Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 273.

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२प६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ सारथीने हुकम कर्यो के-सीताजीने ज्यां सिंह ने वाघ होय एवा जंगलमां लई जाओ, अने त्यां छोडी दो. अररर! आवा परिणाम! सारथी पण स्तब्ध थई गयो, पण शुं करे? एक बाजु नोकरी ने बीजी बाजु रामचंद्रनो हुकम. सारथीए सीताजीने जंगलमां छोडयां तो प्रथम एकदम आघात थयो, एम के आ शुं? आंखमांथी आंसुनी धारा वहेवा लागी. थोडी वारमां शांत थया पछी सीताजीए सारथीने कह्युं के-“रामचंद्रजीने कहेजो के हुं धर्मात्मा छुं एम जाणवा छतां लोकापवादथी तमे मने तजी तो भले, पण लोकापवादथी धर्म मा छोडशो; समकित ने आत्मशांतिनी दशाने मा छोडशो.” जुओ, ए वखते पण आ अवाज! पर्यायमां राग छे, आर्त परिणाम छे एनुं भान छे, अने स्वभावथी हुं राग रहित छुं एनुं पण भान छे. आम धर्मी समकिती पुरुष भ्रमित थतो नथी, परंतु जेम छे तेम माने छे.

जुओ, रामचंद्रजी पण पुरुषोत्तम समकिती हता. एमने पण (पर्यायमां) शुद्धता अने रौद्रता-बे भाव एक साथे होवा छतां पोताना स्वभावथी च्युत थया नहि. आ रीते स्याद्वादना बळथी धर्मी स्वभावथी च्युत थता नथी. आवी वात! समजाणुं कांई...?

कळश–२७३

आत्मानो अनेकांतस्वरूप (–अनेक धर्मस्वरूप) वैभव अद्भुत (आश्चर्यकारक) छे–एवा अर्थनुं काव्य हवे कहे छेः–

(पृथ्वी)
इतो गतमनेकतां दधदितः सदाप्येकता–
मितः क्षणविभङ्गुरं ध्रुवमितः सदैवोदयात्।
इतः परमविस्तृतं धृतमितः प्रदेशैर्निजै–
रहो
सहजमात्मनस्तदिदमद्भुतं वैभवम् ।। २७३।।

श्लोकार्थः– [अहो आत्मनः तद् इदम् सहजम् अद्भुतं वैभवम्] अहो! आत्मानो ते आ सहज अद्भुत वैभव छे के–[इतः अनेकतां गतम्] एक तरफथी जोतां ते अनेकताने पामेलो छे अने [इतः सदा अपि एकताम् दधत्] एक तरफथी जोतां सदाय एकताने धारण करे छे, [ इतः क्षणः विभङ्गुरम्] एक तरफथी जोतां क्षणभंगुर छे अने [इतः सदा एव उदयात् ध्रुवम्] एक तरफथी जोतां सदाय तेनो उदय होवाथी ध्रुव छे, [इतः परम– विस्तृतम्] एक तरफथी जोतां परम विस्तृत छे अने [इतः निजैः प्रदेशैः धृतम्] एक तरफथी जोतां पोताना प्रदेशोथी ज धारण करी रखायेलो छे.

भावार्थः– पर्यायद्रष्टिथी जोतां आत्मा अनेकरूप देखाय छे अने द्रव्यद्रष्टिथी जोतां एकरूप देेखाय छे; क्रमभावी पर्यायद्रष्टिथी जोतां क्षणभंगुर देखाय छे अने सहभावी गुणद्रष्टिथी जोतां ध्रुव देखाय छे; ज्ञाननी अपेक्षावाळी सर्वगत द्रष्टिथी जोतां परम विस्तारने पामेलो देखाय छे अने प्रदेशोनी अपेक्षावाळी द्रष्टिथी जोतां पोताना प्रदेशोमां ज व्यापेलो देखाय छे. आवो द्रव्यपर्यायात्मक अनंतधर्मवाळो वस्तुनो स्वभाव छे. ते (स्वभाव) अज्ञानीओना ज्ञानमां आश्चर्य उपजावे छे के आ तो असंभवित जेवी वात छे! ज्ञानीओने जोके वस्तुस्वभावमां आश्चर्य नथी तोपण तेमने पूर्वे कदी नहोतो थयो एवो अद्भुत परम आनंद थाय छे, अने तेथी आश्चर्य पण थाय छे. २७३.