Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 272.

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२प२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११

हवे कोईने थाय के आ ते वळी केवो धर्म? भूख्याने भोजन आपवुं, तरस्याने पाणी आपवुं, नागाने कपडां देवां, ने मांदानी मावजत करवी-एवी कोई वात तो समजाय. अरे भाई! ए तो बधी रागनी क्रिया बापु! ते काळे जडनी क्रिया तो जडमां थवायोग्य थई, ते क्रिया तारी नहि, ने रागनी क्रिया पण तारी नथी. अरे, ते काळे रागनुं ज्ञान थयुं ते ज्ञान रागनुं नथी, राग तेमां पेठो नथी, जाणवानी क्रिया तारा अस्तित्वमां थई छे ते तारी छे, अने ते खरेखर तारुं ज्ञेय छे, रागादि परमार्थे तारां ज्ञेय नथी. समजाय छे कांई...?

अज्ञानी जीवोने आटलुं बधुं (दया, दान आदिने) ओळंगीने अहीं (ज्ञानभावमां) आववुं मोटो मेरु पर्वत उपाडवा जेवुं लागे छे. पण आमां तारुं हित छे भाई!

हवे कहे छे-‘आ रीते पोते ज पोताथी जणावायोग्य होवाथी ज्ञानमात्र भाव ज ज्ञेयरूप छे. वळी पोते ज पोतानो जाणनार होवाथी ज्ञानमात्र भाव ज ज्ञाता छे. आ प्रमाणे ज्ञानमात्र भाव ज्ञान, ज्ञेय अने ज्ञाता-ए त्रणे भावोयुक्त सामान्यविशेषस्वरूप वस्तु छे.’

जुओ, आ बधानो सरवाळो कर्यो. जणाववायोग्य पर पदार्थो परमां रह्या छे, अने जाणनारो जाणनारमां रहेल छे. जाणनार पोते ज्ञानरूप थयो थको पोताने जाणे छे. आम आत्मा पोते ज जणावायोग्य छे; ज्ञानमात्र भाव ज पोतानुं ज्ञेय छे. पर पदार्थने ज्ञेय कहेवो ए व्यवहार छे बस.

वळी पोते ज पोतानो जाणनार होवाथी ज्ञानमात्र भाव ज ज्ञाता छे. अहाहा...! परनी साथे परमार्थे आत्माने कोई संबंध नथी. जे जणाय ते पण पोतानी दशा, जाणनारो पण पोते अने ज्ञान पण पोते ज, अहाहा...! ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय त्रणेय एकरूप. अंतरमां द्रष्टि मूकतां आवा त्रण भेद आत्माना छे एम रहेतुं नथी. पर वस्तु ज्ञेय ने पोते ज्ञाता ए तो कयांय रही गयुं. पोते ज ज्ञेय, पोते ज ज्ञान, ने पोते ज ज्ञाता-एवा त्रण भेद पण अंतर्द्रष्टिमां समाता नथी, बधुं अभेद एकरूप अनुभवाय छे. ल्यो, आनुं नाम धर्म छे; जेमां सामान्यविशेषनुं अभेदपणुं प्राप्त-सिद्ध थयुं ते धर्म छे.

अहाहा...! ‘आवो ज्ञानमात्र भाव हुं छुं’ एम अनुभव करनार पुरुष अनुभवे छे. ज्ञाता पण हुं, ज्ञान पण हुं, ने ज्ञेय पण हुं-एम त्रणेय एक हुं-आवो जे ज्ञानमात्र भाव ते हुं छुं एम अनुभव करनार पुरुष पोताने अनुभवे छे. आवो अनुभव थवो ते धर्म छे. ‘अनुभव’-अनु नाम अनुसरीने, भव नाम भवन थवुं; आत्माने- ज्ञानमात्र वस्तुने-अनुसरीने थवुं ते अनुभव छे ने ते धर्म छे. आ सिवाय रागने अनुसरीने थवारूप जे अनेक क्रियाओ छे ए बधो संसार छे, ए बधुं रणमां पोक मूकवा जेवुं छे.

अहाहा...! अनुभव करनार पुरुष एम अनुभवे छे के जाणनारे य हुं, ज्ञानेय हुं, ने जणावायोग्य ज्ञेय पण हुं ज छुं. आ त्रणेना अभेदनी द्रष्टि थतां एने स्वानुभव प्रगट थयो छे, ने तेमां एने अतीन्द्रिय आनंदना स्वादनुं वेदन प्रगट थयुं होय छे. आने समकित अने धर्म कहे छे. समजाणुं कांई...?

जुओ, अहीं सामान्य-विशेष बेय भेगुं लीधुं छे, केमके प्रमाणज्ञान कराववुं छे. प्रमाणज्ञानमां वस्तु त्रिकाळी सत्, एनी शक्तिओ त्रिकाळी सत् अने एनी वर्तमान पर्याय ए त्रणे थईने वस्तु आत्मा कह्यो छे. एमां शरीर, मन, वाणी, कर्म, ने विकार इत्यादि न आवे.

* * *
कळश – २७२

आत्मा मेचक, अमेचक इत्यादि अनेक प्रकारे देखाय छे तोपण यथार्थ ज्ञानी निर्मळ ज्ञानने भूलतो नथी– एवा अर्थनुं काव्य हवे कहे छेः–

(पृथ्वी)
क्वचिल्लसति मेचकं क्वचिन्मेचकामेचकं
क्वचित्पुनरमेचकं सहजमेव तत्त्वं मम।
तथापि न विमोहयत्यमलमेधसां तन्मनः
परस्परसुसंहतप्रकटशक्तिचक्रं
स्फुरत्।। २७२।।