Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 274.

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 4181 of 4199

 

२६२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११

अहा! आत्मा (१) पर्याय अपेक्षाए अनेक छे ने द्रव्य अपेक्षाए एक छे. (२) पर्याय अपेक्षाए नाशवान छे ने द्रव्य अपेक्षाए नाशवान नहीं पण ध्रुव छे. (३) ज्ञान (जाणवानी) अपेक्षाए तेनो विस्तार जोईए तो जाणे के लोकालोकने गळी गयो होय तेटलो छे. अने बीजी तरफथी क्षेत्र अपेक्षाए जोतां ते पोताना असंख्य प्रदेशोमां ज समायेल छे. -आवो ज वस्तुनो स्वभाव छे तेथी ज्ञानीने आश्चर्य थतुं नथी. अने तोपण तेमने पूर्वे कदी नहोतो थयो एवो अद्भुत परम आनंद थाय छे अर्थात् आवा वस्तुस्वभावने ज्यां जोवा ने तेमां ठरवा जाय छे त्यां तेमने अद्भुत आनंद थाय छे. अने तेथी आश्चर्य पण थाय छे. एटले के ते अद्भुत आनंदने लईने ज्ञानीने आश्चर्य पण थाय छे एम कहे छे.

अहा! अज्ञानीने आवो ते वस्तुस्वभाव होय? -एम आश्चर्य थाय छे. ज्यारे ज्ञानीने आ आनंद कयांथी आव्यो? -एम आश्चर्य ने आनंद-बन्ने थाय छे. अहा! पर्यायमां एकलुं दुःख ने एकली आकुळता हती. कयांय (पर्यायमां) गंधमात्र पण आनंद नहोतो. तेमां आ आनंद कयांथी-कई खाणमांथी-आव्यो? ध्रुवनी खाणमांथी ते आनंद आव्यो छे. आ रीते तेने आनंद पण थाय छे ने आश्चर्य पण थाय छे.

कळश–२७४

फरी आ ज अर्थनुं काव्य कहे छेः–

(पृथ्वी)
कषायकलिरेकत स्खलति शान्तिरस्त्येकतो
भवोपहतिरेकतः स्पृशति मुक्तिरप्येकतः।
जगत्त्रितयमेकतः स्फुरति चिच्चकास्त्येकतः
स्वभावमहिमात्मनो विजयतेऽद्भुतादद्भुतः।। २७४।।

श्लोकार्थः– [एकतःकषाय–कलिः स्खलति] एक तरफथी जोतां कषायोनो कलेश देखाय छे अने [एकतःशान्तिः अस्ति] एक तरफथी जोतां शान्ति (कषायोना अभावरूप शांत भाव) छे; [एकतः भव– उपहतिः] एक तरफथी जोतां भवनी (–संसार संबंधी) पीडा देखाय छे अने [एकतः मुक्तिः अपि स्पृशति] एक तरफथी जोतां (संसारना अभावरूपी) मुक्ति पण स्पर्शे छे; [एकतः त्रितयम् जगत् स्फुरति] एक तरफथी जोतां त्रण लोक स्फुरायमान छे (–प्रकाशे छे, देखाय छे) अने [एकतः चित् चकास्ति] एक तरफथी जोतां केवळ एक चैतन्य ज शोभे छे. [ आत्मनः अद्भुतात् अद्भुतः स्वभाव–महिमा विजयते] (आवो) आत्मानो अद्भुतथी पण अद्भुत स्वभावमहिमा जयवंत वर्ते छे (–कोइथी बाधित थतो नथी).

भावार्थः– अहीं पण २७३ मा काव्यना भावार्थ प्रमाणे जाणवुं. आत्मानो अनेकांतमय स्वभाव सांभळीने अन्यवादीने भारे आश्चर्य थाय छे. तेने आ वातमां विरुद्धता भासे छे. ते आवा अनेकांतमय स्वभावनी वातने पोताना चित्तमां समावी–जीरवी शकतो नथी. जो कदाचित् तेने श्रद्धा थाय तोपण प्रथम अवस्थामां तेने बहु अद्भुतता लागे छे के ‘ अहो आ जिनवचनो महा उपकारी छे, वस्तुना यथार्थ स्वरूपने जणावनारां छे; में अनादि काळ आवा यथार्थ स्वरूपना ज्ञान विना खोयो!’–आम आश्चर्यपूर्वक श्रद्धान करे छे. २७४.

* कळश २७४ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

अहा!जुओ, आ आत्मा एक वस्तु छे. तो साधकपणामां एना द्रव्य-पर्यायनुं वास्तविक स्वरूप धर्मीने केवुं भासे