आच्छादित न थवानुं जणावे छे, ‘समंतात् ज्वलतु’ कह्युं छे ते सर्व क्षेत्र तथा सर्व काळे प्रकाश करवानुं जणावे छे; चंद्रमा आवो नथी.
आ काव्यमां टीकाकार आचार्यदेवे ‘अमृतचंद्र’ एवुं पोतानुं नाम पण जणाव्युं छे. समास पलटीने अर्थ करतां ‘अमृतचंद्र’ना अने ‘अमृतचंद्रज्योति’ना अनेक अर्थो थाय छे ते यथासंभव जाणवा. २७६.
अहाहा...! अंतिम मंगळ करतां आत्मा आत्माने आशीर्वाद आपे छे. आत्माने आत्मा सिवाय बीजुं कोण आशीर्वाद आपे? अने बीजुं कोण स्वीकारे? कहे छे-
‘अविचलित–चिदात्मनि आत्मनि आत्मानम् आत्मना अनवरत–निमग्नं धारयत्’ जे अचळ-चेतनास्वरूप आत्मामां आत्माने पोताथी ज अनवरतपणे (-निरंतर) निमग्न राखे छे,
अहाहा...! अचळ नाम कदी चळे नहि एवो चेतनास्वरूप भगवान आत्मा छे. सम्यग्द्रष्टिने पोतानो भगवान अचळ चेतनास्वरूप भासे छे. अहाहा...! आवो पोते, कहे छे, पोताने पोतामां पोताथी ज निमग्न राखे छे. जोयुं? भगवान आत्मा शुद्ध चेतनास्वरूप प्रभु व्यवहाररत्नत्रयना रागनी के निमित्तनी अपेक्षा विना ज पोते पोताथी पोताने पोतामां निमग्न राखे छे. अहाहा...! दया, दान, व्रतादिना परिणाम कर्म चेतना छे, अने सुख-दुःखनुं वेदन कर्मफळ चेतना छे. ए बन्नेथी रहितपणे, अहीं कहे छे, पोते ज पोताने पोताथी पोतामां अंतर्निमग्न राखे छे. आवी वात!
प्रवचनसार गाथा १७२ना अलिंगग्रहणना छट्ठा बोलमां आवे छे के-आत्मा पोताना स्वभावथी जाणे एवो प्रत्यक्ष ज्ञाता छे. अहाहा...! आत्मा स्वभावथी ज निरंतर अंतर्मग्न रहे छे. ल्यो, आवो अनुभव धर्मीने-सम्यग्द्रष्टिने थाय छे. अज्ञानीने तो बिचाराने स्वरूपनी ज खबर नथी; ए तो क्रियाकांडमां मग्न रहे छे पण एथी कांई ज लाभ नथी; क्रियाकांडथी-व्यवहारथी अंतर्मग्नता थाय एम छे नहि. भाई, नियमसार गाथा ३मां कह्युं छे के-भगवान आत्मानी द्रष्टि, तेनुं ज्ञान-स्वसंवेदन ज्ञान, अने तेमां लीनता-रमणता-तेरूप जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ते ज कर्तव्य छे, बीजुं नहि. व्यवहारना विकल्प उठे छे, पण ते कर्तव्य छे एम नहि. अहाहा...! अलौकिक असाधारण एवा सम्यग्दर्शन आदि ज कर्तव्य छे.
जुओ, अहीं अंतिम मंगळमां आचार्य अमृतचंद्रदेव आत्माने आशीर्वाद देतां कहे छे-पोते पोताने पोताथी ज अंतर्मग्न राखे छे. व्यवहार रत्नत्रय तो कहेवामात्र छे, एनाथी आत्मा आत्मामां मग्न थाय छे एम छे ज नहि. भाई, विकल्पथी निर्विकल्प केवी रीते लक्षमां आवे? विकल्प तो परलक्षे थाय छे. हवे परलक्षवाळी दशाथी स्वलक्षवाळी दशा केवी रीते थाय? न थाय.
प्रथम मांगलिकमां ‘नमः समयसाराय’-कळशमां जेम अस्तिथी वात करी छे तेम अहीं अस्तिथी वात करे छे. त्यां ‘नमः समयसाराय’ कहीने समयसार नाम चित्स्वभावी नित्यानंद प्रभुने हुं नमुं छुं-एम कह्युं. ‘स्वानुभूत्या चकासते’ जे पोते पोतानी स्वानुभूतिनी दशाथी प्रकाशित थाय छे एम पर्यायनी वात करी. ‘चित्स्वभावाय’ कहीने गुण कह्यो, ‘भावाय’ कहीने द्रव्य कह्युं तथा ‘सर्वभावान्तरच्छिदे’ कहीने सर्वज्ञता सिद्ध करी. आम पहेला कळशमां बधुं अस्तिथी लीधुं छे. तेम आ कळशमां बधुं अस्तिथी लीधुं छे. अहीं आ कळशमां ‘आत्मा’ ते द्रव्य, ‘अचळ चेतना’ ते गुण, ने ‘आत्मामां मग्न’ ते पर्याय लीधी. आम अस्तिथी कह्युं तेमां नास्तिनुं ज्ञान आवी जाय छे. शास्त्रमां मांगळिक त्रण प्रकारे आवे छे-शरुमां, वचमां ने अंतमां. कळश १२२ मां वचमांनुं मांगळिक आवी गयुं छे. त्यां कह्युं छे-शुद्धनय त्यागवा योग्य नथी, कारण के तेना अत्यागथी कर्मबंध थतो नथी, अने तेना त्यागथी बंध ज थाय छे; अर्थात् शुद्धनयथी मोक्ष छे-आ शास्त्रनो निचोड छे. ल्यो, आवी अपूर्व वात छे. अहो! दिगंबर संतोनी वाणी तो केवळीनी वाणी छे; जेना चित्तमां चोंटी ए तो न्याल थई गया. अहा! आ न्याल थवानो काळ छे भाई! निर्विकल्प अनुभूतिमां आत्मा प्राप्त थयो ते अनवरतपणे पोताने प्राप्तिमय ज राखे छे, कदी छूटतो नथी.
वळी, ‘ध्वस्त–मोहम्’ जेणे मोहनो (अज्ञान-अंधकारनो) नाश कर्यो छे, जुओ, आ व्यवहारनयथी वात छे. पोताना