मेचकं लसति] कोई वार तो ते (आत्मतत्त्व) मेचक (–अनेकाकार, अशुद्ध) देखाय छे, [क्वचित् मेचक–अमेचकं] कोई वार मेचक–अमेचक (बन्नेरूप) देखाय छे [पुनः क्वचित् अमेचकं] अने वळी कोई वार अमेचक (–एकाकार, शुद्ध) देखाय छे; [तथापि] तोपण [परस्पर–सुसंहत–प्रकट–शक्ति–चक्रं स्फुरत् तत्] परस्पर सुसंहत (– सुमिलित, सुग्रथित, सारी रीते गूंथायेली) प्रगट शक्तिओना समूहरूपे स्फुरायमान ते आत्मतत्त्व [अलम–मेधसां मनः] निर्मळ बुद्धिवाळाओना मनने [न विमोहयति] विमोहित करतुं नथी (–भ्रमित करतुं नथी, मूंझवतुं नथी).
अनुभवाय छे, कोई अवस्थामां शुद्ध एकाकार अनुभवाय छे अने कोई अवस्थामां शुद्धाशुद्ध अनुभवाय छे; तोपण यथार्थ ज्ञानी स्याद्वादना बळथी भ्रमित थतो नथी, जेवुं छे तेवुं ज माने छे, ज्ञानमात्रथी च्युत थतो नथी. २७२.
कोई वार तो ते (आत्मतत्त्व) मेचक (-अनेकाकार, अशुद्ध) देखाय छे, ‘क्वचित् मेचक–अमेचकं’ कोई वार मेचक- अमेचक (बन्नेरूप) देखाय छे ‘पुनः क्वचित् अमेचकं’ अने वळी कोई वार अमेचक (-एकाकार, शुद्ध) देखाय छे...
अहाहा...! शुद्ध चिदानंदघन एक चिन्मात्र वस्तु हुं आत्मा छुं एवी जेने अंतर्द्रष्टि थई छे ते सम्यग्ज्ञानी छे. अहा! ते सम्यग्ज्ञानी पोताना तत्त्वने केवुं जाणे छे तेनी आ सरस वात छे. कहे छे-कोई वार मेचक अर्थात् पर्यायमां अशुद्धता-मलिनता-दुःख छे एम ज्ञानी जाणे छे. मलिनता-दुःख परना-निमित्तना कारणे छे एम नहि, पण पोतानुं ज (पोताथी) एवुं परिणमन छे एम ज्ञानी जाणे छे. प्रवचनसार, ४७ नयना अधिकारमां कर्ता अने भोक्ता नयनी वात लीधी छे. त्यां कह्युं छे के-ज्ञानीनी पर्यायमां पोतानी कमजोरीथी रागनुं परिणमन छे, राग करवा लायक छे एम नहि, छतां तेने रागनुं परिणमन छे ते अपेक्षाए रागनो कर्ता-भोक्ता हुं छुं एम ज्ञानी यथार्थ जाणे छे. द्रष्टि रागने स्वीकारती नथी, केमके द्रष्टिनो विषय एक अभेद चिन्मात्र आत्मा छे, पण साथे सम्यग्ज्ञान जे वर्ते छे ते एम जाणे छे के मारी दशामां मेचकपणुं-रागादिभावरूप मलिनता छे. ज्ञान स्वपरप्रकाशक छे ने? तो स्वनी साथे पर्यायमां जे राग छे तेने ते जाणे छे. गणधरादि क्षायिक समकिती होय ते पण आवुं जाणे छे. समजाय छे कांई...?
जुओ, आचार्य अमृतचंद्र देवे आ समयसार शास्त्रनी ‘आत्मख्याति’ नामनी संस्कृतमां टीका लखी. महान टीका छे. अन्यमां तो शुं जैनमां पण आवी टीका बीजे नथी. तेओ छठ्ठे-सातमे गुणस्थाने प्रचुर आनंदना झुले झुलता संत-मुनिवर हता. तेओ त्रीजा कळशमां पोतानी स्थिति बतावतां कहे छेः
द्रव्यद्रष्टिथी (हुं) शुद्ध चैतन्यमात्र मूर्ति छुं, तोपण मारी परिणति रागादि परिणामोनी व्याप्ति छे तेनाथी निरंतर कल्माषित (मेली) छे. कहे छे-मारी द्रष्टि निरंतर चिन्मात्र द्रव्य-वस्तु उपर होवा छतां पर्यायमां मलिनता छे एम मारुं ज्ञान जाणे छे. ज्यां सुधी रागनी-कर्मनी पूर्ण निवृत्ति न थाय त्यां सुधी ज्ञानीने ज्ञानधारा अने कर्मधारा-बन्ने एक साथे चाले छे. जेटलो राग छे एटली कर्मधारा छे, ने ते छे एम ज्ञानी यथार्थ जाणे छे.
तो समकितीने आस्रव-मलिनता नथी, ते निरास्रव छे-एम शास्त्रमां आवे छे ने? हा, आवे छे. ते द्रष्टि अपेक्षाए वात छे. वळी तेने अनंतानुबंधी कषाय नथी एम सूचववा माटेनी वात छे. समयसार गाथा ७प, कर्ताकर्म अधिकारमां लीधुं छे के-शुद्ध चैतन्यमूर्ति आत्मानी द्रष्टि थई छे तेने आत्मा व्यापक थई शुद्ध पर्यायनो विस्तार करे छे, अर्थात् शुद्ध पर्याय तेनुं व्याप्य छे, अशुद्ध पर्याय तेनुं व्याप्य कर्म नथी. आ द्रष्टि अपेक्षाए वात छे. बाकी ज्ञानीने द्रष्टि साथे जे ज्ञान वर्ते छे ते यथास्थित जाणे छे के पर्यायमां किंचित् कलुषितता- मलिनता छे.
एक बाजु एम कहे के चोथा गुणस्थानथी शुद्धत्व परिणमन छे, अने बीजी बाजुथी एम कहे के छठ्ठे गुणस्थाने पण मलिनता छे-आ केवुं?
भाई, ज्यां जे अपेक्षा होय ते बराबर जाणवी जोईए. एकांत ताणवुं न जोईए. यथाख्यात चारित्र न होय