Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 275.

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२६४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ शुद्धता-साधकभाव तेय पोताथी छे, असहाय छे, कोईथी बाधित थतो नथी. ल्यो, आवो गंभीर ने अद्भुतमां अद्भुत निज स्वभाव-महिमा छे, निज वैभव छे. अहीं प्रमाणज्ञान करावीने पांचे भावने (चार पर्यायरूप ने एक पारिणामिक-भावने) जीव तत्त्व कह्युं छे.

भाई, तुं आत्मतत्त्व छो; तारुं होवापणुं तारामां ताराथी छे. क्षणिकपणे परिणमवुं, रागादिपणे परिणमवुं- तारुं तारामां छे, बीजामां नथी, बीजाथी नथी, ने बीजा तारामां नथी. आवी तारा अस्तित्वनी परम अद्भुत अलौकिक वात छे. समजाणुं कांई...?

* कळश २७४ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘अहीं पण २७३ मा काव्यना भावार्थ प्रमाणे जाणवुं’. मतलब के ज्ञानी अनेक धर्ममय आत्मवस्तुने स्याद्वादना बळ वडे जाणीने, भ्रमित थतो नथी, मार्गथी च्युत थतो नथी.

‘आत्मानो अनेकान्तमय स्वभाव सांभळीने अन्यवादीने भारे आश्चर्य थाय छे. तेने आ वातमां विरुद्धता भासे छे. ते आवा अनेकान्तमय स्वभावनी वातने पोताना चित्तमां समावी-जीरवी शकतो नथी.’

भाई, वस्तु तो जेम छे तेम छे. यथार्थ माने नहि त्यारे पण ए तो एम ज छे, अने यथार्थ माने तो? तो पर्यायमां-अवस्थामां फेर पडे. वस्तु तो एम ने एम छे, तेने यथार्थ मानतां धर्म प्रगट थाय छे, ने क्रमशः भवनो नाश थाय छे. वेदांत पर्यायने मानतुं नथी. पण पहेलां वस्तु समज्यो नहि, पछी कारण पामीने समज्यो, तो समज्यो ए ज एनी पर्याय सिद्ध थई गई.

परंतु अज्ञानी अन्यवादी आ वातथी भडके छे. तेने आमां विरुद्धता भासे छे तेथी ते वातने पचावी शकतो नथी, पोताना चित्तमां जीरवी शकतो नथी. तेने एम थाय के आवुं परस्पर विरुद्ध ते केम होय? हवे कहे छे-

‘जो कदाचित् तेने श्रद्धा थाय तोपण प्रथम अवस्थामां तेने बहु अद्भुतता लागे छे के-“अहो आ जिनवचनो महा उपकारी छे, वस्तुना यथार्थ स्वरूपने जणावनारां छे; में अनादि काळ आवा यथार्थ स्वरूपना ज्ञान विना खोयो!”- आम आश्चर्यपूर्वक श्रद्धान करे छे.’

अहाहा...! जिज्ञासुने प्रथम प्रथम भारे अद्भुतता लागे छे के-अहो! आवुं स्वरूप! आवो मार्ग तो सर्वज्ञ वीतरागना शासनमां ज होय, बीजे कयांय न होय. जिज्ञासुने आ वात भारे गजबनी लागे छे. तेने अपूर्व महिमा जागे छे के-अहो! जिनवचनो महा उपकारी छे, वस्तुस्थितिने यथार्थ बतावे छे. अरेरे! वस्तुने जाण्या विना में अनंत काळ खोयो!-आम ते आश्चर्यपूर्वक श्रद्धान करे छे.

* * *

हवे टीकाकार आचार्यदेव अंतमंगळने अर्थे आ चित्चमत्कारने ज सर्वोत्कृष्ट कहे छेः–

(मालिनी)
जयति सहजतेजःपुञ्जमज्जत्त्रिलोकी–
स्खलदखिलविकल्पोऽप्येक एव स्वरूपः।
स्वरसविसरपूर्णाच्छिन्नतत्त्वोपलम्भः
प्रसभनियमितार्चिश्चिच्चमत्कार एषः।। २७५ ।।

श्लोकार्थः– [सहज–तेजःपुञ्ज–मज्जत्–त्रिलोकी–स्खलत्–अखिल–विकल्पः अपि एकः एव स्वरूपः] सहज