Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२प४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ त्यां सुधी राग होय छे. द्रष्टि तेने स्वीकारती नथी, पण ज्ञान तेने यथास्थित जेम छे तेम जाणे छे. अहा! आ वीतराग सर्वज्ञ प्रणीत मार्ग युक्ति वडे जेम छे तेम जाणवो जोईए.

हवे कहे छे-‘कोई वार मेचक-अमेचक (बन्नेरूप) देखाय छे.’ अहाहा...! सम्यग्ज्ञानीने चारित्रगुणनी एक ज समयनी पर्यायना बे भाग-अंशे निर्मळता ने अंशे मलिनता बन्ने-देखाय छे. मोक्षमार्गनी निर्मळ रत्नत्रयनी पर्याय प्रगट थई ते, तथा साथे सहचर एवो जे राग बाकी छे ते-बन्ने देखाय छे. एक समयमां बे धारा छे ने? ज्ञानीने जेम शुद्धतानुं ज्ञान छे तेम ते समये जे अशुद्धता-मलिनता छे ए पण जाणवामां आवे छे. बहारमां विकल्प छे त्यारे (उपयोग स्वथी खसी पर तरफ गयो छे त्यारे) निर्मळ पर्याय-निर्मळतारूप दशा पण जाणवामां आवे छे, ने मलिनता पण जाणवामां आवे छे; एक समयमां बन्ने जाणवामां आवे छे.

हवे कहे छे-‘वळी कोई वार अमेचक (-एकाकार, शुद्ध) देखाय छे.’ निर्विकल्प अनुभवमां, शुद्धोपयोगनी दशामां एकलो आनंद अने शुद्धता ज छे. ते काळे राग देखातो नथी. निर्विकल्प उपयोगना काळे अबुद्धिपूर्वकनो राग छे, पण ए ख्यालमां आवतो नथी. निर्विकल्प उपयोगमां शुद्धतानुं ज वेदन छे, ते काळे अबुद्धिपूर्वकना रागने उपयोग जाणी शकतो नथी.

आम त्रण प्रकार देखाय छे. हवे कहे छे-

‘तथापि’ तोपण ‘परस्पर–सुसंहत–प्रकट–शक्ति–चक्रं स्फुरत् तत्’ परस्पर सुसंहत (-सुमिलित, सुग्रथित, सारी रीते गूंथायेली) प्रगट शक्तिओना समूहरूपे स्फुरायमान ते आत्मतत्त्व ‘अमल–मेधसां मनः’ निर्मळ बुद्धिवाळाओना मनने ‘न विमोहयति’ विमोहित करतुं नथी (-भ्रमित करतुं नथी, मुंझवतुं नथी).

अहाहा...! शुं कहे छे? के निर्मळ पर्याय ने मलिन पर्याय-सुसंहत अर्थात् सारी रीते गूंथायेली छे. ठेठ चौदमे गुणस्थाने पण असिद्धत्व भाव कह्यो छे ने! ते असिद्धत्व भाव संसार छे. तत्त्वार्थसूत्रमां उदयभावना एकवीस बोलमां असिद्धत्वभाव कहेलो छे. चौदमे गुणस्थाने निमित्तरूपे चार कर्मो विद्यमान छे तेटली मलिनता- असिद्धत्वरूप मलिनता पोताना कारणे होय छे. नीचे समकितीनी पर्यायमां पण जेटली स्वभावनी द्रष्टि अने स्थिरता थई एटली निर्मळता, तथा जेटलो राग छे एटली मलिनता-ए बेनुं संगठन छे, ए बे सुग्रथित छे, सारी रीते गूंथायेलां छे. साधक जीवने साधकभाव साथे बाधकता छे ज, न होय तो सर्वज्ञपणुं होय. आ बन्ने भाव- निर्मळता ने मलिनता-प्रगट छे. अहाहा...! भाषा शुं छे जुओ! ‘प्रगट शक्तिओना समूहरूपे स्फुरायमान’-एटले के निर्मळ पर्यायनी शक्ति-योग्यता, अने मलिनतानी योग्यता-बन्ने एक साथे प्रगटरूपे मळेली छे. अहीं शक्तिरूपे भगवान पूर्ण छे एनी वात नथी. अहीं पर्यायनी योग्यतानी वात छे. निज पूर्णानंद स्वभावनुं अवलंबन लेतां स्वद्रव्यना आश्रये जे निर्मळ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगट थयुं ते, अने तेनी साथे धर्मीने जे पंचमहाव्रतादिनो विकल्प वर्ते छे ते-ए बन्ने एक समयमां सुग्रथित समूहरूपे स्फुरायमान छे. एक समयनी दशामां आ बन्ने भावो प्रगटरूप छे. अहा! गजब वात करी छे! शुं कळश छे! पर्याय-पर्यायनी संभाळ लीधी छे.

अहा! जेनी बुद्धि निर्मळ थई गई छे एवा सम्यग्द्रष्टि जीवने आत्मतत्त्वनी आवी विचित्रता-निर्मळता ने मलिनता बन्ने साथे देखावा छतां तेना मनने विमोहित करती नथी, मुंझवती नथी; अर्थात् धर्मी जीव मिथ्याभावने प्राप्त थतो नथी. अहाहा...! धर्मीने एक साथे सुखनुं वेदन, अने अशुद्धतानुं-दुःखनुं वेदन होय तोपण ते मुंझातो नथी, मार्गथी चलित थतो नथी. एक पर्यायमां जेटलो मोक्षमार्ग प्रगट थयो एटलो आनंदनो भाग, अने जेटलो राग छे एटलो दुःखनो भाग-ए बेय वस्तुस्थिति छे एम धर्मी बराबर जाणे छे. हुं (स्वभावे) निर्मळ छुं, छतां आ राग केम? आ शुं? -एम धर्मीने भ्रमणा थती नथी. आवी वात छे.

* कळश २७२ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

जुओ, हिंसा, जूठ, चोरी, कुशील इत्यादि पापभाव छे, ने दया, दान, व्रत, तप, भक्ति-पूजाना विकल्प ते पुण्यभाव छे; आ बन्ने भाव बंधनुं कारण छे. ए बन्नेथी भिन्न पडी, निज नित्य निरंजन चिन्मात्र वस्तुनी द्रष्टि करतां पर्यायमां