Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कळश-२७३ः २६१

एक साथे रहे छे. (तेथी, आ बोलमां गुणद्रष्टि लीधी छे.)

अहा! बधी पर्याय एक साथे न होय. एक समये-एक साथे एक समयनी एक ज पर्याय होय छे. अने ते कारणे ते द्रष्टिथी जोतां आत्मा क्षणभंगुर छे. अने गुणो एक साथे ज सदाय होय छे. ते कारणे ते द्रष्टिथी जोतां आत्मा ध्रुव छे. अहा! सूक्ष्म तो छे भाई! केमके आ मारग ज आवो छे. ने परम सत्य ज आवुं छे. तेथी आकरुं लागे के न लागे, तेणे आ रीते जाणवुं जोईशे. संसारना दावानळथी छुटवुं होय तो तेणे आत्मानो आवो स्वभाव छे एम बराबर अंतर अनुभवथी निर्णय लेवो पडशे. (करवो पडशे.)

जुओने, व्हालामां व्हालो एकनो एक दीकरो मरी जाय तो बाप गांडो थई जाय छे. पण ए तो ए समयनो जीवनो पर्याय बदलावानो ज हतो तो बदलाय छे. ते कांई बीजाना कारणे बदलातो नथी. आ शरीरादि तो दूर रह्या परंतु आ तो जीवनी पर्याय बदलाय छे तेनी वात छे. तो कहे छे के आ भवनो पर्याय छूटी बीजा समये बीजा भवनो पर्याय थवानो ज हतो तो थयो छे. अरे! गति तरीके कया आ मनुष्यपणानी पर्याय ने कयां बीजे समये सीधो बीजो भव. अने अज्ञानीना तो ममतामां-बहिर्लक्षी द्रष्टिमां-देह छूटे छे, पर्याय बदलाय छे.

अहीं कहे छे के आ मनुष्यपणानी पर्यायनो नाश थईने बीजे समये बीजी गतिनी पर्याय उत्पन्न थाय एवो तेनी पर्यायनो क्षणभंगुर स्वभाव छे. अने सहभावी गुणद्रष्टिथी जोईए तो ते ध्रुव देखाय छे. सहभावी एटले के बधा गुणो एक साथे होय छे. ज्यारे बधी पर्यायो एक साथे न होय. हा, अनंत गुणनी वर्तमान अनंत पर्यायो एक साथे होय छे. परंतु एक गुणनी एक पर्याय साथे ते ज गुणनी बीजी पर्याय न होय.

‘ज्ञाननी अपेक्षावाळी सर्वगत द्रष्टिथी जोतां परम विस्तारने पामेलो देखाय छे.’ ज्ञाननी अपेक्षाए जुओ तो लोकालोक जाणे के ज्ञाननी पर्यायमां आवी गया होय एम देखाय छे. अर्थात् ते सर्वगत छे, बधुंय जाणे छे. अरे! अलोकनो अंत नथी छतां तेनुं ज्ञानमां भान थई जाय छे एम कहे छे. तो, कह्युं के लोकालोकनो विस्तार ज्ञाननी पर्याय जाणी जाय छे तेथी जाणे के आत्मा तेटलो विस्तृत छे एम देखाय छे. अने आवो ज आत्मानो अद्भुत वैभव छे.

‘प्रदेशोनी अपेक्षावाळी द्रष्टिथी जोतां पोताना प्रदेशोमां ज व्यापेलो देखाय छे’ आत्मा तेम ज तेनी ज्ञानपर्याय पोताना असंख्य प्रदेशोमां ज छे. ते कांई बीजाना प्रदेशोमां के बीजानी पर्यायपणे थईने रह्या नथी.

जुओ, हवे बधानो सरवाळो ले छे के ‘आवो द्रव्यपर्यायात्मक अनंतधर्मवाळो वस्तुनो स्वभाव छे.’ संप्रदायना अमारा गुरुभाई जैनना बेरिस्टर कहेवाता. छतां ते एवुं कहेता के धर्मास्तिकायमां बे ज गुण होय- अरूपी ने गतिहेतुत्व. त्रीजो कोई गुण होय तो लावो, बतावो. माटे तेमां अनंत गुण केवा? पण भाई! बीजां गुणो न कह्या होय तोपण ते द्रव्य छे तो तेमां अनंत गुण होय ज. अने तेथी तो अहींया कहे छे के द्रव्यपर्यायात्मक अनंतधर्मवाळो वस्तुनो स्वभाव छे. द्रव्य एटले वस्तु, पर्याय एटले अवस्था ने आत्मक एटले स्वरूप.

हवे अज्ञानी ने ज्ञानीनी वात करे छेः ‘ते (स्वभाव) अज्ञानीओना ज्ञानमां आश्चर्य उपजावे छे के आ तो असंभवित जेवी वात छे!’ अज्ञानीओना ज्ञानमां आश्चर्य उपजे छे के आ शुं कहे छे?

(१) तेनी ते वस्तु अनेक ने तेनी ते वस्तु एक; (२) तेनी ते वस्तु क्षणभंगुर ने तेनी ते वस्तु ध्रुव; (३) तेनी ते वस्तु सर्वव्यापक ने तेनी ते वस्तु स्वक्षेत्रमां रहे. -आ शुं कहे छे? आ तो असंभवित जेवी वात लागे छे. आवुं संभवे नहीं, अमने कांई आ वात बेसती नथी- एम अज्ञानीओना ज्ञानमां आश्चर्य उपजे छे. पण भाई! तने खबर नथी बापु! के वस्तुनुं स्वरूप ज आवुं छे. अने ते ज योग्य छे.

आ रीते अज्ञानीने एकलुं आश्चर्य थाय छे ज्यारे ‘ज्ञानीओने जोके वस्तुस्वभावमां आश्चर्य नथी’ केमके वस्तुनो स्वभाव ज एवो छे. ‘तोपण तेमने पूर्वे कदी नहोतो थयो एवो अद्भुत परम आनंद थाय छे, अने तेथी आश्चर्य पण थाय छे.’ ज्ञानीने आश्चर्य थाय छे के अहो! आ केवी अद्भुत वस्तु छे.