२४०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ जे अत्यंत विकास थवो ते ज जेनुं खीली नीकळवुं छे), ... एवो आ आत्मा उदय पामे छे.
अहाहा...! शुं कहे छे? निर्मळानंदनो नाथ सच्चिदानंद प्रभु त्रिकाळ ध्रुव अंदर विराजे छे तेनो जे आश्रय करे छे तेने ज चैतन्यनो निरर्गळ विलसतो जे विकास ते-रूपे खीलवुं थाय छे. अहाहा...! जेम कमळ हजार पांखडीए खीली नीकळे तेम भगवान आत्मा, तेमां एकाग्र थई स्थित थतां अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य-एम अनंत गुण-पर्याये खीली नीकळे छे. ‘निरर्गळ विलसतो विकास’ एटले शुं? के प्रतिबंध रहित निरंकुश अमर्यादित पूर्ण ज्ञान-दर्शनादिरूप विकास थाय छे. अहाहा...! जेने कोई रोकनारुं नथी एवो अनंत ज्ञान- दर्शन-सुख-वीर्यरूप विकास खीली जाय छे. साधकने वच्चे व्यवहार आवे छे, पण ते कांई ज नथी, ते पूर्ण दशानुं कारण नथी.
वळी कहे छे- ‘शुद्ध–प्रकाश–भर–निर्भर–सुप्रभातः’ शुद्ध प्रकाशनी अतिशयताने लीधे जे सुप्रभात समान छे... एवो आ आत्मा उदय पामे छे.
शुद्ध प्रकाशनी अतिशयता एटले शुं? के ज्ञाननी सातिशय विशेषता अर्थात् केवळज्ञाननी झळहळ ज्योति तेने प्रगट थवाने लीधे जे सुप्रभात समान छे एवो आ आत्मा उदय पामे छे. जुओ आ सुप्रभात! अहाहा...! पूर्ण ज्ञान ने आनंदथी भरेलो प्रभु छे-एनां अंतर्द्रष्टि-ज्ञान ने रमणता थयां तेने पर्यायमां केवळज्ञाननो दिव्य सातिशय प्रकाश प्रगट थाय छे; आ केवळज्ञान शुद्ध प्रकाशनी अतिशयताने लीधे सुप्रभात समान छे. आवुं सुप्रभात व्यवहारना आश्रये प्रगटतुं नथी, शुद्ध निश्चयना आश्रये ज प्रगटे छे, अने तेने ज दिवाळी थाय छे.
प्रश्नः– पण ज्ञानावरणादि घातिकर्मोनो अभाव करे त्यारे केवळज्ञान थाय छे ने? उत्तरः– भाई, कर्मनो नाश तो कर्मना कारणे कर्ममां (परमाणुमां) थाय छे, तेनो कर्ता-हर्ता आत्मा नथी; जडकर्मनो अभाव करवो ते आत्माना अधिकारनी वात नथी. अहा! आत्मा कर्मथी तो जुदो छे, ने कर्मने आधीन थयेल विकारथी पण जुदो छे. अहा! आवा निज शुद्धात्माना आश्रये तेमां ज पूर्ण स्थित थवाथी केवळज्ञान आदि प्रगट थाय छे. अत्यारे तो शुद्ध चैतन्यमूर्ति आत्माने छोडीने कर्मनो ने रागनो महिमा चाल्यो छे, पण ए तो विपरीतता छे. समजाणुं कांई...?
प्रवचनसार गाथा १६मां कह्युं छे के-आत्मा पोते ज कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अने अधिकरणरूप थईने पर्यायमां केवळज्ञानादिरूपे स्वयंभू प्रगट थाय छे; माटे जीवो बहारनी सामग्री शोधवा नाहक व्यग्र शा सारु थाय छे? स्वभावनो आश्रय करतां अंदर शक्तिरूपे छे ते स्वयमेव पर्यायमां प्रगट थाय छे, तेमां बाह्य सामग्रीनी कोई गरज होती नथी. वळी त्यां एक द्रव्यघाति अने एक भावघाति-एक घातिकर्मना बे प्रकार कह्या छे. पोते ज रागमां अटवायो छे ते भावघातिकर्म छे, ने ते जीवनो घात करे छे, तेमां द्रव्यकर्म निमित्त हो, पण ते जीवनी दशानो घात करे छे एम नथी; द्रव्यघाति कर्म निमित्तमात्र ज छे.
प्रश्नः– भगवानने दीनदयाळ कहे छे ते शुं छे? उत्तरः– भगवान दीनदयाळ छे-एटले के पर्यायनी पामरता-दीनता हती तेने तोडीने स्व-आश्रये भगवान पोतानी प्रभुता प्रगट करीने पोते ज दीनदयाळ थया छे. कोई बीजानी दया करे छे माटे दीनदयाळ एम नहि; बीजानी दया करवानुं तो आत्मानुं सामर्थ्य ज नथी, पण भगवाने पोतानी दीनता दूर करी पूर्ण प्रभुता प्रगट करी छे तो तेमने दीनदयाळ कहे छे. प्रत्येक आत्मा आ रीते ज दीनदयाळ थाय छे.
अहाहा...! शुद्ध चैतन्यस्वरूपनी शक्तिने व्यक्त करवानो उपाय ते चैतन्यस्वरूपमां अंतर-एकाग्र थवुं ते ज छे. केवळज्ञाननो शुद्ध प्रकाश प्रगट थाय तेय अंतर-एकाग्रतानी पूर्णता थतां थाय छे. अहा! आवुं केवळज्ञान शुद्ध प्रकाशनी अतिशयताने लीधे, कहे छे, सुप्रभात समान छे. कळश टीकाकार श्री राजमलजीए सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानने सुप्रभात कह्युं छे; केमके तेमां दर्शन मोहनो नाश थईने सम्यग्ज्ञाननो जाज्वल्यमान सूर्य उगे छे. आम सम्यग्ज्ञान ने पूर्ण केवळज्ञान सुप्रभात समान छे.
वळी कहे छे- ‘आनन्द–सुस्थित–सदा–अस्खलित–एक–रूपः’ आनंदमां सुस्थित एवुं जेनुं सदा अस्खलित एक रूप छे... एवो आ आत्मा उदय पामे छे.
अहाहा...! पूर्णानंदनो नाथ आनंदघन प्रभु अंदर पोते छे एनो पर्यायमां स्वीकार करी तेमां ज लीन रहे तेने अनंत आनंदनी दशा प्रगट थाय छे. केवी छे आ दशा? तो कहे छे-परम अमृतमय छे. आ इन्द्र अने इन्द्राणीनां