२६८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ शुद्ध चैतन्यस्वभावना आश्रये परिणत थतां मोहनी उत्पत्ति थई नहि तो मोहनो नाश कर्यो एम व्यवहारथी कह्युं छे. पोतानी अनंतज्ञान आदि लक्ष्मी प्रगट थई त्यां परनी सावधानीनो भाव ज नथी, परनी सावधानी रही ज नथी एटले मोहनो नाश कर्यो एम कह्युं छे. अहाहा! चैतन्यना आश्रये चैतन्यनो निर्मळ-शुद्ध उपयोग जे प्रगट थयो ते निर्मळ निर्विकार छे तो कहे छे के-मोहनो नाश कर्यो छे. समजाय छे कांई...?
जोयुं? भगवान आत्मानो स्वभाव कर्मोथी भिन्न छे, विरुद्ध छे. ज्ञान, आनंद इत्यादि स्वभाव जयां पूर्ण प्रगट थई गयो त्यां कर्म नडे एम छे नहि.
छे, पूर्ण छे तेवो ते स्व-आश्रये पर्यायमां निर्मळ, पूर्ण प्रगट थयो छे; अर्थात् द्रव्यना आश्रयमां पर्याय निर्मळ, ने पूर्ण प्रगट थई गई. आ साध्यरूप सिद्धदशा छे.
अमृतमय चंद्रमा समान ज्योति, ज्ञान, आत्मा) ‘समन्तात् ज्वलतु’ सर्व तरफथी जाज्वल्यमान रहो.
अहाहा...! अमृतस्वरूप आत्मा नित्यानंद प्रभु-तेना आश्रये प्रगट थयेली अमृतमय, चंद्रमा समान ज्योति अथवा अमृत समान ज्ञान, अथवा अमृतचंद्र समान आत्मा सर्व तरफथी-सर्व प्रकारे जाज्वल्यमान रहो एम आत्माने अहीं आशीर्वाद दीधा छे. ल्यो, पोते पोताने आशीर्वाद आपे छे.
अहाहा...! पंचम आराना मुनिवर कहे छे-अमने जे मोक्षमार्ग प्रगट थयो छे ते एवो ने एवो जाज्वल्यमान रहो; एम के आ भावथी आगळ जतां अमने पूर्ण केवळज्ञान अने मोक्ष थशे. अहाहा...! अमने जे निर्मळ पर्याय थई ते एवी ने एवी प्रगट थया करो, कोई प्रकारे हीणप न हो-एम सिद्धपद माटे पोताने आशीर्वाद आपे छे.
‘जेनुं मरण नथी तथा जेनाथी अन्यनुं मरण नथी ते अमृत छे; वळी जे अत्यंत स्वादिष्ट (-मीठुं) होय तेने लोको रूढिथी अमृत कहे छे.’
अहाहा...! भगवान आत्माना द्रव्य-गुण-पर्यायरूपे होवापणानुं शुं मरण थाय छे? ना, भगवान आत्मा द्रव्य-गुण-पर्यायपणे अमर छे, अमृतस्वरूप छे, एनो कदीय नाश थतो नथी. ध्रुव चिदानंदघन प्रभुना आश्रये जे निर्मळ पर्याय प्रगटे छे तेनोय नाश थतो नथी, तेय अक्षय छे. वळी ते आनंदना स्वादवाळी अमृत छे. लोकमां पण स्वादिष्ट होय तेने अमृत कहे छे ने? तेम आ अनाकुळ आनंदना स्वादवाळी अमृत छे. अहाहा...! अमृतस्वरूपी आत्मा अमृतमय स्वादयुक्त अमृत छे.
‘अहीं ज्ञानने-आत्माने-अमृतचंद्रज्योति (अर्थात् अमृतमय चंद्रमा समान ज्योति) कहेल छे, ते लुप्तोपमा अलंकारथी कह्युं जाणवुं; कारण के ‘अमृतचन्द्रवत् ज्योतिः’ नो समास करतां ‘वत्’ नो लोप थई ‘अमृतचन्द्रज्योतिः’ थाय छे.
(‘वत्’ शब्द न मूकतां अमृतचंद्ररूप ज्योति एवो अर्थ करीए तो भेदरूपक अलंकार थाय छे. ‘अमृतचंद्रज्योति’ एवुं ज आत्मानुं नाम कहीए तो अभेदरूपक अलंकार थाय छे.)’
आ अलंकार ए भाषाना पंडितोनो विषय छे. हवे कहे छे-‘आत्माने अमृतमय चंद्रमा समान कह्यो होवा छतां, अहीं कहेलां विशेषणो वडे आत्माने चंद्रमा साथे व्यतिरेक पण छे; कारण के ‘ध्वस्त–मोह’ विशेषण अज्ञानअंधकारनुं दूर थवुं जणावे छे.’
भगवान आत्मा अज्ञान-अंधकारने दूर करवावाळो छे, ज्यारे चंद्रमा समस्त अंधकारनो नाश करतो नथी. शुं घरमां के घरनी अंदरना पटारामां चंद्रमा प्रकाश करे छे? माटे चंद्रमानी उपमा सर्वांशे लागु पडती नथी.
वळी, ‘विमल पूर्ण’ विशेषण लांछनरहितपणुं तथा पूर्णपणुं बतावे छे.
भगवान आत्मा पूर्ण विमल छे, ज्यारे चंद्रमाने तो लांछन छे. तेथी चंद्रमानी उपमा तेने लागु पडती नथी.