२४४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ छे; बीजा विकल्प ने वृत्तिनुं अमारे काम नथी; पंचमहाव्रतादिना विकल्पथी अमने काम नथी. अहाहा...! अमारी चीजमां पूर्ण ज्ञानानंद स्वभाव भर्यो छे, हवे ते स्वभावनी पूर्ण व्यक्तता थाओ बस ए ज भावना छे. भवनो अभाव थईने अमारी जे निज निधि-अनंत चतुष्य छे ते प्राप्त थाओ; आ सिवाय बीजी कोई (स्वर्गादिनी) अमने वांछा नथी. पुण्य उपजावीने स्वर्गे जाशुं एवी वांछा तो अज्ञानीओने ज होय छे; ज्ञानीने पूर्ण स्वरूपनी प्राप्तिनी ज भावना होय छे.
घणा वखत पहेलांनी लगभग ६६-६७नी सालनी वात छे. ते वखते भावनगरमां ध्रुवनुं नाटक जोवा गयेला. ध्रुवनी माता मरी गई तो ध्रुव वैराग्य पामी साधु थई गयो, अने जंगलमां तप करवा चाल्यो गयो. त्यां तेने तपथी चळाववा उपरथी देवीओ-अप्सराओ आवी अने तरेह तरेहनी चेष्टा वडे तेने चळाववा प्रयत्न करवा लागी. पण चळे तो ध्रुव शानो? ध्रुव चळ्यो नहि. तेणे एटलुं कह्युं-‘हे माताओ! जो मारे बीजो भव हशे तो तमारे कूखे आवीश, बाकी बीजुं हराम छे.’ एम ज्यारे राजकुमारोने ध्रुवनुं भान थई वैराग्य थाय छे त्यारे, जो के घेर अप्सराओ समान स्त्रीओ होय छे छतां, माता पासे रजा लेवा जाय छे अने कहे छे-हे माता! अमे अमारा ध्रुव आनंदस्वरूपने साधवा वनमां जईए छीए; हे शरीरने जन्म देनारी जनेता! एक वार रोवुं होय तो रोई ले, बाकी अमे फरीथी माता करवाना नथी, अमे अमारा आनंदस्वरूपनी प्राप्ति करीशुं, अहीं आचार्यदेव कहे छे-अमारे महाव्रतादिना विकल्पोथी काम नथी, अमने बस पूर्ण दशा-सिद्ध दशा प्राप्त थाओ. साधकपणे अमे जाग्या, तो अमने अमारुं साध्य जे सिद्धपद -पूर्ण परमात्मपद-तेनी प्राप्ति थशे. अमारे ए सिवाय कांई जोईतुं नथी. अहो! धर्मात्मानी अंतरनी भावना दिव्य अलौकिक होय छे; तेओ बहारनी कोई चीज (इन्द्रपद आदि)नी वांछा करता नथी.
नाळियेर छे ने, नाळियेर! तेना चार भाग छेः एक उपरनां छालां, एक काचली, ए काचली तरफनी राती छाल अने चोथुं मीठुं धोळुं टोपरुं. तेम आ आत्माने विषे आ देह ए छालां समान छे, अंदर कर्म छे ते काचली छे, रागद्वेषना भाव ते राती छाल जेवा छे, अने ए राती छालनी पाछळ टोपराना सफेद गोळा जेवो भगवान आत्मा एक ज्ञायक भावपणे विराजे छे. जेम मीठो स्वादिष्ट टोपरापाक करवो होय तो रातड-लाल छाल काढी नाखवी पडे तेम अनाकुळ आनंद जोईए तेणे रागथी भिन्न पडवुं जोईए. भाई, रागथी भिन्न पडी शुद्ध चैतन्य स्वभावनुं आलंबन कर्या विना बधुं निरर्थक छे. अन्यमतमां नरसिंह महेता थया ते पण आवुं कहे छे, जुओने-
ज्यां लगी आतमातत्त्व चीन्यो नहि, त्यां लगी साधना सर्व जूठी.’ भाई, आ समजवानां टाणां आव्यां त्यारे तुं बीजे रोकाई जाय, वेपार-धंधामां ने छोकरा-छोकरीनुं करवामां रोकाई जाय तो अवसर वीती जशे, ने अज्ञान ऊभुं रहेशे. पछी कयां उतारा करीश बापु!
अहा! आत्मा एक श्वासनी क्रिया करी शकतो नथी के तेने फेरवी शकतो नथी त्यां हुं बधी दुनियानां काम करुं छुं एवी मान्यता मिथ्या भ्रम ने मिथ्या अभिमान नथी तो शुं छे? अहा!-
गाडानी नीचे कुतरुं चालतुं होय ते एम जाणे के आ गाडुं माराथी चाले छे, तेम परवस्तुनी क्रिया परथी थाय तेने अज्ञानी हुं करुं छुं एम माने छे. अहा! ओला कुतराना जेवो आने मिथ्या भ्रम छे, कर्तापणानुं मिथ्या अभिमान छे. अहा! आवी भ्रमणाने भांगी अंदर भगवान जाग्यो छे तो कहे छे-अमने आनंदनो स्वाद प्रगट थयो छे, ने पूर्ण आनंदनी दशा थाओ; सिद्धपदनी प्राप्ति थाओ. आवी भावना!
‘स्याद्वादथी यथार्थ आत्मज्ञान थया पछी एनुं फळ पूर्ण आत्मानुं प्रगट थवुं ते छे.’ जुओ, द्रव्यकर्म, भावकर्म अने नोकर्मथी भिन्न ज्ञानानंदस्वभावी प्रभु हुं आत्मा छुं एम निश्चय करी निजस्वरूपमां एकाग्र थाय तेने आत्मज्ञाननुं तेज प्राप्त थाय छे. आत्मज्ञान थया पछी तेने स्वरूपमां रमणतानी ज भावना होय छे. ते स्वरूपमां रमणताना पुरुषार्थ वडे तेना फळरूप पूर्ण आत्मानी प्राप्ति करी ले छे; आ रीते तेने पूर्ण ज्ञान ने आनंदनी प्रगटता थाय छे. आम पूर्ण स्वभावनी प्रगटता ते आत्मज्ञाननुं फळ छे, ने आत्मज्ञानीने ते थईने रहे छे. जुओ आ आत्मज्ञाननुं फळ! आत्मज्ञाननुं फळ मोक्ष छे.