Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ अनेकरूप-अनंतरूप देखाय छे.

‘अने द्रव्यद्रष्टिथी जोतां एकरूप देखाय छे.’ जुओ, द्रव्यद्रष्टिथी जोवानुं कह्युं छे. अने द्रव्यद्रष्टिनो विषय द्रव्य छे. तो, द्रव्यद्रष्टिथी-वस्तुद्रष्टिथी आत्मद्रव्य-वस्तुने जोतां ते त्रिकाळ एकरूप देखाय छे. पण तेमां अनेकता देखाती नथी.

ल्यो, आ रीते अनेकरूप पण आत्मा छे ने एकरूप पण आत्मा छे. अहा! ते समजणनो पींड छे. तेथी तेना ज्ञानमां आ बधा समजवाना प्रकारो समाय जाय छे. अर्थात् आत्मज्ञान थतां, आत्मामां आवा जे भावो छे ते बधा तेना समजणमां आवी जाय छे. अने त्यारे तेणे आत्माने जाण्यो छे एम कहेवामां आवे छे. अहा! अन्यमतमां तो भगवान... भगवान... करो, भगवाननी धून लगावो एम कहे छे. पण भाई! एवी धून लगाववाथी शुं मळे? (कांई नहीं.) केमके ए तो विकल्प छे. छतां, तेवो विकल्प हो. परंतु तेनी साथे-साथे निर्विकल्प, एक शुद्ध आत्मा छे ते तारी द्रष्टिमां छे के नहीं? (जो छे तो तुं ज्ञानी छो. नहींतर अज्ञानी छो.)

जुओ, अहीं अशुद्धता छे तेटली ज वात करवी छे हो. मतलब के अहीं तो शुद्धता ने अशुद्धता-ए बेनुं आत्मामां होवापणुं छे तेटली बस वात करवी छे. पण अशुद्धता छे माटे शुद्धता प्रगटशे एम कांई अहीं वात कहेवी नथी.

प्रश्नः– सोनगढवाळा तो व्यवहार मानता नथी? समाधानः– व्यवहार छे तेनी कोण ना पाडे छे? जो व्यवहार नथी तो पर्याय पण नथी. केमके पर्याय पोते व्यवहार छे. हा, व्यवहारथी निश्चय थाय छे एम वात नथी. (-एम मानता नथी.)

हवे पर्यायद्रष्टिथी बीजी रीते जोवानी वात करे छेः ‘क्रमभावी पर्यायद्रष्टिथी जोतां क्षणभंगुर देखाय छे.’ आ बोलमां पर्यायद्रष्टिथी आत्मा अनेकरूप देखाय छे एम नहीं पण ते क्षणभंगुर देखाय छे एम कहे छे. अर्थात् क्षणे क्षणे नाश थवुं एवो तेनो स्वभाव छे एम कहे छे.

प्रश्नः– पहेला बोलमां तो ‘पर्यायद्रष्टिथी जोतां’ -एम कही दीधुं छे. तो पछी, हवे आ वळी नवुं शुं कह्युं के ‘क्रमभावी पर्यायद्रष्टिथी जोतां’?

समाधानः– भाई! आ पर्यायद्रष्टिथी बीजी रीते जोवानी वात छे. पहेला बोलमां एम कह्युं हतुं के पर्यायद्रष्टिए अवस्थाने जोईए तो ते अनेक छे. अने हवे बीजा बोलमां एम कहे छे के क्रमे थती अवस्थाद्रष्टिए जोईए तो ते क्षणभंगुर छे.

अहा! हवे आम वात छे त्यां क्षणभंगुर एवा वाणी ने शरीरादि तो कयांय रही गया. स्त्री-पुत्रादिनो संयोग संध्याना रंग जेवो छे, घडीकमां काळां अंधारा थई जशे. अर्थात् ते बधुंय नाशवान छे एम वात आवे छे. परंतु ते वात अहींया नथी. अहींया तो पर्याय नाशवान छे एम कहे छे. पर्याय एक समयने माटे अस्तित्वपणे थईने रहे छे. ने बीजे समये ते जाय छे-नाश पामे छे. (पर्यायनुं अस्तित्व एक समयनुं छे.) अहा! सत्ने सिद्ध करवुं होय तो कोईनो आशरो लेवो पडे नहीं. केमके सत् तो सत् ज छे. तेथी तेना स्थापनमां बधुंय सीधुं सत् ज चाल्युं आवे. ज्यारे खोटुं स्थापन करवुं होय तो अनेक गरबड करवी पडे. जुओने! अहीं केटलुं स्पष्ट कह्युं छे. प्रभु! आ तो वस्तु ज आवी छे भाई!

‘सहभावी गुणद्रष्टिथी जोतां ध्रुव देखाय छे.’ जुओ, पहेला बोलमां पर्यायद्रष्टि ने द्रव्यद्रष्टि लीधी हती. अने हवे आ बीजा बोलमां पर्यायद्रष्टि ने गुणद्रष्टि ले छे. माटे, ते बे बोलमां फेर छे.

शुं कह्युं ते समजाणुं कांई? के पहेला बोलमां पर्यायद्रष्टिथी अनेकपणुं ने द्रव्यद्रष्टिथी एकपणुं देखाय छे एम कह्युं हतुं. ज्यारे हवे बीजा बोलमां पर्यायद्रष्टि लीधी छे खरी पण क्रमे क्रमे थती पर्यायद्रष्टि लीधी छे. तेम ज क्रमभावी पर्यायद्रष्टि ने अक्रमभावी (सहभावी) गुणद्रष्टिथी जोवानी वात आ बीजा बोलमां लीधी छे.

तो, कहे छे के क्रमे-क्रमे थती पर्यायद्रष्टिथी जुओ तो ते क्षणभंगुर छे अने सहभावी गुणद्रष्टिथी जुओ तो ते ध्रुव छे. जुओ, पहेला बोलमां पर्यायद्रष्टिनी सामे द्रव्यद्रष्टिनी वात हती. ज्यारे आ बीजा बोलमां पर्यायद्रष्टिनी सामे गुणद्रष्टिनी वात कही छे. केमके क्रमभावीनी सामे अक्रमभावी (सहभावी) कहेवुं छे ने! तो, अक्रमभावी गुण छे. तथा सहभावी कहेवुं छे तो अनेक पण कहेवा छे ने! तो, द्रव्य एक छे ज्यारे गुण अनंत छे. अने ते गुणो सहभावी-