Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 269.

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 4161 of 4199

 

२४२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११

कळश – २६९
एवो ज आत्मस्वभाव अमने प्रगट हो एम हवे कहे छेः-
(वसन्ततिलका)
स्याद्वाददीपितलसन्महसि प्रकाशे
शुध्दस्वभावमहिमन्युदिते
मयीति ।
किं बन्धमोक्षपथपातिभिरन्यभावै–
र्नित्योदयः
परमयं स्फुरतु
स्वभावः।। २६९।।

श्लोकार्थः– [स्याद्वाद–दीपित–लसत्–महसि] स्याद्वाद वडे प्रदीप्त करवामां आवेलुं लसलसतुं (- झगझगाट करतुं) जेनुं तेज छे अने [शुध्द–स्वभाव–महिमनि] जेमां शुद्धस्वभावरूप महिमा छे एवो [प्रकाशे उदिते मयि इति] आ प्रकाश (ज्ञानप्रकाश) ज्यां मारामां उदय पाम्यो छे, त्यां [बन्ध–मोक्ष–पथ–पातिभिः अन्य– भावैः किम्] बंध-मोक्षना मार्गमां पडनारा अन्य भावोथी मारे शुं प्रयोजन छे? [नित्य–उदयः परम् अयं स्वभावः स्फुरतु] नित्य जेनो उदय रहे छे एवो केवळ आ (अनंत चतुष्टयरूप) स्वभाव ज मने स्फुरायमान हो.

भावार्थः– स्याद्वादथी यथार्थ आत्मज्ञान थया पछी एनुं फळ पूर्ण आत्मानुं प्रगट थवुं ते छे. माटे मोक्षनो इच्छक पुरुष ए ज प्रार्थना करे छे के-मारो पूर्णस्वभाव आत्मा मने प्रगट थाओ; बंधमोक्षमार्गमां पडता अन्य भावोनुं मारे शुं काम छे? २६९.

* कळश २६९ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

अहाहा...! आ कळशमां एकलुं माखण भर्युं छे. लसलसतो शीरो नथी कहेता? घी अने साकर नाखेलो लचपचतो उनोउनो शीरो थाय छे ने? तेम पुण्य-पापना विकल्पथी रहित ज्ञानानंदस्वभावी प्रभु हुं छुं एम ज्यां अंतर्द्रष्टि थई त्यां अंदरमां चैतन्यना तेजनो झगमगाट करतो प्रकाश प्रगट थयो छे, अनुभवमां आव्यो छे. हवे अमारे बीजी चीजथी शुं काम छे? ल्यो, आचार्य आवी भावना भावे छे. कहे छे-

‘स्याद्वाद–दीपित–लसत्–महसि’ स्याद्वाद वडे प्रदीप्त करवामां आवेलुं लसलसतुं (-झगझगाट करतुं) जेनुं तेज छे अने ‘शुध्द–स्वभाव–महिमनि’ जेमां शुद्धस्वभावरूप महिमा छे एवो ‘प्रकाशे उदिते मयि इति’ आ प्रकाश (ज्ञानप्रकाश) ज्यां मारामां उदय पाम्यो छे, त्यां...

‘स्याद्वाद वडे’ एटले शुं? के विकार अने परथी भिन्न एवो ज्ञान, आनंद आदि अनंत गुणथी भरपुर भरेलो पूर्ण आनंदघन-चिदानंदघन प्रभु हुं आत्मा छुं एवी स्वस्वरूपनी अनेकांत द्रष्टि वडे, कहे छे, चैतन्यनुं लसलसतुं-झगझगाट तेज प्रगट थयुं छे. अहाहा...! चैतन्यना आ प्रगट तेज आगळ मोहांधकार अने राग विलय पामी गयां छे. अहाहा...! चैतन्यस्वभावना आश्रय वडे आत्मानुं झगझगाट करतुं अज्ञानने दूर करतुं एवुं चैतन्यतेज-सम्यग्ज्ञानरूपी तेज प्रगट थयुं छे. ल्यो, आनुं नाम धर्म, बाकी पुण्य-पापनी वासना ए तो अधर्म छे. पुण्य भलुं छे एवी वासना अधर्म छे. समजाणुं कांई...? आ तो स्वभावना आश्रये प्रगट झगझगतुं सम्यग्ज्ञानरूपी तेज एवुं छे के तेनी साथे मिथ्यावासनारूपी अंधकार रही शकतो नथी, विलीन थई जाय छे.

अरे, एने पोतानी चीज केवी अने केवडी छे तेनी खबर नथी. तेने संतो कहे छे-भगवान! एक वार जाग प्रभु! राग अने संयोग-कोई तारी चीजमां नथी. तारी चीजमां तो अनंत ज्ञान ने आनंद भर्यां छे. तुं सच्चिदानंद प्रभु छो ने! अहाहा...! जेम पीपरमां चोसठ पहोरी तीखाश अने लीलो रंग भर्यो छे जे घुंटतां बहार आवे छे, तेम भगवान! तारी चीजमां पूर्ण ज्ञान ने आनंद भर्यां छे जे तेनो आश्रय करतां पर्यायमां प्रगट व्यक्त थाय छे. बाकी बहारमां तुं अबजोपति होय तोय कांई नथी; ए तो बधी चीज धूळ छे बापु! अने एना लक्षे तो अनंतकाळमां दुःख