तो साचो व्यवहार शुं छे? ते आ; पोते जाणग-जाणवाना भाववाळुं तत्त्व होवाथी लोकालोकनां जेटलां ज्ञेयो छे तेने अने पोताने जाणवानी क्रियारूपे पोतामां (पोताना अस्तित्वमां) पोताना कारणे परिणमे छे. खरेखर तो आ ज्ञाननो पर्याय ते ज्ञेय छे. ज्ञाननी पर्यायनुं पर (पदार्थ) ज्ञेय छे एम कहेवुं ते व्यवहार छे. आवी वात छे.
ज्ञेयोना आकार एटले ज्ञेयोना विशेषो-एनी ज्ञानमां झलक आवे छे अर्थात् ते संबंधीनुं पोतानुं ज्ञान पोतामां पोताथी परिणमे छे. ते ज्ञान ज्ञेयाकार देखाय छे एम कह्युं पण ते ज्ञेयाकार थयुं नथी, ए तो ज्ञानाकार- ज्ञानना ज तरंगो छे. अहाहा...! जाणग... जाणग... जाणग पोतानो स्वभाव छे, एमां परवस्तुनो-परज्ञेयनो प्रवेश नथी, छतां एनुं जाणवुं अहीं (-पोतामां) थाय छे ते खरेखर एनुं (परज्ञेयनुं) जाणवुं नथी; जाणवानी पोतानी दशा छे एनुं जाणवुं छे. आ न्यायथी तो वात छे; एने समजवी तो पडे ने! कोई थोडुं समजावी दे?
जुओ, दर्पणना द्रष्टांते आ वात समजीएः जेम दर्पणनी सामे कोलसा, अग्नि वगेरे मूकेलां होय ते दर्पणमां देखाय छे. पण ए दर्पणथी जुदी चीज छे ने? दर्पणमां तो ते पदार्थोनी झलक देखाय छे, पण शुं कोलसा ने अग्नि वगेरे दर्पणमां छे? दर्पणमां तो दर्पणनी स्वच्छतानुं अस्तित्व छे. जो अग्नि वगेरे तेमां पेठां होय तो दर्पण अग्निमय थई जाय, तेने हाथ अडकाडये हाथ बळी जाय. पण एम छे नहि. दर्पण दर्पणनी स्वच्छताना परिणामे पोते ज पोताथी परिणम्युं छे; कोलसा के अग्निनुं तेमां कांई ज नथी. समजाणुं कांई...?
आ शुं कीधुं? ल्यो, फरीथी. एक बाजु दर्पण छे, अने तेनी सामे एक बाजु अग्नि ने बरफ छे. अग्नि अग्निमां लबक-झबक थाय छे, ने बरफ बरफमां पीगळतो जाय छे. ते समये दर्पणमां पण बस एवुं ज देखाय छे. तो शुं दर्पणमां अग्नि ने बरफ छे? ना; अग्नि अने बरफनुं होवुं तो बहार पोतपोतामां छे, दर्पणमां तेमनुं होवापणुं नथी, दर्पणमां तेओ पेठा नथी. दर्पणमां तो दर्पणनी ते-रूप स्वच्छ दशा थई छे ते छे. अग्नि अने बरफ संबंधी दर्पणनी स्वच्छतानी दशा ते दर्पणनुं पोतानुं परिणमन छे, अग्नि ने बरफनुं तेमां कांई ज नथी; अग्नि अने बरफे एमां कांई ज कर्युं नथी, ए तो जुदा पदार्थो छे.
तेम भगवान आत्मा स्वच्छ चैतन्य दर्पण छे. तेना ज्ञानमां ज्ञेयोना आकारनी झलक आवतां ज्ञान ज्ञेयाकार देखाय छे. सामे जेवा ज्ञेयो छे ते ज प्रकारनी विशेषतारूपे पोतानी ज्ञाननी दशा थतां जाणे के ज्ञान ज्ञेयाकारे थई गयुं होय तेम देखाय छे, परंतु ज्ञान ज्ञेयाकार थयुं ज नथी, ज्ञानाकार छे; अर्थात् ते ज्ञेयना कल्लोलो नथी, पण ज्ञानना ज कल्लोलो छे, ज्ञाननी ज दशा छे; ज्ञेयोनुं एमां कांई ज नथी. समजाणुं कांई...?
अहा! आवो पोताना अस्तित्वनो महिमा जाण्या विना भाई! तुं दया, दान, व्रत, तप करीकरीने सूकाई जाय तोय लेश पण धर्म थाय नहि. पोताना स्वरूपना महातम (-माहात्म्य) विना धर्मनी क्रिया कोई दि’ थई शकती नथी.
नानी उंमरनी वात छे. पालेजमां पिताजीनी दुकान हती. ते बंध करी रात्रे महाराज उपाश्रयमां आव्या होय त्यां एमनी पासे जता. त्यां महाराज गाता-
हवे आमां तत्त्वनी कांई खबर नहि, पण सांभळीने ते वखते राजी राजी थई जता. लोकमां पण बधे आवुं ज चाली रह्युं छे ने! पोते कोण ने केवडो छे एनी खबर न मळे, पण मांडे व्रत, तप, भक्ति, पूजा आदि करवा; एम के एनाथी धर्म थशे, पण धूळमांय धर्म नहि थाय. पोते कोण छे एनी खबर विना शेमां धर्म थशे? बापु! हुं ज्ञानस्वभाव छुं एम भूलीने रागना कर्तापणामां मंडयो रहे ए तो पागलपणुं छे. दुनिया आखी आवी पागल छे. समजाणुं कांई...?
अहाहा...! अहीं कहे छे-‘आ ज्ञानकल्लोलो ज ज्ञान वडे जणाय छे.’ पोताना होवापणामां दया, दान आदिना भाव, के शरीर, मन, वाणी इत्यादि परज्ञेयोनो प्रवेश नथी, ए तो जुदा पर छे; माटे जाणवानी क्रिया ज ज्ञान वडे, आत्मा वडे जणाय छे. दयाना परिणाम थाय तेने जाणनारी क्रिया आत्मानी छे ने ते एनुं ज्ञेय छे, पण दयाना परिणाम परमार्थे आत्माना नथी, ने परमार्थे ते आत्मानुं ज्ञेय नथी.