Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११

‘चार गति दुःखथी डरे तो तज सौ परभाव’

अहाहा...! संसारमां चारे गति दुःखरूप छे. स्वर्गमां देव पण दुःखी छे, अने मनुष्यमां करोडपति, अबजोपति ने मोटा मोटा राजा-चक्रवर्ती पण दुःखी छे. संसार एटले ज दुःख बापु! अहा! आवा दुःखमय संसारथी छुटवुं होय एना माटे आ वात छे. समजाय छे कांई...? अहा! दिगंबर संतोनी कथनीमां अपार उंडाण भर्युं होय छे.

अहाहा...! भगवान! तुं कोण छो? तो कहे छे-अनंत गुणरत्नाकर-चैतन्यरत्नाकर-ज्ञान अने आनंदनो सागर प्रभु तुं छो. हुं आवो छुं एम हा तो पाड, हा पाडे तो हालत थशे. बाकी हा पाडे तोय आवो छो. ने ना पाडे तोय आवो छो.

अहा! आवा आत्माने, कहे छे, नयोनी द्रष्टिथी खंडखंड करवामां आवतां तत्काळ नाश पामे छे. एटले शुं? के तेना एक एक धर्मने एक एक नयथी लक्षमां लेतां आखो आत्मा खंडखंड थई जाय छे. एक अभेद स्वरूपने नय-धर्मथी जोतां वा गुणभेदथी जोतां अभेदनो नाश थई जाय छे, अर्थात् अभेद द्रष्टिमां आवतो नथी. ल्यो, हवे ज्यां आवुं छे त्यां व्रत, तप, भक्ति, पूजा इत्यादिना शुभरागथी धर्म थाय ए कयां रह्युं?

जुओ, अज्ञानीने पोतानी चैतन्यवस्तु गायब छे. तेनी प्राप्ति केम थाय तेनी आ वात छे. तो कहे छे- आत्मा वस्तुए अभेद एक छे, तेमां अनंत गुण छे, पण अनंत गुणमय वस्तु अभेद एक छे. अहा! आवा आत्माने एक एक नयथी जोतां आत्मवस्तु आखी खंडखंड थई जाय छे, अर्थात् पूर्ण आत्मवस्तु द्रष्टिमांथी खोवाई जाय छे, ज्ञान अने द्रष्टिमां आत्मवस्तुनी प्राप्ति थती नथी. अहाहा...! एक एक नयथी जोतां एक एक नय-धर्म उपसी आवे छे, तत्संबंधी विकल्प उठे छे, पण अखंड अभेद वस्तु लक्षमां आवती नथी. आत्माने भेदथी ज्यां द्रष्टिमां लेवा जाय छे त्यां भेद-विकल्प उठे छे, पण अभेद लक्षमां आवतो नथी, एटले द्रष्टिमां ते क्षणे ते गूम थई जाय छे. अहाहा...! परथी ने रागथी आत्मानी प्राप्ति थवानुं तो दूर रहो, अहीं कहे छे-आत्माने तेना एक एक गुणथी जोवा जतां तेनी प्राप्ति थती नथी. अहाहा...! शुं कळश छे! गजबनी वात भाई!

कहे छे-बीजी वात (निमित्तथी ने व्यवहारथी थाय ए वात) तो तुं जवा दे, जाणवा लायक जे ज्ञेय छे एवो तारो अखंड एक आत्मपदार्थ तेने जाणवामां, तेमां रहेली अनंत शक्तिओने भेद पाडीने जोवा जतां, कहे छे, एकरूप आत्मपदार्थ द्रष्टिमां आवतो नथी, परंतु विकल्प उठे छे, आ रीते आत्मपदार्थ श्रद्धा-ज्ञानमां नाश पामे छे; अर्थात् भगवान ज्ञायकनुं यथार्थ ज्ञान-श्रद्धान उदय पामतुं नथी. शुभरागथी-व्यवहारथी ने निमित्तथी धर्म थाय ए तो एककोर काढी नाख्युं, केमके ए तो आत्माना अस्तित्वमां ज नथी, भिन्न चीज छे. आ तो एनामां जे छे एनी वात छे. भाई, तारा तत्त्वमां अनंत गुण छे, ते होतां एक एकने भेद पाडीने लक्षमां लेतां विकल्प उत्पन्न थाय छे, अभेद एकरूप द्रव्यनी द्रष्टि थती नथी. आवो मारग छे. ज्ञान अने द्रष्टिनो दोर अभेद एक द्रव्य पर होवो जोईए. व्यवहार हो, पण एनी अंतर्द्रष्टिमां कांई ज किंमत नथी.

आवो मारग तो सरळ छे बापु! पण एने जे रीते छे ते रीते निःसंदेह बेसवो जोईए. अरे, लोको तो निमित्त ने व्यवहारमां अटकया छे, पण ए मार्ग नथी, केमके निमित्त ने व्यवहार आत्मानी चीज ज नथी. आवी वस्तुस्थिति छे.

हवे आचार्यदेव पोतानी वात करे छे. कहे छे- ‘तस्मात्’ माटे हुं एम अनुभवुं छुं के- ‘अनिराकृत–खण्डम् अखण्डम्’ जेमांथी खंडोने निराकृत करवामां आव्यानथी छतां जे अखंड छे, ‘एकम्’ एक छे, ‘एकान्त शान्तम्’ एकांत शांत छे (अर्थात् जेमां कर्मना उदयनो लेश पण नथी एवा अत्यंत शांत भावमय छे) अने ‘अचलम्’ अचळ छे (अर्थात् कर्मना उदयथी चळाव्युं चळतुं नथी) एवुं ‘चिद् महः अहम् अस्मि’ चैतन्यमात्र तेज हुं छुं.

जोयुं? आत्मामांथी भेदोने निराकृत अर्थात् रदबातल नथी कर्या, बहिष्कृत नथी कर्या, आत्मामां अनंत गुण छे खरा, तथापि भगवान आत्मा अखंड एक ज्ञायक वस्तु छे, ने ए अखंडनी द्रष्टि करवाथी आत्मानी प्राप्ति थाय छे, भेदनी द्रष्टिथी नहि; भेदनी द्रष्टिथी तो विकल्प उठे छे, निर्विकल्पता थती नथी. अहाहा...! अनंत गुणनुं एकरूप आत्मा -आवुं आत्मस्वरूप सर्वज्ञ सिवाय कोण कहे? बीजाओ तो मतिकल्पनाथी कहे छे, पण ते सत्य नथी, मिथ्या छे.

अहाहा...! आवी आत्मवस्तु एकांत शांत छे, सर्वथा शांत छे. शांत... शांत... शांतस्वरूप ज आत्मा छे एम, कहे छे, अमे अनुभवीए छीए. अहाहा...! द्रष्टिनो विषयभूत आत्मा अखंड अभेद छे, एक छे ने एकांत