(–पोताना स्वभावरूप) तेजःपुंजमां त्रण लोकना पदार्थो मग्न थता होवाथी जेमां अनेक भेदो थता देखाय छे तोपण जेनुं एक ज स्वरूप छे (अर्थात् केवळज्ञानमां सर्व पदार्थो झळक्ता होवाथी जे अनेक ज्ञेयाकाररूप देखाय छे तोपण चैतन्यरूप ज्ञानाकारनी द्रष्टिमां जे एकस्वरूप ज छे), [स्व–रस–विसर–पूर्ण–अच्छिन्न–तत्त्व–उपलम्भः] जेमां निज रसना फेलावथी पूर्ण अछिन्न तत्त्व–उपलब्धि छे (अर्थात् प्रतिपक्षी कर्मनो अभाव थयो होवाथी जेमां स्वरूप–अनुभवननो अभाव थतो नथी) अने [प्रसभ–नियमित–अर्चिः] अत्यंत नियमित जेनी ज्योत छे (अर्थात् अनंत वीर्यथी जे निष्कंप रहे छे) [एषः चित्–चमत्कारः जयति] एवो आ (प्रत्यक्ष अनुभवगोचर) चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे (–कोईथी बाधित न करी शकाय एम सर्वोत्कृष्टपणे वर्ते छे).
(अहीं ‘चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे’ एम कहेवामां जे चैतन्यचमत्कारनुं सर्वोत्कृष्टपणे वर्तवुं बताव्युं, ते ज मंगळ छे.) २७प.
‘सहज–तेजः पुञ्ज–मज्जत्–त्रिलोकी–स्खलत्–अखिल–विकल्पः अपि एकः एव स्वरूपः’ सहज (- पोताना स्वभावरूप) तेजः पुंजमां त्रण लोकना पदार्थो मग्न थता होवाथी जेमां अनेक भेदो थता देखाय छे तोपण जेनुं एक ज स्वरूप छे (अर्थात् केवळज्ञानमां सर्व पदार्थो झळकता होवाथी जे अनेक ज्ञेयाकाररूप देखाय छे तोपण चैतन्यरूप ज्ञानाकारनी द्रष्टिमां जे एकस्वरूप ज छे),...
जुओ, शुं कहे छे? के पोताना ज्ञानना तेजमां त्रण लोकना पदार्थो मग्न थता होवाथी, अर्थात् त्रण लोकना पदार्थो ज्ञानमां जणाता होवाथी, जाणे के त्रण लोकना पदार्थो अहीं ज्ञानमां पेसी गया होय एम ज्ञानमां अनेक भेदो थता देखाय छे तोपण, कहे छे, ज्ञाननुं एक ज स्वरूप छे. अहा! केवळज्ञानमां सर्व पदार्थो झळकता होवाथी अनेक ज्ञेयाकाररूपे ते देखाय छे, अर्थात् लोकालोकने जाणतां ज्ञान ज्ञेयाकार थतुं देखाय छे तोपण खरेखर ज्ञान ज्ञानाकार ज छे, ज्ञेयाकाररूपे थयुं नथी. अनेकने जाणतां पण ज्ञान एकरूप (ज्ञानरूप ज) रहे छे. लोकालोकने जाणनारी ज्ञाननी दशा पोतानी ज छे, तेमां परज्ञेयोनो प्रवेश नथी. अहा! ज्ञान अनेकने जाणवा छतां अनेकरूप थतुं नथी, एकरूप ज रहे छे.
हवे विशेष कहे छे-‘स्व–रस–विसर–पूर्ण–अच्छिन्न–तत्त्व–उपलम्भः’ जेमां निज रसना फेलावथी पूर्ण अछिन्न तत्त्व-उपलब्धि छे (अर्थात् प्रतिपक्षी कर्मनो अभाव थयो होवाथी जेमां स्वरूप-अनुभवननो अभाव थतो नथी) अने...
अहाहा...! शुद्ध आत्मानी पूर्ण अनुभव दशा, पूर्ण उपलब्धि थई ते थई, हवे तेनो अभाव नहि थाय. प्रवचनसार गाथा १७२नी टीकाना नवमा बोलमां आवे छे के-‘उपयोगनुं कोईथी हरण थतुं नथी,’ एटले के एक वार शुद्धात्माना आश्रये जे उपयोग प्रगट थयो तेनो कोईथी नाश थतो नथी. द्रव्यस्वभावनो नाश थाय तो तेना आश्रये प्रगट थयेला उपयोगनो नाश थाय. (पण एम थतुं नथी, थवुं संभवित नथी). वस्तुस्थिति आवी छे.
अहाहा...! भगवान आत्मा एक ज्ञायकस्वभाव प्रभु-तेन द्रष्टि ने रमणतानी पूर्णता थईते फरीने हवे नीचे पडे ने साधकदशा थाय वा विपरीतता थाय एम बनतुं नथी. एक वार साधकमांथी सिद्धपदनी प्राप्ति थाय ते हवे सिद्धपदमांथी साधक थाय के पर्यायमां विपरीतता थाय एम बनतुं नथी. सिद्धपद प्राप्त थयुं तेने छेदाय नहि तेवी तत्त्वोपलब्धि थई. तत्त्वनी उपलब्धि एटले शुं? तत्त्व तो तत्त्वरूप छे ज, परंतु जेवुं तत्त्व छे एवी तेनी पूर्ण दशा थाय एटले तत्त्वनी उपलब्धि थई कहेवाय. समजाणुं कांई...?
अने ‘पसभ–नियमित–अर्चिः’ अत्यंत नियमित जेनी ज्योति छे (अर्थात् अनंत वीर्यथी जे निष्कंप रहे छे) ‘एषः चित्चमत्कारः जयति’ एवो आ (प्रत्यक्ष अनुभवगोचर) चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे. (-कोईथी बाधित न करी शकाय एम सर्वोत्कृष्टपणे वर्ते छे.)
अहाहा...! केवळज्ञान ज्योति जे प्रगट थई ते, कहे छे, अनंत वीर्यथी सदा निष्कंप एकरूप रहे छे. जुओ, अहीं अनंत वीर्य लीधुं. अहाहा...! अनंत वीर्य वडे आ केवळज्ञान ज्योति, बीजे समये, त्रीजे समये एवी ने एवी प्रगट