काय, इन्द्रिय इत्यादि दस प्राण वडे जेणे जीवन मान्युं छे तेय अनंत काळ जीवे छे खरो, पण ते संसारमां रखडे छे, केमके ते दस प्राण अने तेनी योग्यतारूप जीवना अशुद्ध प्राण ते यथार्थमां एनी चीज नथी. तेना (जड प्राणो ने अशुद्ध प्राणोना) आलंबनमां रहेलो जीव अनंत संसारमां परिभ्रमे छे. हवे आवी वात छे; समजाणुं कांई...?
अहाहा...! भगवान आत्मा ज्ञानस्वरूप छे; तेमां एकाग्र थईने स्थित रहेवुं ते ज्ञानचेतना छे, ने रागमां स्थित रहेवुं ते कर्मचेतना छे. बाह्य व्रतादिमां स्थित रहेवुं ते कर्मचेतना छे; ने तेना फळमां स्थित रहेवुं ते कर्मफळ चेतना छे. ज्ञानीने ज्ञानचेतना छे, ने अज्ञानीने कर्मचेतना ने कर्मफळचेतना होय छे. अहीं कहे छे-जेणे ज्ञाननय अने क्रियानयनी अर्थात् सम्यग्ज्ञान अने स्वरूप स्थिरतानी गाढ मैत्री साधी छे ते ज पुरुष ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिकानो आश्रय करनारो छे; ते ज साधक थईने सिद्ध थाय छे. अहाहा...! स्व-आश्रये जे ज्ञान अने वीतरागी शांति प्रगटी छे तेने अहीं ज्ञाननय अने क्रियानयनी मैत्री कही छे.
“ज्ञाननय अने क्रियानयना ग्रहण-त्यागनुं स्वरूप अने फळ ‘पंचास्तिकायसंग्रह’ शास्त्रना अंतमां कह्युं छे, त्यांथी जाणवुं”
आम जे पुरुष आ भूमिकानो आश्रय करे छे, ते ज अनंत चतुष्टयमय आत्माने पामे छे-एवा अर्थनुं काव्य हवे छेः-
शुध्दप्रकाशभरनिर्भरसुप्रभातः।
आनन्दसुस्थितसदास्खलितैकरूप–
स्तस्यैव चायमुदयत्यचलार्चिरात्मा।। २६८।।
श्लोकार्थः– [तस्य एव] (पूर्वोक्त रीते जे पुरुष आ भूमिकानो आश्रय करे छे) तेने ज, [चित्–पिण्ड– चण्डिम–विलासि–विकास–हासः] चैतन्यपिंडनो निरर्गळ विलसतो जे विकास ते-रूप जेनुं खीलवुं छे (अर्थात् चैतन्यपुंजनो जे अत्यंत विकास थवो ते ज जेनुं खीली नीकळवुं छे), [शुध्द–प्रकाश–भर–निर्भर–सुप्रभातः] शुद्ध प्रकाशनी अतिशयताने लीधे जे सुप्रभात समान छे, [आनन्द–सुस्थित–सदा–अस्खलित–एक–रूपः] आनंदमां सुस्थित एवुं जेनुं सदा अस्खलित एक रूप छे [च] अने [अचल–अर्चिः] अचळ जेनी ज्योत छे एवो [अयम् आत्मा उदयति] आ आत्मा उदय पामे छे.
भावार्थः– अहीं ‘चित्पिण्ड’ इत्यादि विशेषणथी अनंत दर्शननुं प्रगट थवुं बताव्युं छे, ‘शुध्दप्रकाश’ इत्यादि विशेषणथी अनंत ज्ञाननुं प्रगट थवुं बताव्युं छे, ‘आनन्दसुस्थित’ इत्यादि विशेषणथी अनंत सुखनुं प्रगट थवुं बताव्युं छे अने ‘अचलार्चि’ विशेषणथी अनंत वीर्यनुं प्रगट थवुं बताव्युं छे. पूर्वोक्त भूमिनो आश्रय करवाथी ज आवा आत्मानो उदय थाय छे. २६८.
बेसता वर्षने सुप्रभात कहे छे ने? रात्रिना अंधकारनो नाश थई भूमंडळमां सूर्यनां किरणो फेलाय तेने सुप्रभात कहे छे; तेम पुण्य-पापनी एकताबुद्धिरूप अंधकारने भेदीने सम्यग्दर्शन-ज्ञानरूप जे चैतन्यनी ज्योति झळहळ प्रगट थाय तेने सुप्रभात कहे छे. अहा! आवुं सुप्रभात जेने प्रगटयुं ते जीवे दिवाळी करी, दि’ नाम काळने तेणे अंतरमां वाळ्यो. समजाणुं कांई...? ए ज कहे छे-
‘तस्य एव’ (पूर्वोक्त रीते जे पुरुष आ भूमिकानो आश्रय करे छे) तेने ज, ‘चित्–पिण्ड–चण्डिम– विलासि–विकास–हासः’ चैतन्यपिंडनो निरर्गळ विलसतो जे विकास ते-रूप जेनुं खीलवुं छे (अर्थात् चैतन्यपुंजनो