Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२प८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ अहींया वात नथी. एटले के पैसा ने शरीरादि क्षणभंगुर छे ए वात अत्यारे नथी. परंतु वस्तुनी (आत्मानी) अवस्था एक समय रहे छे ने बीजे समये तेनो नाश थाय छे तेथी क्रमवर्ती दशाथी जोतां आत्मा ज क्षणभंगुर देखाय छे एम कहेवुं छे.

अहा! पहेलां एम वात करी हती के एक तरफथी-पर्यायद्रष्टिथी जोतां आत्मामां अनेकता देखाय छे अने एक तरफथी-द्रव्यद्रष्टिथी जोतां तेमां एकता देखाय छे. -बस, एटली वात हती. ज्यारे हवे कहे छे के एक तरफथी जोतां क्षणे क्षणे नाशवानपणुं देखाय छे. पर्याय उत्पन्न थईने नाश पामे छे. तेथी ते द्रष्टिथी जोईए तो पर्यायमां- आत्मामां क्षणभंगुरता छे, आत्मानी पर्याय क्षणभंगुर छे. मतलब के पर्याय क्रमसर थाय छे ते अपेक्षाए आत्माने क्षणभंगुर कहेवामां आवे छे. अने आने पोतानो स्वाभाविक वैभव कह्यो छे.

अहा! एक-एक श्लोकमां केटलुं भरी दीधुं छे! पण जो शांतिथी पोताना आत्मा माटे थोडो स्वाध्याय करे तो खबर पडे के अहो! आवी चीज बीजे छे नहीं अने वस्तु आवी ज होय. अरे! आवा निज आत्मा तरफना विचार, मनन, मंथन करे तो तेनो शुभभाव पण बीजी जातनो होय छे. परंतु ते तो बहारमां अटकयो छे.

जुओ, पैसा आदिने लईने आत्मा अनेक छे एम नहीं. परंतु पर्यायमां अनेकपणुं छे तेथी ते अनेक छे. तथा पैसा ने शरीरादि नाशवान छे माटे आत्मा क्षणभंगुर छे एम पण नहीं. परंतु तेनी पर्याय ज नाशवान होवाथी ते क्षणभंगुर छे एम कहे छे. ल्यो, आवी चीज छे.

‘इतः सदा एव उदयात् ध्रुवम् एक तरफथी जोतां सदाय तेनो उदय होवाथी ध्रुव छे.’ जुओ, सदाय ने ध्रुव-ए बे शब्दो एक साथे कह्या छे. तो कहे छे के एक तरफथी जोतां सदाय नाम त्रणे काळ आत्मानो उदय होवाथी ध्रुव छे. एटले के ए तो छे तेवो छे-त्रणे काळ ध्रुव छे... ध्रुव छे... ध्रुव छे. अने तेथी क्षणे क्षणे नाश थवुं ए तेमां नथी. पर्याय क्षणभंगुर छे ने? तेथी तेनी सामे कहे छे के आत्मा त्रिकाळ एकरूप रहेनार छे. ल्यो, आ आत्मानो वैभव बतावाय छे.

अहाहा! एक तरफथी जोतां आत्मा सदाय एक ज प्रकारे-ध्रुवपणे रहे छे. पर्याय बदलती रहे छे पण ध्रुव बदलतुं नथी. अने आवो तेनो स्वभाव छे. अहीं तो प्रमाणज्ञाननो विषय बतावे छे ने! आत्मानुं-पोतानुं अस्तित्व केटलामां छे तेनुं ज्ञान करावे छे ने! तेथी भले पर्याय क्षणभंगुर हो-क्षणे क्षणे नाश पामती हो-तोपण ते छे तो आत्मानो वैभव एम कहे छे. अर्थात् पोतानामां पोताने लईने पर्याय छे पण परने लईने ते छे नहीं. अहा! मूळ चीजने पहोंचवा माटे तो अनेक प्रकारना पुरुषार्थनी उग्र गति जोईए.

अहीं कहे छे के भगवान आत्मा, एक तरफथी जोतां, त्रिकाळ ध्रुव-एकरूप छे. मतलब के ते छे... छे... ने छे. अने एक बाजुथी जोतां ते छे... छे... ने छे एम नहीं पण ते छे ने नाश पामे छे, छे ने नाश पामे छे. एटले के आत्मा द्रव्ये सदा ध्रुव, एकरूप ने सदृश छे. अने पर्याये क्षणभंगुर, विसदृश छे. पर्याय क्षणे क्षणे उत्पन्न थईने जाय, उत्पन्न थईने जाय छे; तेनां सृष्टि ने नाश, सृष्टि ने नाश थाय छे; तेनां जन्म ने मरण, जन्म ने मरण थाय छे. जन्म नाम उपजवुं, सृष्टि थवी, उत्पत्ति थवी. अने मरण नाम नाश थवुं. एक समयनी पर्यायनी उत्पत्ति थवी ते तेनो जन्म छे अने बीजे समये ते क्षणभंगुर पर्यायनो नाश थवो ते तेनुं मरण छे. ल्यो, आ रीते पर्यायमां जन्म-मरण छे. अर्थात् तेना उत्पत्ति ने व्यय; सृष्टि ने नाश; जन्म ने मरण तो पर्यायमां छे. अहा! आत्मतत्त्वना सहज वैभवनुं स्वरूप आवुं छे. अने तेने द्रष्टिपूर्वक ज्ञानमां बराबर लेवुं जोईए.

-आ रीते पर्यायमां (१) अनेकता ने (२) क्षणभंगुरता तथा द्रव्यमां (१) एकता ने (२) ध्रुवता छे एम वर्णव्युं. हवे (त्रीजा बोलमां) क्षेत्रथी वर्णवे छे.

‘इतः परम–विस्तृतम् एक तरफथी जोतां परम विस्तृत छे.’ एक तरफथी जोतां आत्मा एक समयमां लोकालोकने जाणे छे तेथी जाणे के तेटलो व्यापक होय एम देखाय छे. वस्तु आत्मा एक समयमां एक साथे जाणे त्रण काळ ने त्रण लोकमां व्यापी जाय छे एटले के तेनुं ज्ञान सर्वगत थई जाय छे-सर्वने जाणी ले छे तेथी जाणे के ते तेटलो विशाळ छे एम देखाय छे. आत्मा अत्यारे पण आवो छे हो. जो के अहीं तो अत्यारे साधकजीवनी वात छे. तो, साधकजीवनो पण एक समयनो ज्ञानपर्याय लोकालोकने-जेटला अनंत सिद्धो आदि छ द्रव्यो छे ते बधाने- जाणे छे. माटे, एक बाजुथी जुए-जाणे तो एम जणाय के जाणवानी अपेक्षाए आत्मानो क्षेत्रथी तेटलो विस्तार छे. कारण