२३८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ व्रतादिनी जे बाह्य क्रिया छे ए तो राग छे, ने रागमां संतुष्ट छे तेने रागरहित निष्कर्म वीतरागी भावनी भूमिका प्राप्त थती नथी. अहा! आवा क्रियाजड क्रियाकांडीओने आत्माना धर्मनी क्रिया थती नथी. वास्तवमां तेओ अज्ञानी ज रहे छे.
हवे कहे छे-‘जे पुरुष अनेकांतमय आत्माने जाणे छे (-अनुभवे छे) तथा सुनिश्चळ संयममां वर्ते छे (- रागादिक अशुद्ध परिणतिनो त्याग करे छे), ए रीते जेणे ज्ञाननय अने क्रियानयनी परस्पर तीव्र मैत्री साधी छे, ते ज पुरुष आ ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिकानो आश्रय करनार छे.’
शुं कीधुं आ? के जे पुरुष अनेकांतमय आत्माने जाणे छे अर्थात् द्रव्यपर्याय स्वरूप आत्मवस्तु छे तेमां त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य छे ते पर्याय नथी, ने एक समयनी पर्याय छे ते त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य नथी-अहाहा...! आवुं जे त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य तेने जे पुरुष अनुभवे छे ते सम्यग्ज्ञानी छे. अहा! आम सम्यग्ज्ञान अने सुनिश्चळ संयम-एम बेमां जे वर्ते छे ते पुरुष ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिकानो आश्रय करनार छे. सम्यग्दर्शन थतां ज अभिप्रायथी तो रागथी भिन्न पडयो हतो, छतां राग हतो. तो तेने जाणीने स्वरूपना उग्र आश्रय वडे शुद्ध परिणति-वीतरागी परिणतिने प्रगट करे तेने संयम कहे छे. एकली इन्द्रियोने दमवी ने अहिंसादि व्रत पाळवां ते संयम एम नहि. ए तो संयम छे ज नहि. स्वरूपमां जे लीनता-स्थिरता छे ते संयम छे. आम सम्यग्ज्ञान अने सम्यग्चारित्र वडे जेणे ज्ञाननय अने क्रियानयनी मैत्री साधी छे ते ज पुरुष आ ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिकानो आश्रय करनारो छे.
अहाहा...! पुण्य-पापथी रहित चिन्मात्रज्योतिस्वरूप भगवान आत्मा छे. तेनी अंतर्मुख थईने स्वसंवेदन- पोतानुं पोताथी वेदन करवुं ते ज्ञाननय छे; तथा तेमां ज स्थिर थई, अशुद्धताना-रागना त्यागरूप शुद्ध परिणतिरूपे परिणमवुं ते संयम नाम क्रियानय छे. सम्यग्ज्ञान-आत्मज्ञान ने रागना अभावरूप संयम-बेने मैत्री-गाढ मैत्री छे. आ ज्ञाननय ने क्रियानयनी मैत्री छे. हवे आवो मारग वीतरागनो छे, पण लोकोने ते समजवो कठण थई पडयो छे.
पण शुं थाय? जेम माबाप मरी जाय ने छोकराओ अंदर-अंदर लडे-एम के बापे आम कह्युं हतुं ने तेम कह्युं हतुं; तेम अरेरे! अत्यारे केवळी-श्रुतकेवळीना विरह पडया छे. केवळी रह्या नहि, ने आम धर्म थाय ने तेम धर्म थाय-एम लोको अंदर अंदर विवादे चढी गया छे. परंतु भाई! वस्तु जे भगवान आत्मा छे तेनो ज्ञानानंद स्वभाव छे. अहाहा...! आवी निजवस्तुना आश्रये परिणमतां पर्यायमां ज्ञान ने आनंद प्रगट थाय छे, अने ते धर्म छे. वस्तुनो स्वभाव ते धर्म. स्वनुं-ज्ञान ने आनंदनुं भवन-थवुं ते स्वभाव नाम धर्म छे. आ जैनदर्शन छे. जैनदर्शननी आवी वात बीजे कयांय नथी.
भाई, अनेकांतनो एवो अर्थ नथी के-निज स्वभावना आश्रये पण धर्म थाय ने रागना-व्यवहारना आश्रयेय धर्म थाय. वास्तवमां स्वभावना आश्रये ज धर्म थाय ने रागना-विभावना आश्रये धर्म न थाय तेनुं नाम अनेकांत छे. अरे, जगतने जैनधर्मनुं वास्तविक स्वरूप जाणवा मळ्युं नथी. जगत तो व्रत करो, ने तपस्या करो, ने भक्ति करो ने बहारमां इन्द्रियोने दमो, ब्रह्मचर्य पाळो एटले थई गयो धर्म-एम माने छे, पण एवुं धर्मनुं स्वरूप नथी. अहाहा...! पोते अंदर ज्ञानस्वरूपी परम पवित्रतामय प्रभु छे तेमां अंतर-एकाग्र थई त्यां ज ठरवुं एनुं नाम धर्म छे. साथे शुभभाव हो, पण ते धर्म नथी. शुभभावने व्यवहारे मैत्री कही छे, पण निश्चयथी ए मैत्री नथी. अहीं तो स्व-आश्रये प्रगट सम्यग्ज्ञान, अने स्व-आश्रये प्रगट संयमभाव-निर्मळ रत्नत्रय-तेने परस्पर मैत्री कही छे. बाकी जेने अंतरमां स्वस्वरूपनुं भान वर्ततुं नथी तेनां व्रत, तप आदि तो सर्व फोगट ज छे अर्थात् संसार खाते ज छे; जेम लग्नमां फेरा फरे छे ने! तेम चोरासीना अवतारना ते फेरा फरशे. योगसारमां आवे छे ने के-
व्रत–तप–संयम–शील सहु, फोगट जाणो साव.
आवी वात छे!
हमणां हमणां केटलाके काढयुं छे के-‘जीवो अने जीववा दो’-ए भगवाननुं सूत्र छे. पण भाई! एवुं भगवाने कह्युं ज नथी. भगवाने तो एम कह्युं छे के-आत्मामां एक जीवन शक्ति त्रिकाळ छे. अहाहा...! ज्ञान, दर्शन, आनंद, सत्ता-एवा शुद्ध चैतन्य प्राणो वडे जीव त्रिकाळ जीवे ज छे, तेने जीववा देवानी वात ज कयां छे? अहाहा...! शुद्ध चैतन्य प्राणोना धरनार निज चैतन्यद्रव्यनो जे आश्रय करे छे तेने निर्मळ ज्ञान ने आनंदमय जीवन प्रगट थाय छे अने ते जीवनुं वास्तविक जीवन छे. अहा! पंच परमेष्ठी भगवंतोनुं जीवन वास्तविक जीवन छे. बाकी मन, वचन,