आनंदना अनुभव सहित समकित प्रगट थाय छे. आ धर्म छे. अहाहा...! आम जेने अंतरमां धर्म प्रगटयो छे एवा समकिती ज्ञानीने पोतानुं आत्मतत्त्व केवुं देखाय छे एनी आ वात छे. तो कहे छे-
‘आत्मतत्त्व अनेक शक्तिओवाळुं होवाथी कोई अवस्थामां कर्मना उदयना निमित्तथी अनेकाकार अनुभवाय छे, कोई अवस्थामां शुद्ध एकाकार अनुभवाय छे अने कोई अवस्थामां शुद्धाशुद्ध अनुभवाय छे...’
जुओ, आत्मा शुद्ध चिदानंदघन प्रभु-एनी निर्मळ प्रतीति अने अनुभव थवा छतां धर्मीने पर्यायमां विकारनुं वेदन-आस्वाद होय छे. धर्मीने शुद्धोपयोगमां आनंद अने शांतिनुं वेदन होय छे. छतां पुरुषार्थनी कमजोरीथी जेटलुं लक्ष पर उपर जाय छे तेटलो ज्ञानीने दुःखनो आस्वाद-वेदन होय छे; जोके कर्मनो उदय तो निमित्तमात्र छे, परंतु पोतानी पर्यायमां जे नैमित्तिक विकार प्रगट थाय छे एनुं वेदन धर्मीने छे, अने तेनुं ज्ञान एने यथास्थित जाणे पण छे. शरीर, वाणी इत्यादि जडनुं वेदन तो (ज्ञानी के अज्ञानी) कोईने होतुं नथी. परंतु ज्ञानीने, जेटली अंतर-स्वभावमां एकाग्रता छे एटलो आनंद छे तोपण, जेटलो राग विद्यमान छे तेटलुं तेने दुःखनुं आस्वादन-वेदन अवश्य छे.
वळी, कहे छे, कोई अवस्थामां शुद्ध एकाकार अनुभवाय छे. अहाहा...! धर्मी जीवने पोताना अंतरमां उपयोग लागे छे, शुद्धोपयोगनी दशा होय छे त्यारे एकाकार शुद्धनो-पवित्रतानो ज अनुभव होय छे.
अने वळी कोई अवस्थामां शुद्धाशुद्ध अनुभवाय छे. एटले शुं? के पोतानी चिन्मात्र वस्तुना आश्रये जेटली निर्मळ आनंदनी परिणति प्रगट छे तेने धर्मी जाणे छे अने साथे जेटलो राग-मलिनभाव छे तेने पण ज्ञानी जाणे छे. धर्मीने शुद्धतानी साथे किंचित् रागनुं वेदन होय छे तेमां विरोध नथी. बे छे तो विरुद्धभाव पण साथे रही शके छे. धर्मीने जेटली वीतरागता थई तेटलुं शुद्धतानुं-आनंदनुं वेदन छे, ने साथे जेटलो राग छे तेटलुं दुःखनुं पण वेदन छे. आम एक साथे आनंद अने दुःखना वेदनमां विरोध नथी, छे तो बन्ने परस्पर विरुद्ध, पण बन्ने साथे रहे छे एवी ज साधकदशा होय छे. बन्नेने ज्ञानी एक साथे जाणे छे.
जुओ, तीर्थंकरने जन्मथी ज क्षायिक समकित होय छे. आठ वर्षनी उंमरे स्वभावना विशेष आलंबनपूर्वक पांचमा गुणस्थानने प्राप्त थई अणुव्रत धारण करे छे. तेमां कोई तीर्थंकर चक्रवर्ती पण होय तो तेने छन्नु हजार राणीओ अने ते संबंधी भोग पण होय छे. भोगमां सुखबुद्धि नथी तथापि भोगनी आसक्तिना परिणाम होय छे. आ आसक्तिना वेदनने ते दुःखरूप जाणे छे. अने जेटली शुद्धता प्रगट वर्ते छे तेटलुं शांतिनुं वेदन आवे छे तेने सुखरूप जाणे छे-बन्नेने ते एक साथे जाणे छे. छठ्ठे गुणस्थाने भावलिंगी मुनिवरने शुभभाव होय छे तेने ते दुःखरूप जाणे छे, अने आत्माना आश्रये जेटली निर्मळता प्रगटी छे तेटलुं तेने आनंदनुं वेदन होय छे. साधक धर्मी आ बन्नेने एक साथे जाणे छे. आवी साधकदशा होय छे. जुओ, -
-मिथ्याद्रष्टिने एकांत अशुद्धतानुं-दुःखनुं वेदन होय छे. -भगवान केवळीने एकांत शुद्धतानुं-आनंदनुं वेदन होय छे. अने -साधकने अंशे आनंद अने अंशे दुःख-एम बन्नेनुं एक साथे वेदन होय छे. अहाहा...! प्रभु! तारी विचित्रता तो देख! अनेक प्रकारनी योग्यता पैकी एक विकारपणे परिणमवानी योग्यता पण छे. समकितीने जे राग उत्पन्न थाय छे ते पर्यायनी योग्यता-शक्तिथी थाय छे, अने तेनो ज्ञानी कर्ता अने भोक्ता पण छे. (परिणमननी अपेक्षा कर्ता-भोक्ता कह्यो छे, धर्मी रागनो स्वामी छे एम नहि). प्रवचनसार, ४७ नयना अधिकारमां कह्युं छे के-ज्ञानीने पण जेटलो राग थाय छे एनो आधार-अधिष्ठाता आत्मा छे. परंतु ज्यां प्रयोजन द्रव्यद्रष्टि कराववानुं होय त्यां रागनो आधार आत्मा नथी एम कहेवामां आवे छे. आवो भगवान केवळीनो कहेलो मारग अपूर्व अने सूक्ष्म छे. भाई! तेने एक वार तारा ज्ञान-श्रद्धानमां तो ले; तुं न्याल थई जईश.
हवे कहे छे-आवुं विचित्र आत्मतत्त्व छे ‘तोपण यथार्थ ज्ञानी स्याद्वादना बळथी भ्रमित थतो नथी, जेवुं छे तेवुं ज माने छे, ज्ञानमात्रथी च्युत थतो नथी.’ अहा! पर्यायमां रौद्रध्यानना परिणाम होय तोपण स्याद्वादना बळथी धर्मी भ्रमित थतो नथी; मार्गथी चलित थतो नथी. पंचम गुणस्थान सुधी रौद्रध्यान होय छे. तो रौद्रध्यान थतां अरे! आ शुं? चिन्मात्र एवा मने रौद्रध्यान! -एम चलित थतो नथी. (बलके वैराग्य पामे छे).
जुओ, जेना पेटमां ते ज भवे मोक्षगामी एवा लव अने कुशना जीवो हता एवां सीताजी माटे रामचंद्रजीए