‘माटे मोक्षनो इच्छक पुरुष ए ज प्रार्थना करे छे के-मारो पूर्णस्वभाव आत्मा मने प्रगट थाओ; बंधमोक्ष- मार्गमां पडता अन्य भावोनुं मारे शुं काम छे?’
जुओ आ धर्मीनी भावना! मोक्षना इच्छुक धर्मी पुरुषो निरंतर परमात्मपदनी-पूर्णस्वभावनी प्राप्तिरूप सिद्धपदनी ज भावना भावे छे; एमने बीजी कोई इच्छा होती नथी. तेमने बंधमोक्षमार्गमां पडता जे अन्य भावो तेनाथी प्रयोजन नथी. व्रतादि विकल्पो ने तेना फळमां प्राप्त थतां इन्द्रादि पदो-एनाथी धर्मीने प्रयोजन नथी. धर्मीनी द्रष्टि पूर्ण द्रव्यस्वभाव पर होय छे, अने पूर्णनी प्राप्तिनी ज तेने भावना होय छे. धर्मीनी अंतरदशा अलौकिक होय छे, लौकिक पदोमां ते राचता नथी. आवी वात छे.
‘जोके नयो वडे आत्मा सधाय छे तोपण जो नयो पर ज द्रष्टि रहे तो नयोमां तो परस्पर विरोध पण छे, माटे हुं नयोने अविरोध करीने अर्थात् नयोनो विरोध मटाडीने आत्माने अनुभवुं छुं’-एवा अर्थनुं काव्य कहे छेः-
सद्यः प्रणश्यति नयेक्षणखण्डयमानः।
मेकान्तशान्तमचलं चिदहं महोऽस्मि।। २७०।।
श्लोकार्थः– [चित्र–आत्मशक्ति–समुदायमयः अयम् आत्मा] अनेक प्रकारनी निज शक्तिओना समुदायमय आ आत्मा [नय–ईक्षण–खण्डयमानः] नयोनी द्रष्टिथी खंडखंडरूप करवामां आवतां [सद्यः] तत्काळ [प्रणश्यति] नाश पामे छे; [तस्मात्] माटे हुं एम अनुभवुं छुं के– [अनिराकृत–खण्डम् अखण्डम्] जेमांथी खंडोने निराकृत करवामां आव्या नथी छतां जे अखंड छे, [एकम्] एक छे, [एकान्त–शान्तम्] एकांत शांत छे (अर्थात् जेमां कर्मना उदयनो लेश पण नथी एवा अत्यंत शांत भावमय छे) अने [अचलम्] अचळ छे (अर्थात् कर्मना उदयथी चळाव्युं चळतुं नथी) एवुं [चिद् महः अहम् अस्मि] चैतन्यमात्र तेज हुं छुं.
भावार्थः– आत्मामां अनेक शक्तिओ छे अने एक एक शक्तिनो ग्राहक एक एक नय छे; माटे जो नयोनी एकांत द्रष्टिथी जोवामां आवे तो आत्माना खंड खंड थईने तेनो नाश थई जाय. आम होवाथी स्याद्वादी, नयोनो विरोध मटाडीने चैतन्यमात्र वस्तुने अनेकशक्तिसमूहरूप, सामान्यविशेषस्वरूप, सर्वशक्तिमय एकज्ञानमात्र अनुभवे छे. एवुं ज वस्तुनुं स्वरूप छे, एमां विरोध नथी. २७०.
‘चित्र–आत्मशक्ति–समुदायमयः अयम् आत्मा’ अनेक प्रकारनी निज शक्तिओना समुदायमय आ आत्मा ‘नय–ईक्षण–खण्डयमानः’ नयोनी द्रष्टिथी खंडखंडरूप करवामां आवतां ‘सद्यः’ तत्काळ ‘प्रणश्यति’ नाश पामे छे;...
अहाहा...! अनंत शक्तिओना समुदायमय भगवान आत्मा छे. भगवान आत्मा जीवत्व, चिति, दृशि, ज्ञान, सुख, वीर्य, प्रभुत्व, विभुत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वदर्शित्व आदि अनंत गुणना समुदायमय अखंड एक चैतन्यवस्तु छे. समयसारमां ४७ शक्तिओनुं आचार्य भगवाने वर्णन कर्युं छे, पण आत्मा छे अनंत गुणना समुदायमय वस्तु.
अहाहा...! आ तो अलौकिक अमृतभर्या कलशो छे भाई! जेने संसारनुं दुःख मटाडी अनाकुळ आनंदमां रहेवुं छे एना माटे आ अलौकिक वात छे. वादविवाद करी बीजाने हराववा छे एना माटे आ वात नथी. योगसारमां आवे छे ने के-