Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कळश-२७०ः २४७

शांत छे; जेमां विकल्पनो कोलाहल ने कर्मना उदयनो लेश पण नथी एवो अत्यंत शांत भावमय प्रभु आत्मा छे.

अहाहा...! अनेकांत स्वरूप भगवान आत्मा एकांत शांत भावमय छे, पूर्ण शांत छे. वळी ते अचळ छे. कर्मना उदयथी कदीय चळे नहि एवो त्रिकाळ अचळ छे. अहाहा...! कहे छे-सदाय अचळ छे एवुं चैतन्यमात्र तेज हुं छुं. ल्यो, आवा आत्माने द्रष्टिमां लेवो तेनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. समजाणुं कांई...? आवो मारग भाई! आत्मा जिनस्वरूप ज छे. जिन अने जिनवरमां कांई ज फेर नथी.

* कळश २७०ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘आत्मामां अनेक शक्तिओ छे अने एक एक शक्तिनो ग्राहक एक एक नय छे; माटे जो नयोनी एकांत द्रष्टिथी जोवामां आवे तो आत्माना खंडखंड थईने तेनो नाश थई जाय.’

जोयुं? कहे छे-एक एक नयथी एक एक शक्तिने जोवामां आवे तो आत्माना खंडखंड थईने तेनो नाश थई जाय; अर्थात् अखंड द्रव्य-वस्तु ज्ञानमां आवे नहि.

अहीं कोई कहे के-आत्मा खंडखंड कयांथी थाय? केमके शास्त्रमां आवे छे के-न छिदन्ति, न भिदन्ति.

भाई! अहीं कई अपेक्षाथी वात छे ते समजवी जोईए. वस्तु तो अखंड ज छे, पण एक एक गुणने लक्षमां लेतां आत्मा अनेक खंडखंडरूप भासशे, अखंडरूप नहि भासे एम एनो अर्थ छे. एम तो आत्मा अनादिअनंत त्रिकाळ अविनाशी छे, पण एक एक भेदने लक्ष करी ग्रहण करतां खंडखंड थईने तेनो नाश थई जाय छे. हवे आनो अर्थ शुं? ए ज के पोतानी हयातीमां अखंड-एकपणुं भास्युं नहि, अने खंडखंडपणुं भास्युं तो ते अखंडपणानी नास्ति छे. समजाणुं कांई...? ज्ञानमां अखंडपणुं भास्युं नहि तो अखंडपणुं कयां रह्युं? अखंड तो छे, पण एना ज्ञानमां अखंडनी नास्ति थई.

हवे कहे छे-‘आम होवाथी स्याद्वादी, नयोनो विरोध मटाडीने चैतन्यमात्र वस्तुने अनेकशक्तिसमूहरूप, सामान्य-विशेषस्वरूप, सर्वशक्तिमय एकज्ञानमात्र अनुभवे छे. एवुं ज वस्तुनुं स्वरूप छे, एमां विरोध नथी.’

वस्तुमां नित्य, अनित्य; एक, अनेक इत्यादि धर्मो छे, तथा सामान्य द्रव्यस्वरूपथी एकरूप अने विशेष अपेक्षा भेदरूप एम वस्तु छे, तथापि (आ रीते वस्तुने प्रथम जाणीने) वस्तुने सर्वशक्तिमय अभेद एक ज्ञानमात्र अनुभवे छे तेनुं नाम सम्यग्दर्शन ने सम्यग्ज्ञान छे. हुं एक चैतन्यमात्र वस्तु छुं एवी द्रष्टि करीने वस्तुमां एकाग्र थई परिणमवुं एनुं नाम धर्म छे; एनुं नाम आत्मानी स्वीकृति ने ओळखाण छे, ने ए ज स्वानुभव छे. आवुं ज वस्तुस्वरूप छे, स्याद्वादीने एमां विरोध नथी; विरोधनुं निराकरण छे.

* * *

हवे, ज्ञानी अखंड आत्मानो आवो अनुभव करे छे एम आचार्यदेव गद्यमां कहे छेः

‘न द्रव्येण खण्डयामि, न क्षेत्रेण खण्डयामि, न कालेन खण्डयामि, न भावेन खण्डयामि; सुविशुध्द एको ज्ञानमात्रो भावोऽस्मि’

‘(ज्ञानी शुद्धनयनुं आलंबन लई एम अनुभवे छे केः) हुं मने अर्थात् मारा शुद्धत्मस्वरूपने नथी द्रव्यथी खंडतो (-खंडित करतो), नथी क्षेत्रथी खंडतो, नथी काळथी खंडतो, नथी भावथी खंडतो; सुविशुद्ध एक ज्ञानमात्र भाव छुं.’

‘शुद्धनयनुं आलंबन लई’-एटले शुं? के शुद्धनयना विषयभूत अभेद एक शुद्ध चैतन्यमात्र निज वस्तुनुं आलंबन लई ज्ञानी एम अनुभवे छे के-द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावथी हुं मने खंडतो नथी. द्रव्यथी जुदो, क्षेत्रथी जुदो, काळथी जुदो ने भावथी जुदो-एम हुं मने खंडखंडरूप अनुभवतो नथी. द्रव्यमां द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भाव-बधुं ज अभेदपणे समाय छे एवो हुं पोताने अखंड अनुभवुं छुं. द्रव्यथी शुं, क्षेत्रथी शुं, काळथी शुं, भावथी शुं-हुं तो आखी अखंड एक ज वस्तुने अनुभवुं छुं. वस्तुमां एनुं द्रव्य, एनुं क्षेत्र, एनो काळ (-अवस्था) अने एना भाव (गुण) जुदा जुदा छे एम छे ज नहि.

कळश टीकामां केरीनुं द्रष्टांत आप्युं छे ने? जेवी रीते केरीमां कोई अंश रेसा छे, कोई अंश फोतरुं छे, कोई अंश गोटली छे तथा कोई अंश मीठाशरूपे छे-ए चारे अंश जुदेजुदा छे, एम एक जीववस्तुमां कोई अंश जीवद्रव्य छे, कोई अंश जीवक्षेत्र छे, कोई अंश जीवकाळ छे, अने कोई अंश जीवभाव छे-एम चार जुदेजुदा नथी. ए तो एक