के ते बधाने जाणे छे ने!
लोकालोकनुं ज्ञान धारी राख्युं छे ते अपेक्षाए तेने विस्तृत कह्यो हतो. अने हवे कहे छे के द्रव्यनी अपेक्षाए जुओ तो आत्माए मात्र पोताना क्षेत्रने धारी राख्युं छे (-पोताना क्षेत्रमां रहेलो छे) परंतु पर वस्तुने धारी नथी, पर वस्तुने पोताना प्रदेशोमां धारण करी नथी. अहा! पर्यायमां परनुं विशाळ ज्ञान छे ते अपेक्षाए आत्माने सर्वगत कहेवामां आवे छे एटले के जाणवानी अपेक्षाए ते सर्वगत छे पण परमां क्षेत्र अपेक्षाए व्यापवा तरीके के पेसी जवा तरीके ते सर्वगत छे एम नथी. कारण के आत्मा लोकालोकने जाणे छे तेथी जाणे के तेटला क्षेत्रमां व्यापेलो छे एम देखावा छतां ते पोताना प्रदेशोमां ज व्यापेलो छे.
तो अहीं कह्युं के एक बाजुथी जुओ तो आत्मा पोताना प्रदेशोमां-स्वक्षेत्रमां ज छे. पण परक्षेत्रमां छे नहीं. जो के एक तरफथी जोतां तेणे पर प्रदेशोने जाणे के पोतानी पर्यायमां धार्या होय एम देखाय छे तोपण वस्तुथी जोतां ते आत्मा स्वक्षेत्रमां-पोताना असंख्य प्रदेशोमां ज छे. पर प्रदेशोने पोतानी पर्यायमां धार्या छे तेनो अर्थ ए छे के स्वयं जाणनारुं ए पर्यायनुं ज्ञान लोकालोकना क्षेत्रमां जाणवानी अपेक्षाए व्यापक थई जाय छे.
जुओ, आ रीते पर्यायना बे बोल कह्या के (१) पर्यायमां अनेकता छे ने (२) पर्याय क्षणभंगुर छे. तथा क्षेत्रना आ रीते बे बोल कह्या के (१) ते सर्वने जाणे छे ए अपेक्षाए सर्वगत छे ने (२) छतां अनादिथी ते पोताना प्रदेशोमां ज छे. अने आवो तेनो सहज अद्भुत वैभव छे. अहा! आवी वात बीजे छे नहीं, होय ज नहीं. ल्यो, आवा अद्भुत कळशो छे! आ पहेलानो २७१मो श्लोक बहु ऊंचो हतो. तेमां कह्युं हतुं के जाणनारो पण पोते, जे जणाय ते ज्ञेय पण पोते अने जे जाणे ते ज्ञान पण पोते. बापु! आवुं छे.
अहा भाई! आ तारो वैभव छे. अने ते पण केवो छे? के पूर्वापर विरोधी जेवो लागवा छतां पण अविरोधी छे. अहा! (१) पर्यायमां अनेकपणुं देखावा छतां वस्तु तरीके ते (आत्मा) एक छे. (२) क्रमे थती पर्याय क्षणभंगुर-नाशवान देखावा छतां वस्तु तरीके ते एकरूप (ध्रुव) छे. (३) एक समयनो जाणवानो पर्याय जाणे के लोकालोकमां व्यापी गयो होय अर्थात् तेणे पोताना प्रदेशोमां जाणे के
(१) आत्मामां एकता साथे अनेकता होय छे. (एक ज समये एकता ने अनेकता होय छे.) (२) आत्मा वस्तु तरीके कायम रहीने अवस्था तरीके क्रमे-क्रमे बदले छे. (३) आत्मा एक साथे (एक ज समये) स्वक्षेत्रमां रहेलो छे एवो देखावा छतां लोकालोकने (जाणवानी अपेक्षाए)
ल्यो, आवो आत्मा छे अने आवो तेनो वैभव छे.
अन्यमां आवे छे के ‘ज्यां लगी आतमा तत्त्व चीन्यो नहीं...’ पण ए ‘आतमा तत्त्व’ एटले आवो आत्मा हो. बाकी आतमा... आतमा एम भाषा तो घणांय करे छे. अहींथी आत्मानी वात बहु नीकळी एटले हवे बीजा घणां पण आतमा... आतमा... एम भाषा लईने वातो करे छे. पण भाई! ‘आत्मा’ शब्द आव्यो एटले शुं थयुं? सर्वज्ञ परमेश्वरे आ आत्मवस्तुने आवी रीते जे जोई छे ते रीते तेनी द्रष्टिमां आवे त्यारे तेणे आत्मा जाण्यो कहेवाय छे. बाकी आतमा... आतमा... करवाथी शुं थाय? (कांई ज फायदो न थाय.)
आ कळशमां द्रव्य-पर्यायनो भेद बताव्यो छे ने! एटले कहे छे के ‘पर्यायद्रष्टिथी जोतां आत्मा अनेकरूप देखाय छे.’ केमके पर्यायो अनेक छे. पर्यायद्रष्टिथी बीजी रीते जोवानुं पछी कहेशे. अर्थात् बीजा बोलमां क्रमभावी पर्यायद्रष्टिथी जोवानुं कहेशे. ज्यारे आ पहेला बोलमां एकली पर्यायद्रष्टिथी जोवानुं कहे छे. एटले के पर्यायद्रष्टिथी जोतां अनंत गुणोनी अनंत अवस्थाओ देखाय छे. -बस, एटली वात कहे छे. तो, अहीं कह्युं के अवस्थाद्रष्टिथी जोतां आत्मा