सुखो तो झेर छे, अने आ तो एकलुं अमृत छे, परम अमृत छे. अहा! आ परम आनंदनो एक अंश पण जेने आव्यो छे एवा समकितीने इन्द्र अने इन्द्राणीना भोगो सडेला मींदडा जेवा तुच्छ भासे छे. आवे छे ने के-
कागविट् सम गिनत है, सम्यग्द्रष्टि लोग.
अहाहा...! अतीन्द्रिय आनंदना स्वभावथी छलोछल भरेलो प्रभु ध्रुव विराजे छे, तेनो जेणे आश्रय लीधो तेने पर्यायमां जे अतीन्द्रिय आनंद प्रगट थाय छे तेनी आगळ इन्द्रना भोगो तुच्छ भासे छे. पूर्ण आनंद, परम-उत्कृष्ट आनंदनुं तो शुं कहेवुं?
अहीं कहे छे-आनंदमां सुस्थित छे एवुं एनुं सदा अस्खलित एक रूप छे. अहाहा...! पूर्ण आनंदनी दशा जे प्रगट थई ते अस्खलित छे, हवे ए कांई फरे एम नथी; सादि अनंतकाळ एवो ने एवो ज आनंद रह्या करे छे. अहाहा...! ‘सादि अनंत अनंत समाधि सुखमां’ संसारनो अंत थईने मोक्षदशा थई तेमां पूर्ण आनंदनुं, एकला आनंदनुं, अनंत आनंदनुं वेदन छे, तेमां हवे कोई फरक थाय नहि एवुं ए अस्खलित छे. समजाय छे कांई...?
सिद्धमां (सिद्धदशामां) शुं छे? तो कहे छे-त्यां स्वरूप-लीनताथी प्राप्त एकला आनंदनुं, अनंत आनंदनुं वेदन छे. आ सिवाय बीजुं कांई ज नथी; बाग-बंगला, बगीचा, हीरा-मोती-पन्ना के कुटुंब-परिवार कांई ज नथी. अहाहा...! पूर्णानंदना नाथने भेटवाथी जे आनंदनी-अनंत आनंदनी दशा प्रगटी छे ते कहे छे, भगवान सिद्धने अविचल-अस्खलित एक रूप छे. आवी वात!
वळी कहे छे- ‘च’ अने ‘अचल–अर्चिः’ अचळ जेनी ज्योत छे एवो ‘अयम् आत्मा उदयति’ आ आत्मा उदय पामे छे.
अहाहा...! अनंतवीर्यस्वरूप प्रभु आत्मा छे; तेमां लीन थई परिणमतां अनंत ज्ञान-दर्शन-सुख इत्यादि सहित निज स्वरूपनी रचना करे एवुं अनंत बल तेने प्रगट थाय छे. जे शक्तिमां छे ते, तेनो आश्रय लेतां अचळ ज्योतिरूप प्रगट थाय छे.
अहाहा...! आवुं दिव्य सुप्रभात! सूर्य उगे अने आथमे एमां तो सुप्रभात कायम रहेतुं नथी, परंतु आ चैतन्यसूर्य तो उग्यो ते उग्यो, हवे ते आथमतो नथी. आवुं दिव्य सुप्रभात सादिअनंत रहे एवो आ आत्मा उदय पामे छे.
अहीं ‘चित्पिंड’ इत्यादि विशेषणथी अनंत दर्शननुं प्रगट थवुं बताव्युं छे, ‘शुध्दप्रकाश’ इत्यादि विशेषणथी अनंत ज्ञाननुं प्रगट थवुं बताव्युं छे, ‘आनन्दसुस्थित’ इत्यादि विशेषणथी अनंत सुखनुं प्रगट थवुं बताव्युं छे. सुखधाम प्रभु आत्मा छे तेथी सुख तो आत्मामां भरपुर भर्युं हतुं, ते अंतर-एकाग्रता वडे पर्यायमां व्यक्तपणे प्रगट थयुं एम कहेवुं छे. अहाहा...! मोक्षस्वरूप ज भगवान आत्मा छे; रागनी एकता टळी एटले एनुं भान थयुं के हुं आवो छुं, ने स्वरूपमां ज्यां एकाग्रता सिद्ध करी त्यां रागनो नाश थयो, ने पर्यायमां मुक्ति थई गई, मोक्ष थई गयो. ‘अचलार्चि’ विशेषणथी अनंत वीर्यनुं प्रगट थवुं बताव्युं छे. जुओ, आम ‘पूर्वोक्त भूमिनो’ -ज्ञानमात्र निजभावमयी भूमिनो ‘आश्रय करवाथी ज आवा आत्मानो उदय थाय छे.’