२प०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ जे अनंतानंत छे ते बधाने जाणनारी तारी ज्ञाननी दशा ते खरेखर तारुं ज्ञेय छे. ते दशा एकली नहि, पण तारा द्रव्य-गुण-पर्याय ते बधुं ज्ञेय छे. अहाहा...! ते समस्तनुं (-पोतानुं) ज्ञान ते ज्ञान, ते समस्त (-पोते) ज्ञेय अने पोते ज्ञाता-ए त्रणेय वस्तु एकनी एक छे, त्रण भेद नथी. आवी झीणी वात! ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय त्रणे भावो सहित वस्तुमात्र पोते एक छे.
अहाहा...! बहु सरस भावार्थ छे; वस्तुना मर्मनुं माखण छे. कहे छे-पोताना द्रव्य उपर द्रष्टि आपतां पोते ज ज्ञाता, पोते ज ज्ञान अने पोते ज ज्ञेय छे एम अनुभवाय छे, छ द्रव्य ज्ञेय, हुं ज्ञान अने हुं ज्ञाता एम अनुभवातुं नथी; केमके परमार्थे पर साथे ज्ञेय-ज्ञायक संबंध छे ज नहि. आवी वात!
कहे छे-‘ज्ञानमात्र भाव जाणनक्रियारूप होवाथी ज्ञानस्वरूप छे.’ जुओ, शुं कीधुं? के ज्ञेयो जगतना छे तेने जाणवारूप जाणनक्रिया ते ज्ञान-स्वरूप छे, ज्ञेयस्वरूप नथी. ज्ञाननी पर्यायमां छ द्रव्य जणाय छे ते खरेखर छ द्रव्य जणाता नथी, पण छ द्रव्य संबंधी पोतानुं जे ज्ञान ते जणाय छे अने ते खरेखर आत्मानुं ज्ञेय छे. परज्ञेय जणाय छे एम कहेवुं ए तो व्यवहार छे. ज्ञेय संबंधी पोतानी ज्ञाननी पर्याय जाणवारूप थई ते एनुं ज्ञेय छे, ओलुं (परज्ञेय) नहि, केमके पोतामां पोतानी ज्ञानपर्यायनुं अस्तित्व छे (परनुं नहि). अहाहा...! छ द्रव्यने जाणवानी ज्ञाननी पर्याय पोतानी छे, तेने छ द्रव्यनुं ज्ञान कहेवुं ते व्यवहार छे; ज्ञेय-ज्ञान ज्ञेयनुं नथी, पण ज्ञाननुं ज्ञान छे, जाणनक्रियारूपभाव ज्ञानस्वरूप छे. पं. जयचंदजी ए ज स्पष्ट करे छे-
‘वळी ते पोते ज नीचे प्रमाणे ज्ञेयरूप छे. बाह्य ज्ञेयो ज्ञानथी जुदां छे, ज्ञानमां पेसतां नथी; ज्ञेयोना आकारनी झलक ज्ञानमां आवतां ज्ञान ज्ञेयाकाररूप देखाय छे परंतु ए ज्ञानना ज कल्लोलो (तरंगो) छे. ते ज्ञानकल्लोलो ज ज्ञान वडे जणाय छे.’
अहाहा...! जुओ, बाह्य ज्ञेयो-रागादिकथी मांडी छए द्रव्यो पोताना आत्माथी (-पोताना द्रव्य-गुण-पर्याय त्रणेथी) जुदां छे. जो ते जुदां न होय तो एक होय, पण एम कदी बनतुं नथी, छे नहि.
रागनुं ज्ञान थाय तेमां कांई राग ज्ञाननी पर्यायमां आवतो नथी. केवळीने लोकालोकनुं ज्ञान थयुं तो लोकालोक कांई ज्ञानमां पेसी गयां नथी. घटनो जाणनार घट-रूपे थतो नथी. वळी घटनो जाणनार वास्तवमां घटने जाणे छे एम नथी. स्वपरने जाणवाना ज्ञानरूपे स्वयं आत्मा ज थाय छे. घटने जाणवाना ज्ञानरूपे आत्मा थाय छे; तेथी घटनुं ज्ञान नहि, पण आत्मानुं ज ज्ञान छे. पोतानामां तो पोताना ज्ञानपरिणामनुं अस्तित्व छे, ज्ञेयनुं नहि. आत्मानो ‘ज्ञ’ स्वभाव छे, ने ‘ज्ञ’ स्वभावी आत्मामां जाणनक्रिया थाय ते पोताथी थती पोतानी क्रिया छे, एमां परज्ञेयनुं कांई ज नथी. आम ज्ञेय संबंधी पोताना ज्ञाननुं जे परिणमन थयुं ते ज्ञेय पोते, ज्ञान पोते ज, ने पोते ज ज्ञाता छे. समजाणुं कांई...?
ज्ञेयोना आकारनी झलक ज्ञानमां आवतां ज्ञान ज्ञेयाकार देखाय छे, परंतु ए ज्ञानना ज कल्लोलो छे. जुओ, ज्ञान ज्ञेयाकार छे एम नहि, ए तो ज्ञेयने जाणवा प्रति तेवा ज्ञानाकारे ज्ञान पोते ज थयुं छे. ज्ञेयनुं तेमां कांई ज नथी. ज्ञेय ज्ञानमां पेठुं छे एम छे ज नहि; अर्थात् ज्ञान ज्ञेयरूपे थाय छे एम छे ज नहि. ज्ञान ज्ञानाकार ज छे, ए ज्ञानना ज कल्लोलो छे.
अहाहा...! केवुं भेदज्ञान कराव्युं छे! वीतराग मार्ग बहु सूक्ष्म छे भाई! जरा धीरो थईने सांभळ. कहे छे- आत्मा परने करे के परथी आत्मामां कांई थाय ए वात तो जवा दे, ए वात तो छे नहि, पण पर ज्ञाननी पर्यायमां जणाय, ज्ञान परने जाणे के परज्ञेय ज्ञाननी पर्यायमां आवे-पेसे एम पण छे नहि. वस्तु-द्रव्य एक ज्ञायकभावपणे छे ते पोते ज्ञाननी पर्यायपणे, जाणनक्रियारूपे थाय छे ते पोतानी स्वपरप्रकाशकनी क्रिया छे. एमां पर जणाय छे एम कहेवुं ते व्यवहार छे बस. पर जणातुं नथी, पोतानी जाणनक्रिया जाणवारूपे छे ते जणाय छे.
भगवान! तुं आवडो ने आवो ज छे; बीजी रीते मान तो तारा स्वभावनो घात थशे. सर्वज्ञ परमेश्वर कहे छे-लोकालोक जणाय एवडी तारी पर्याय नथी, तारी ज्ञानपर्यायने तुं जाण एवुं तारुं स्वरूप छे. लोकालोकने जाणवुं एम कहेवुं ए असद्भूत व्यवहार छे, जूठो व्यवहार छे.