Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कळश-२७४ः २६३

छे तेनी वात करे छेः

‘एकतः कषाय–कलिः स्खलति’ एक तरफथी जोतां कषायोनो क्लेश देखाय छे अने ‘एकतः शान्तिः

अस्ति’ एक तरफथी जोतां शांति (कषायोना अभावरूप शांत भाव) छे;...

जुओ, पर्यायमां रागादि छे ते कषायोनी भडभडती भठ्ठी छे, क्लेश छे. जो रागादि न होय तो परम अनाकुळ सिद्ध दशा होय. पण पर्यायने जोतां कषायोनी आकुळता ने क्लेश देखाय छे; अने एक तरफथी अर्थात् द्रव्यनी द्रष्टिथी जोतां शांति-कषायोना अभावस्वरूप शांतभाव छे. निज अकषाय स्वभावनी द्रष्टिथी जोतां शांतिनो पिंड प्रभु आत्मा छे एम देखाय छे, तेने देखनारी द्रष्टि पण कषायना अभावरूप शांतभावमय छे. आवुं अद्भुत स्वरूप छे. हवे कहे छे-

‘एकतः भव–उपहतिः’ एक तरफथी जोतां भवनी (-संसार संबंधी) पीडा देखाय छे अने ‘एकतः मुक्तिः अपि स्पृशति’ एक तरफथी जोतां (संसारना अभावरूप) मुक्ति पण स्पर्शे छे;...

जोयुं? पर्यायमां नर-नारकादि गति छे, ते संबंधीना रागथी जीव हणाय छे, पीडाय छे. आम पर्यायथी जुओ तो नर-नारकादि गति संबंधी पीडा देखाय छे, अने एक तरफथी अर्थात् द्रव्यना स्वभावथी जुओ तो द्रव्य तो भवना अभावस्वरूप मुक्त छे एम देखाय छे. कोई कळशमां आवे छे के पर्यायनुं लक्ष छोडी दे तो वस्तु मुक्त ज छे. अहीं ‘मुक्तिने स्पर्शे छे’ एम कह्युं छे ने? मतलब वस्तु जे मुक्तस्वभावी छे तेनो आश्रय लेतां आ मुक्त हुं छुं एम पर्यायमां भासे छे, ल्यो, आवो महा अद्भुत आत्मानो स्वभाव छे.

अहा! आ शरीर उपरथी देखो तो जाणे सुंवाळुं चामडुं होय एवुं देखाय छे. एने ज अंदरना भागथी देखो तो जुदा ज प्रकारे चामडुं देखाय छे. एनी नीचे जुदां जुदां अंगनां हाडकां देखाय छे, अने एमां भरेलो मळ-एने देखो तो जाणे गारो भर्यो होय. आ चारेने जुदा पाडी एक तपेलामां भरी देखो तो लागे के-अररर! आवुं शरीर! देखीने चक्कर आवे, ने उलटी थाय. भाई, आवो आ देह-तेनी स्थिति, संतो कहे छे, दोडती मरण सन्मुख थई रही छे. भाई, जोतजोतामां एनी स्थिति पूरी थई जशे, अने तुं कयांय हाल्यो जईश. आ शरीर ने तारे शुं छे? कांई ज संबंध नथी, ए तो बहारनी चीज छे; एने जोवानुं छोडी दे, ने तारा अस्तित्वमां शुं छे ते जो.

अहा! साधकदशामां धर्मीने एक बाजु भव देखाय छे तो बीजी बाजु मुक्ति देखाय छे. एक बाजु गति देखाय छे तो बीजी बाजु गति विनानो स्वभाव देखाय छे. आवी साधकदशा छे. मुक्तनी-सिद्धनी आ वात नथी.

जुओ, जैनदर्शननुं तत्त्व कहो के वस्तुनुं तत्त्व कहो, ते आवुं अनेकान्तमय छे. भाई, जरा शांति ने धीरजथी विचारे तो समजाय एवुं छे.

वळी कहे छे-‘एकतः त्रितयम् जगत् स्फुरति’ एक तरफथी जोतां त्रण लोक स्फुरायमान छे (-प्रकाशे छे, देखाय छे) अने ‘एकतः चित् चकास्ति’ एक तरफथी जोतां केवळ एक चैतन्य ज शोभे छे.

अहाहा...! जोयुं? कहे छे-एक तरफथी अर्थात् पोतानी ज्ञाननी दशामां भिन्न त्रणकाळ-त्रणलोक-आखुं विश्व जणाय छे, अने एक तरफथी जोतां, अंतर्मुख जोतां केवळ एक चैतन्य ज प्रकाशे छे. पर्यायमां त्रिकाळी द्रव्यने जोतां एक चैतन्य ज एना अस्तित्वमां भासे छे; अहाहा...! चित्... चित्... चित्... चित्चमत्कार ज केवळ भासे छे, जगतनुं अनंतपणुं भासे छे एम नहि. अहाहा...! जाणनारना ज्ञानमां, अर्थात् साधकना ज्ञानमां आम बे प्रकारे तत्त्व भासे छे.

अहा! अहीं एम नथी लीधुं के एक बाजु जुओ तो कर्म, शरीर, बायडी-छोकरां ने महेल-हजीरा देखाय छे अने बीजी बाजु आत्मा देखाय छे; केमके ए कोई तो एना अस्तित्वमां ज नथी. अहीं तो स्वभावथी पूर्ण भरपुर एवी पोतानी वस्तुनुं भान थयुं त्यां साधकने-धर्मीने एक बाजु वर्तमान भव पीडाकारी भासे छे, अने बीजी बाजु भव रहित पोतानो भगवान भासे छे. आवुं ज्ञानमां भासतां एने निश्चय थाय छे के हवे भव अने भवनो भाव रहेशे नहि. अहा! में दया पाळी, ने व्रत पाळ्‌यां, ने दान दीधां एम धर्मी न माने. वर्तमान अल्प राग होय ते धर्मीने पररूप भासे, ने क्लेशरूप भासे. एमां स्वामित्व न भासे. आवो मार्ग छे.

‘आत्मनः अद्भुतात् अद्भुतः स्वभाव–महिमा विजयते’ (आवो) आत्मानो अद्भुतथी पण अद्भुत स्वभाव-महिमा जयवंत वर्ते छे. (-कोईथी बाधित थतो नथी).

अहाहा...! एक समयनी कलुषितता-बाधकभाव पोताथी छे, कोई अन्यथी बाधित थतो नथी, ने एक समयनी