परमात्मपुराणमां दर्शन अने ज्ञान-ए बेने अद्भुतरसमां लीधा छे. त्यां कह्युं छे के आत्मानी एक समयनी दर्शन अने ज्ञान ए बे पर्यायमांथी एक दर्शननी-दर्शनोपयोगनी-पर्याय लोकालोकने अर्थात् आखा पूर्ण सत्ने ‘ते बधुं अभेद छे’ एम देखे छे. तेमां ‘आ जीव छे ने आ अजीव छे’ एवो भेद पण नथी. अरे, ‘आ छे’ एवो भेद पण तेमां नथी. ज्यारे बीजो एक समयनो ज्ञानपर्याय बधाने भिन्न-भिन्न करीने भेदथी जाणे छे. द्रव्यभेद, गुणभेद, पर्यायभेद अने एक-एक पर्यायमां पण अनंत भेद वगेरे बधाने भिन्न-भिन्न करीने ज्ञान जाणे छे. आ रीते, जे समये दर्शननो पर्याय बधाने भिन्न कर्या विना देखे छे ते ज समये ज्ञाननो पर्याय बधाने भिन्न-भिन्न करीने जाणे छे. अने आ आत्मानो अद्भुत रस छे. ज्यारे अहींया आत्मामां केवो अद्भुत वैभव छे ते कहेवुं छे. तो, कहे छे के,
‘अहो आत्मनः तद् इदम् सहजम् अद्भूतं वैभवम् अहो! आत्मानो ते आ सहज अद्भुत वैभव छे के- इतः अनेकतां गतम् एक तरफथी जोतां ते अनेकताने पामेलो छे.’ पर्यायथी जोतां आत्मा अनेकपणे देखाय छे अने ते एवो छे पण खरो. ल्यो, आ पण आत्मानो एक स्वाभाविक अद्भुत वैभव छे एम कहे छे.
‘इतः सदा अपि एकताम् दधत् एक तरफथी जोतां सदाय एकताने धारण करे छे.’ वस्तुद्रष्टिथी-द्रव्यद्रष्टिथी जोतां आत्मा एकरूप छे. अने आ पण आत्मानो एक सहज अद्भुत वैभव छे.
प्रश्नः– जगत तो आ बहारना पैसादिने वैभव कहे छे ने? समाधानः– भाई! ए तो धूडनो वैभव छे. ते कयां आत्मामां हतो? ते एकेएक (दरेक) परमाणु तो तेनामां-जडमां छे. तेथी ते पैसादि आत्मानो वैभव छे एम कयांथी आव्युं?
अहीं तो आत्मानो वैभव एने कहे छे के एक बाजुथी-पर्यायद्रष्टिथी-अनेकने जोवानी द्रष्टिथी-जोईए तो पर्यायमां अनेकता देखाय छे अर्थात् अनंत पर्यायो देखाय छे. केमके अनंत गुणोनी अनंत पर्यायो छे. अने एक बाजुथी-द्रव्यद्रष्टिथी-वस्तुद्रष्टिथी-जोतां आत्मा एकरूप देखाय छे. जुओ, आ अनेकता पर्यायमां छे अने एकता द्रव्यमां छे एम कह्युं छे. तथा आत्मा सदाय एकताम् दधत्–एकताने धारण करे छे, धारी राखे छे एम पण कह्युं छे.
‘इतः क्षण–विभङगुरम् एक तरफथी जोतां क्षणभंगुर छे.’ एटले? के क्रमे-क्रमे थती दशानी द्रष्टिथी जोईए तो आत्मा क्षणभंगुर देखाय छे.
राजकोटमां एक वेदांती बावो हतो. तेणे एक वार एवुं सांभळ्युं के जैनना एक साधु (पू. श्री कानजीस्वामी) अध्यात्मनी बहु ऊंची वात करे छे. तेने तेथी थयुं के लाव सांभळवा जाउं. ते सांभळवा आव्यो. प्रवचनमां त्यारे एवुं आव्युं के पर्यायनो नाश थाय छे माटे आत्मा पर्यायथी अनित्य छे. ते बावाने थयुं के शुं आत्मा अनित्य होय? आवो (अनित्य) आत्मा न होय, ए तो नित्य होय. अविनाशी आत्मा होय ते बराबर आत्मा छे. तेथी, ‘मारे आवुं सांभळवुं नथी’ -एम कहीने ते चाल्यो गयो. पण भाई! पर्यायथी आत्मा नाशवान छे अने वस्तुथी अविनाशी छे. अने आ तो वस्तुनुं स्वरूप छे.
परंतु आ तो जैननुं छे? भाई! जैननुं एटले के वस्तुनुं आवुं स्वरूप छे. परंतु, जो वस्तुमां अनित्यपणुं न ज होय तो, कार्य तो अनित्यपणामां थाय छे? आ द्रव्य ध्रुव छे, शुद्ध छे एवुं (निर्णयरूपी) कार्य तो पर्यायमां थाय छे? प्रथम पर्यायमां साचुं मान्युं नहोतुं अने हवे तेने फेरवीने (टाळीने) साचुं मान्युं तो ते पर्यायमां मनायुं छे. अर्थात् अनित्य नित्यनो निर्णय करे छे. पण कांई नित्य नित्यनो के अनित्यनो निर्णय करतुं नथी. कारण के ए नित्य तो नित्य ज छे. (तेमां फेरफार थतो नथी.)
अहीं कहे छे के एक तरफथी जोतां पोते पोताथी क्षणभंगुर छे, क्षणे-क्षणे नाश थवावाळी चीज छे एम देखाय छे. जुओ, परने लईने आत्मा क्षणभंगुर छे एम नथी कह्युं. तेम ज परवस्तुनी-के जे क्षणभंगुर छे तेनी- पण