२६६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ थती रहे छे. पहेलां अछिन्न तत्त्व-उपलब्धि कही, अने अहीं नियमित निष्कंप ज्योति कहीने ज्ञाननी धारा पूर्ण थई गयानुं कहे छे.
अहा! आवो आ प्रत्यक्ष अनुभवगोचर चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे; कोईथी बाधित न थाय एवो सर्वोत्कृष्टपणे वर्ते छे. जुओ आ मांगळिकमां मांगळिक! आवी चित्चमत्कार सर्वोत्कृष्ट वस्तुने छोडीने दया पाळवी, व्रत करवां ने भक्ति-पूजा करवां-इत्यादि शुभभाव करवां ए तो बधो राग छे बापु! एमां कांई नथी, ए कांई धर्म नथी. अहीं तो केवळज्ञान आदि अनंत चतुष्टय एवुं जे पूर्ण स्वरूप-के जे सदा निष्कंप ने सर्वोत्कृष्ट जयवंत वर्ते छे ते मांगळिक छे.
अहा! जेमां केवळज्ञान आदि सदा निष्कंप वर्ते एवो चैतन्यचमत्कार प्रभु तुं छो; तेने छोडीने तारे केवो चमत्कार जोईए? बहारनी लब्धिमां तो धूळेय नथी, बार अंगनी लब्धिने पण (कळश टीकामां) विकल्प कह्यो छे. वास्तविक चमत्कार तो परमानंदनी-पूर्णानंदनी पर्यायमां प्राप्ति थवी ते ज छे.
‘(अहीं चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे एम कहेवामां जे चैतन्यचमत्कारनुं सर्वोत्कृष्टपणे वर्तवुं बताव्युं, ते ज मंगळ छे.)’
अहाहा...! ‘सादि अनंत अनंत समाधि सुखमां’ पोताना चैतन्यनुं रहेवुं एवुं जे सिद्धपद ते जयवंत वर्तो एम कहे छे. समजाणुं कांई...?
हवेना काव्यमां टीकाकार आचार्यदेव पूर्वोकत आत्माने आशीर्वाद आपे छे अने साथे साथे पोतानुं नाम पण प्रगट करे छेः–
न्यनवरतनिमग्नं
ज्ज्वलतु विमलपूर्ण निःसपत्नस्वभावम्।। २७६ ।।
श्लोकार्थः– [अविचलित–चिदात्मनि आत्मनि आत्मानम् आत्मना अनवरत–निमग्नं धारयत्] जे अचळ– चेतनास्वरूप आत्मामां आत्माने पोताथी ज अनवरतपणे (–निरंतर) निमग्न राखे छे (अर्थात् प्राप्त करेला स्वभावने कदी छोडती नथी), [ध्वस्त–मोहम्] जेणे मोहनो (अज्ञान–अंधकारनो) नाश कर्यो छे, [निःसपत्नस्वभावम्] जेनो स्वभाव निःसपत्न (अर्थात् प्रतिपक्षी कर्मो विनानो) छे, [विमल–पूर्ण] जे निर्मळ छे अने जे पूर्ण छे एवी [एतत् उदितम् अमृतचन्द्र–ज्योतिः] आ उदय पामेली अमृतचंद्रज्योति (–अमृतमय चंद्रमा समान ज्योति, ज्ञान, आत्मा) [समन्तात् ज्वलतु] सर्व तरफथी जाज्वल्यमान रहो.
भावार्थः– जेनुं मरण नथी तथा जेनाथी अन्यनुं मरण नथी ते अमृत छे; वळी जे अत्यंत स्वादिष्ट (– मीठुं) होय तेने लोको रूढिथी अमृत कहे छे. अहीं ज्ञानने–आत्माने–अमृतचंद्रज्योति (अर्थात् अमृतमय चंद्रमा समान ज्योति) कहेल छे, ते लुप्तोपमा अलंकारथी कह्युं जाणवुं; कारण के ‘अमृतचन्द्रवत् ज्योतिः’नो समास करतां ‘वत्’ नो लोप थई ‘अमृतचन्द्रज्योतिः’ थाय छे.
(‘वत्’ शब्द न मूक्तां अमृतचंद्ररूप ज्योति एवो अर्थ करीए तो भेदरूपक अलंकार थाय छे. ‘अमृतचंद्रज्योति’ एवुं ज आत्मानुं नाम कहीए तो अभेदरूपक अलंकार थाय छे.)
आत्माने अमृतमय चंद्रमा समान कह्यो होवा छतां, अहीं कहेलां विशेषणो वडे आत्माने चंद्रमा साथे व्यतिरेक पण छे; कारण के––‘ध्वस्तमोह’ विशेषण अज्ञान–अंधकारनुं दूर थवुं जणावे छे, ‘विमलपूर्ण’ विशेषण लांछनरहितपणुं तथा पूर्णपणुं बतावे छे, ‘निःसपत्नस्वभाव’ विशेषण राहुबिंबथी तथा वादळां आदिथी