ज थयुं छे. परनो-जडनो महिमा करी करीने भगवान! तुं दुःखी ज थयो छो.
भाई! आ पैसा तो जड माटी-धूळ छे. पैसा कयां तारा थईने रह्या छे? ए तो एनापणे रह्या छे. तारापणे थईने रहे तो ए अरूपी थई जाय, अने जो तुं एने तारापणे माने तो तुं अजीव थई जाय. पण एम तो थतुं नथी. माटे पोतानो महिमा मटाडीने, परनो महिमा करे ए तो बधुं अज्ञान अने मूढता छे. आचार्य कहे छे- निज ज्ञानानंदस्वभावना आश्रये अमने चैतन्यनुं लसलसतुं एवुं तेज प्रगट थयुं छे जेथी अज्ञान अने मूढता विलीन थई गयां छे, नाश पामी गयां छे.
अहा! पोतानी चैतन्यवस्तु तो अनादिथी छे, पण तेने भूलीने अनादि काळथी ए चार गतिमां नर्क- निगोदादिमां अवतार करी करीने दुःखी थई रह्यो छे. अहा! नर्क ने तिर्यंचना एणे अनंत अनंत अवतार कर्या छे. कोई पुण्य योगे मांड मनुष्य थयो ने कांईक धन मळ्युं तो अभिमानमां चढी गयो ने जाणे ‘हुं पहोळो अने शेरी सांकडी,’ एने संतो कहे छे-भाई, जरा सांभळ. जेना वडे तुं अभिमानमां चढयो छे ते चीज तारी नथी. पुण्यना फळमां शेठाई वगेरे मळी जाय पण ए तो धूळ छे. ए धूळनां पद बापु! ए चैतन्यनां पद नहि. अमे तो अनेक वार कहीए छीए के वर्षे जे दस हजार मागे ते नानो मागण, लाख मागे ते मोटो मागण, ने क्रोड मागे ते एनाथी मोटो मागण-भिखारो छे. पोतानी अनंत चैतन्यसंपदाने ओळख्या-अनुभव्या विना आ शेठिया क्रोडपतिओ बधा भिखारा छे. आवी वात जरा कडक लागे पण आ सत्य वात छे. पुण्य मागे ते बधा भिखारा ज छे.
अहा! अंतरमां आनंदनो नाथ सच्चिदानंद प्रभु पोते छे. जेम हीरामां पासा (पहेल) पाडतां प्रकाश वडे झगझगाट चमके छे, तेम भगवान आत्मानो अंतरमां स्वीकार करतां चैतन्यनुं लसलसतुं तेज प्रगट थाय छे. जेम हीरामां चमक भरी छे तेम भगवान आत्मामां ज्ञान ने आनंदनुं पुर्ण भरपुर तेज भर्युं छे. तेमां अंतर-एकाग्र थतां सम्यग्ज्ञाननुं तेज प्रगट थाय छे; अर्थात् शुद्ध स्वभाव जेनो महिमा छे एवो शुद्ध, बुद्ध भगवान आत्मा झगझगाट प्रकाशे छे. आ सम्यग्ज्ञाननो प्रकाश थतां परनो महिमा मटीने निज स्वभावनो महिमा प्रगट थाय छे.
आ देहमां वात, पित्त ने कफ ज्यारे वकरे त्यारे सन्निपात थाय छे. सन्निपात थतां माणस गांडो-पागल थई बहारनी चीजो जोई हसवा लागे छे. ए कांई हरखनुं हसवुं नथी, ए तो सन्निपात बापु! पागलनी दशा भाई! तेम मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान ने मिथ्या आचरण वकरे त्यारे जीव पागल-बेसुध थई जाय छे. पोतानी अंदर अनंती ज्ञान अने आनंदनी संपदा भरी छे छतां, आ शरीर मारुं, आ धन मारुं, आ बायडी-छोकरां मारां, आ गाम मारुं, आ देश मारो-एम बधे मारापणुं करी करीने गांडो-पागल मूढ जेवो थई जाय छे. संतो कहे छे-भाई! जेम करवत वडे लाकडाना बे कटका जुदा करे छे तेम भेदज्ञान वडे स्व अने परने जुदा कर. ज्ञानानंद स्वरूप ते हुं, अने जड देहादि हुं नहि-एम बेने जुदा पाड. अहो! आचार्य भगवान पोतानी वात करीने जगतने समजावे छे के- रागथी भिन्न पडीने स्वभावमां एकाग्र थतां मने लसलसतो ज्ञानप्रकाश उदय पाम्यो छे. आवी वात!
हवे कहे छे-ज्ञानप्रकाश ज्यां मारामां उदय पाम्यो छे त्यां ‘बन्ध–मोक्ष–पथ–पातिभिः अन्य–भावैः किम्’ बंध-मोक्षना मार्गमां पडनारा अन्य भावोथी मारे शुं प्रयोजन छे? ‘नित्यउदयः परम् अयम् स्वभावःस्फुरतु’ नित्य जेनो उदय रहे छे एवो केवळ आ (अनंत चतुष्टयरूप) स्वभाव ज मने स्फुरायमान हो.
अहाहा...! ल्यो, आचार्यदेव कहे छे-मारामां ज्ञानप्रकाश ज्यां उदय पाम्यो छे त्यां हवे बंध-मोक्षना मार्गमां पडनारा अन्य भावोथी मारे शुं प्रयोजन छे? अहाहा...! मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र ते बंधमार्ग छे, ने सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्र ते मोक्षमार्ग छे. पण ए बंध-मोक्षना विकल्पथी मारे शुं काम छे? भगवान एक ज्ञायकना आश्रये, जे स्वभाव अंदर हतो ते झगझगाट करतो प्रगट थयो छे, तो हवे बंध-मोक्षना मार्गमां आवता अनेक दुर्विकल्पथी अमारे शुं काम छे? अमे तो अमारा स्वरूपना निजानंदरसमां विराज्या छीए. अमने हवे अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य-एवी अनंत चतुष्टयनी दशा प्रगट थाओ; अमारे बीजुं कांई जोईतुं नथी. जुओ आ धर्मीनी भावना!
अहाहा...! आचार्यदेव कहे छे-अनादि काळथी पुण्य-पाप ने देहनी क्रिया मारी एवी भ्रमणा वडे संसारमां भमता हता. पण हवे अमने अमारा भगवान-चिदानंदघन प्रभुनो द्रष्टि अने ज्ञान द्वारा भेटो थयो छे. आ स्थितिमां हवे अमने पूर्ण प्रकाश-केवळज्ञान प्रकाश प्राप्त थाय ए ज भावना छे. हवे अमने पूर्ण आनंदना भोगनी भावना