां प्रवीणता अने सुनिश्चळ संयम वडे, शुद्धात्मामां उपयुक्त थयो थको पोताने ज भावे छे ते पुरुष सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप थयो थको साधकपणाने पामे छे; ने सिद्ध थई जाय छे.

* कळश २६७ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘जे ज्ञाननयने ज ग्रहीने क्रियानयने छोडे छे, ते प्रमादी अने स्वच्छंदी पुरुषने आ भुमिकानी प्राप्ति थई नथी.’

जुओ, शुं कीधुं? के एकलुं शास्त्रनुं जाणपणुं करे, पण अंतर्द्रष्टि प्रगट करी अशुद्धताने टाळे नहि ते प्रमादी अने स्वच्छंदी छे. एवा शुष्कज्ञानीने अंतरमां साधकपणुं प्रगटतुं नथी. शास्त्रनुं जाणपणुं खूब करे तेथी क्षयोपशमनो विकास तो थाय, पण एमां शुं? अंदर परम पुनीत शुद्धभावमय आत्माने जाणे नहि, ने एकांते ज्ञाननयने ग्रहे ते पुरुष अशुद्धता टाळीने अंदर जतो नथी. एवा प्रमादी स्वच्छंदी पुरुषने भूमिकानी-साधकपणानी दशानी प्राप्ति थती नथी.

वळी, ‘जे क्रियानयने ज ग्रहीने ज्ञाननयने जाणतो नथी, ते (व्रत-समिति-गुप्तिरूपे) शुभकर्मथी संतुष्ट पुरुषने पण आ निष्कर्म भूमिकानी प्राप्ति थई नथी.’

जुओ, दया, दान, व्रत, तप, समिति, गुप्ति इत्यादिना शुभभावमां जेओ संतोषाई जाय छे, अर्थात् आ शुभभावथी धर्म थाय छे एम जेओ माने छे तेओ ज्ञाननयने जाणता नथी. तेमने शुद्ध चिदानंदघन प्रभु आत्मानुं भान नथी. भाई,