२४८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ अभेद वस्तुमां चार जुदा भाग पडी गया. एवुं मानतां विपरीतता थशे, अर्थात् वस्तु जेवी अखंड छे तेवी रहेशे नहि.
माटे आ प्रकारे छेः केरी एक स्पर्श, रस, गंध, वर्णयुक्त पुद्गलनो पिंड छे. तेथी स्पर्शमात्रथी विचारतां (ए ज केरी) स्पर्शमात्र छे, रसमात्रथी विचारतां (ए ज केरी) रसमात्र छे, गंधमात्रथी विचारतां (ए ज केरी) गंधमात्र छे अने वर्णथी विचारतां (ए ज केरी) वर्णमात्र छे. एटले के केरी (स्वभावथी) एकरूप छे, अखंड छे; तेने स्पर्शथी जुओ तोय केरी, रसथी जुओ तोय केरी, गंधथी जुओ तोय केरी, ने वर्णथी जुओ तोय केरी ज छे. (स्पर्श-रस-गंध-वर्ण केरीथी जुदी चीज नथी)
एम जीवद्रव्यने (एक अखंड वस्तुने) द्रव्यथी जुओ तोय ए अखंड वस्तु छे, क्षेत्रथी जुओ तोय ए अखंड वस्तु छे, काळथी जुओ तोय ए अखंड वस्तु छे, ने भावथी जुओ तोय ए त्रिकाळी अखंड वस्तु छे. एक अखंड चैतन्यवस्तु द्रव्यथी जुदी, क्षेत्रथी जुदी, काळथी जुदी, ने भावथी जुदी एम छे नहि. द्रव्य जुओ तो क्षेत्र-काळ-भाव छे, क्षेत्र जुओ तो द्रव्य-काळ-भाव छे, काळथी जुओ तो द्रव्य-क्षेत्र-भाव छे, ने भावथी जुओ तो द्रव्य-क्षेत्र-काळ छे. द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भाव चारेय अभेद एक वस्तु छे.
ज्ञानी कहे छे-सुविशुद्ध एक ज्ञानमात्र भाव हुं छुं. एक ज्ञानमात्र भाव ते हुं एम कहेतां एमां अभेदपणे द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भाव आवी गया; चार कांई जुदा छे एम छे नहि.
‘शुद्धनयथी जोवामां आवे तो शुद्ध चैतन्यमात्र भावमां द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावथी कांई पण भेद देखातो नथी. माटे ज्ञानी अभेदज्ञानस्वरूप अनुभवमां भेद करतो नथी.’
शुद्धनयथी जोवामां आवे तो एटले के अभेद एक द्रव्यने जोवामां आवे तो शुद्ध चैतन्यमात्र भावमां द्रव्य- क्षेत्र-काळ-भावथी कांई पण भेद देखातो नथी; एटले के वस्तु अभेद ज अनुभवमां आवे छे. जुओ आ ज्ञानीनी अनुभूति! धर्मी-ज्ञानी पुरुष अखंड एक वस्तुमां भेद पाडतो-जोतो नथी.
एक वस्तुने द्रव्य कहो तोय ए, क्षेत्र कहो तोय ए, काळ कहो तोय ए, ने भाव कहो तोय ए; ज्ञानी पोतानी ज्ञानमात्र वस्तुने एक-अभेदपणे ग्रहण करे छे, खंडखंड करी जोतो-अनुभवतो नथी. वस्तु-द्रव्य कहो तोय ए द्रव्य-क्षेत्र कहो तोय असंख्यात प्रदेशी ए द्रव्य, काळ कहो तोय ए त्रिकाळी द्रव्य, ने भाव कहो तोय ए ज्ञानमात्र द्रव्य-एम चारेथी जोतां ज्ञानी अभेद एक निर्विकल्प वस्तुमात्र ज देखे छे. अंतर्द्रष्टिमां भेद नथी, एमां तो एकलो अभेदनो ज अनुभव छे. आवी वात! समजाणुं कांई...?
‘ज्ञानमात्र भाव पोते ज ज्ञान छे, पोते ज पोतानुं ज्ञेय छे अने पोते ज पोतानो ज्ञाता छे-एवा अर्थनुं काव्य हवे कहे छेः
ज्ञेयो ज्ञेयज्ञानमात्रः स नैव।
ज्ञेयो ज्ञेयज्ञानकल्लोलवल्गन्
श्लोकार्थः– [यः अयं ज्ञानमात्रः भावः अहम् अस्मि सः ज्ञेय–ज्ञानमात्रः एव न ज्ञेयः] जे आ ज्ञानमात्र भाव हुं छुं ते ज्ञेयोना ज्ञानमात्र ज न जाणवो; [ज्ञेय–ज्ञान–कल्लोल–वल्गन्] (परंतु) ज्ञेयोना आकारे थता ज्ञानना कल्लोलोरूपे परिणमतो ते, [ज्ञान–ज्ञेय–ज्ञातृमत्–वस्तुमात्रः ज्ञेयः] ज्ञान–ज्ञेय–ज्ञातामय वस्तुमात्र जाणवो (अर्थात्